'मेरी वफ़ादारी जनता के प्रति'

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Image caption डॉक्टर सेन को अपना पासपोर्ट जमा करवाना होगा और वे देश छोड़कर भी नहीं जा सकते.

सामाजिक कार्यकर्ता और चिकित्सक बिनायक सेन ने ज़मानत पर रिहा होने के बाद कहा है कि वे छत्तीसगढ़ में काम करते रहेंगे. अपने ऊपर लगे राजद्रोह के आरोप के ख़ारिज करते हुए डॉक्टर सेन ने कहा कि वो छत्तीसगढ़ और पूरे देश की जनता के प्रति वफ़ादार हैं.

बिनायक सेन ने कहा, "मेरा दिल जानता है कि मैंने कभी अपने देशवासियों से गद्दारी नहीं की है. इसलिए मैंने कभी अपने ऊपर लगे राजद्रोह के आरोप को स्वीकार नहीं किया है. सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट रूप से कहा है कि मेरे ख़िलाफ़ राजद्रोह के सबूत नहीं हैं. "

डॉक्टर सेन ने कहा कि उनकी रिहाई अकेले उनके अपने दम पर नहीं बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय अभियान की वजह से हुई है.

स्वागत

डॉक्टर सेन के परिजनों के अलावा जेल से निकलते हुए जनमुक्ति मोर्चा और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया.

जेल के बाहर मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के कार्यकर्ता भी थे. बाहर आने के बाद डॉक्टर सेन सबसे पहले अपनी मां के गले लगे.

उनकी रिहाई के लिए रायपुर की एक निचली अदालत ने शर्तें रखीं हैं.

डॉक्टर सेन ने अपनी रिहाई के लिए 50 हज़ार का निजी मुचलका जमा करवाया है. साथ ही डॉक्टर सेन ने अदालत में 50 हज़ार का बेल बॉन्ड भी जमा करवाया है.

इसके अलावा उनका पासपोर्ट भी अदालत में जमा कर लिया गया है. अदालत ने कहा है कि डॉक्टर सेन को मुक़द्दमें की हर तारीख़ पर ख़ुद अदालत में हाज़िर होना होगा और वो देश छोड़कर बाहर नहीं जा सकते.

डॉक्टर सेन को सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल को ज़मानत दे दी थी.

बिनायक सेन के घर से माओवादी समर्थक साहित्य मिलने के सबूतों के आधार पर पिछले साल छत्तीसगढ़ की एक निचली अदालत ने उन्हें राजद्रोह के लिए दोषी करार दिया था.

ज़मानत याचिका को मंज़ूरी

इससे पहले 15 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर बिनायक सेन की ज़मानत याचिका को मंज़ूरी दे दी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा था, "बिनायक सेन के ख़िलाफ़ राजद्रोह का आरोप नहीं बनता. हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, बिनायक नक्सलियों से सहानुभूति रखने वालों में से हो सकते हैं लेकिन इस आधार पर उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला नहीं लगाया जा सकता."

इससे पहले सरकारी वकील ने तर्क देते हुए कहा था कि बिनायक सेन को ज़मानत न दी जाए. वकील के मुताबिक अगर बिनायक सेन को ज़मानत मिली तो वे छत्तीसगढ़ में प्रत्यक्षदर्शियों को प्रभावित कर सकते हैं जैसा कि अमित शाह ने गुजरात में किया था.

इस पर जज ने कहा कि दोनों व्यक्तियों की तुलना नहीं हो सकती और फिर ज़मानत याचिका को मंज़ूरी दे दी.

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