सभी पक्षों को झुकना चाहिए: बिनायक सेन

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Image caption डॉक्टर सेन को निचली अदालत ने देशद्रोह का दोषी ठहरा कर उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी

सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन ने कहा है कि अभी वे ये तय नहीं कर पाए हैं कि फिर से गाँव जाकर ग़रीब आदिवासियों का उसी तरह इलाज करते रहेंगे जैसा कि वह अपनी गिरफ़्तारी से पहले किया करते थे.

जेल से ज़मानत पर रिहा होने के बाद उन्होंने कहा कि बदली हुई परिस्थितियों में अब उन्हें ऐसा करने के लिए सोचना पड़ेगा.

अपने रायपुर के आवास पर पत्रकारों से बात करते हुए सेन का कहना था कि क्षेत्र में शान्ति के लिए प्रयास और तेज़ होने चाहिए.

उन्होंने कहा, "इसमें सभी पक्षों को झुकना चाहिए, चाहे माओवादी हों, सरकार हो या फिर मध्यस्ता करने वाले."

उन्होंने कहा है कि राज्य सरकार को नक्सलियों से लड़ने के अपने तरीक़ा बदलना चाहिए.

उन्होंने नक्सलियों के ख़िलाफ़ सलवा जुड़ुम जैसे आंदोलन का विरोध करते हुए कहा कि इसे बंद होना चाहिए क्योंकि इससे माहौल ख़राब ही हुआ है. शुक्रवार, 15 अप्रैल को को सुप्रीम कोर्ट ने बिनायक सेन को ज़मानत दे दी थी मगर यह भी कहा था कि उनकी ज़मानत की शर्तें रायपुर की निचली अदालत तय करेगी.

ज़मानत की कई शर्तें

सोमवार की सुबह निचली अदालत की कार्यवाई शुरू होते ही उनके वकील महेंद्र दुबे और एसके फरहान ने सुप्रीम कोर्ट का ज़मानती आदेश पेश किया.

दिन भर चली कार्रवाई के बाद अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश बीपी वर्मा की अदालत ने तय किया कि बिनायक सेन को अदालत में अपना पासपोर्ट जमा करना होगा और वह भारत से बाहर नहीं जा सकते.

साथ ही उन्हें अदालत की ओर से जब तलब किया जाए तो वह उसके समक्ष हाज़िर हों. इसके अलावा उन्हें 50 हज़ार के निजी मुचलके और 50 हज़ार के ज़मानती मुचलके पर रिहा किया गया.

कागज़ी कार्रवाई पूरी होते-होते एक बार तो ऐसा लगा कि शायद सोमवार को उनकी रिहाई संभव न हो पाए लेकिन देर शाम उनकी की रिहाई का आदेश रायपुर की केंद्रीय कारागार तक पहुँच ही गया.

शाम लगभग सात बजे रायपुर केंद्रीय कारागार से उनकी रिहाई संभव हो सकी.

बाहर निकलते ही वे अपनी माँ अनुसुइया सेन के गले लग गए. वहाँ उनकी पत्नी इलीना और दोनों बेटियाँ भी मौजूद थीं.

बाहर निकलकर उन्होंने कहा कि खुली हवा में साँस लेकर वे अच्छा महसूस कर रहे हैं.

पहले अदालत परिसर में और फिर जेल के बाहर बिनायक सेन के समर्थकों का जमावड़ा रहा.

सामाजिक संगठन के कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में मौजूद थे. जन मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ता "बिनायक सेन को लाल सलाम" और "जेल का ताला टूटेगा, बिनायक सेन छूटेगा" जैसे नारे लगा रहे थे.

जनता के प्रति वफ़ादार

रिहाई के बाद अपने ऊपर लगे राजद्रोह के आरोपों को एक बार फिर ख़ारिज करते हुए डॉक्टर सेन ने कहा कि वो छत्तीसगढ़ और पूरे देश की जनता के प्रति वफ़ादार हैं.

बिनायक सेन ने कहा, "मेरा दिल जानता है कि मैंने कभी अपने देशवासियों से गद्दारी नहीं की है. इसलिए मैंने कभी अपने ऊपर लगे राजद्रोह के आरोप को स्वीकार नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट रूप से कहा है कि मेरे ख़िलाफ़ राजद्रोह के सबूत नहीं हैं."

डॉक्टर सेन ने कहा कि उनकी रिहाई अकेले उनके अपने दम पर नहीं बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय अभियान की वजह से हुई है.

डॉक्टर बिनायक सेन ने उन लोगों के बारे में चिंता व्यक्त की जिन्हें माओवादी समर्थक होने या माओवादियों से संबंध रखने के आरोप में जेल में बंद किया गया है.

उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया है और भारत के क़ानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने भी कहा है कि राजद्रोह से संबंधित धाराओं की फिर से समीक्षा की जानी चाहिए. लोकतंत्र में इस तरह के क़ानून की प्रासंगिकता क्या है, इस पर अब बहस होनी चाहिए." उनका कहना था कि उन सभी लोगों के मामलों की भी समीक्षा होनी चाहिए जिन पर झूठे मामले बनाकर नक्सली कहकर जेल भेजा गया है.

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत का फ़ैसला देते हुए कहा था, "बिनायक सेन के ख़िलाफ़ राजद्रोह का आरोप नहीं बनता. हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, बिनायक नक्सलियों से सहानुभूति रखने वालों में से हो सकते हैं लेकिन इस आधार पर उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला नहीं लगाया जा सकता."

बिनायक सेन के परिजनों ने कहा था कि उन्हें जेल में अलग सेल में रखा गया था. इसके बारे में पूछे जाने पर उन्होंने इस मामले में ज़्यादा कुछ भी कहने से मना करते हुए कहा कि जेल में बंद हर क़ैदी को असुविधाएँ हैं.

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