'जैतापुर में संयंत्र बनना चाहिए'

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प्रस्तावित जैतापुर संयंत्र से थोड़ी दूर स्थित जानशी गाँव में 70-वर्षीय मधुसूदन पटवर्धन यहाँ उन चंद लोगों में से हैं जो परमाणु ऊर्जा के समर्थक हैं.

उनकी मानें तो उनकी ही तरह इलाक़े में और भी लोग ऐसा ही सोचते हैं, लेकिन वो चुप रहते हैं और सामने आना नहीं चाहते.

सरकार ने उनकी करीब दस एकड़ ज़मीन को संयंत्र के लिए लिया था.

वो कहते हैं कि जब परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए जैतापुर का चयन हुआ तो उन्हें बेहद खुशी हुई थी. हालांकि जिस क़ीमत पर उनकी ज़मीन सरकार ने ली है, उससे वे ख़ुश नहीं हैं.

'चिंता की बात नहीं'

वो कहते हैं, "इस संयंत्र से जितना धन इस क्षेत्र में आएगा, उससे यहाँ तरक्की होगी. नई सड़कें बनेंगी, इमारतें बनेंगी, अस्पताल की सुविधा आएगी, शैक्षणिक संस्थान खुलेंगे और लोगों को नौकरियाँ मिलेंगी."

मधुसूदन कहते हैं, "दुनिया भर में लोग मानते हैं कि आण्विक उर्जा सबसे स्वच्छ ऊर्जा है. चेर्नोबिल रोज़ तो नहीं होता, वहाँ जो हुआ वो दुर्घटना एक थी."

उनका कहना है कि जो कुछ जापान में हुआ, उससे लोगों का डर जाना स्वाभाविक है लेकिन जापान में भूकंप नियमित रूप से आते हैं और पश्चिम महाराष्ट्र में भूकंप आने की संभावना कम है.

मधुसूदन कहते हैं, "जापान में हुई भीषण तबाही और वहाँ से आ रही तस्वीरों का स्थानीय लोगों हुए असर के बारे में उनका कहना था कि हर तबाही के बाद नई तकनीकें विकसित होतीं हैं, हमें सीख मिलती है. लेकिन यहाँ संयंत्र जिस ज़मीन पर बन रहा है वो समुद्र तल से 30 मीटर ऊंची है इसलिए जापान जैसी दुर्घटना यहाँ नहीं हो सकती."

'राजनीतिज्ञों पर भरोसा नहीं'

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Image caption मधुसूदन पटवर्धन कहते हैं कि लोगों को समझाने की ज़रुरत है

वो इस मामले के कथित राजनीतिकरण पर शिवसेना की कड़ी आलोचना करते हैं.

वे कहते हैं, "मुझे विकास पर भरोसा है. मैं पार्टियों की राजनीति में विश्वास नहीं करता. राजनीतिज्ञ कभी सच नहीं बोलते."

तो फिर आखिर स्थानीय लोग इस संयंत्र के खिलाफ़ क्यों हैं? इस सवाल के जवाब में मधुसूदन कहते हैं, "यहाँ पर जो जनता है वो पढ़ी लिखी नहीं है. अगर किसी ने ये बोल दिया कि इस संयंत्र से शारीरिक नुक़सान होगा, तो लोग इस पर विश्वास कर लेते हैं. ये सब बातें लोगों को बार-बार सुनाई गई हैं."

मधुसूदन इसी गाँव में पले बढ़े हैं, लेकिन कामकाज के लिए बहुत वक़्त मुंबई में गुज़ारा है.

उन्होंने स्नातक के बाद की पढ़ाई मुंबई विश्वविद्यालय से की है.

लेकिन ऐसा नहीं है कि मधुसूदन को सरकार से कोई शिकायत नहीं है.

'ज़मीन के दाम ग़लत'

उन्हें ज़मीन के लिए जो दाम मिले वो उससे असंतुष्ट हैं.

वो कहते हैं, "हमें प्रति हेक्टेयर 33 हज़ार रुपए मिले. लेकिन ये कृषि भूमि के दाम हैं, संयंत्र का काम तो व्यावसायिक होगा. ज़मीन का दाम 40 लाख प्रति हेक्टेयर होना चाहिए. ये संयंत्र शरद पवार के घर बारामती में क्यों नहीं लगाया जाता और लोगों से इसी दाम पर ज़मीन क्यों नहीं ली जाती?"

वो सरकारी दाम में बढ़ोत्तरी के लिए क़ानूनी रास्ते के इस्तेमाल की बात करते हैं.

वो इन बातों से बेहद नाखुश हैं कि सरकार ने जो ज़मीन ली वो सरकार के मुताबिक बंजर है और उस पर कुछ नहीं उग सकता.

वो कहते हैं, "ये ज़मीन पंजाब और हरियाणा से भी बेहतर है. मैं इस पर हापुस आम, नारियल और कोकम उगा सकता हूँ. इससे मुझे ज़्यादा पैसा मिलेगा, मुझे सिर्फ़ पानी की ज़रूरत है. यहाँ सिंचाई की सुविधाओं की कमी है. अगर सरकार मेरी ज़मीन ले रही है, लोगों को विकास में भागीदार बनाने की ज़रूरत है."

मधुसूदन बताते हैं कि कोंकण में एक सोच ये भी है कि पश्चिमी महाराष्ट्र के लोग कोंकण के संसाधनों का फ़ायदा उठाकर इसे कथित तौर लूटना चाहते हैं, इसलिए भी कई लोग संयंत्र के खिलाफ़ हैं.

वो मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की प्रशंसा करते हैं कि उन्होंने मुंबई में आयोजित सभा में लोगों को समझाने की कोशिश की, लेकिन वो कहते हैं कि उन्हें ये कदम पहले उठाना चाहिए था.

मधूसूदन बताते हैं कि लोगों की चिंता इस बात पर भी है कि इलाक़े में बहुत से कोयला आधारित बिजली संयंत्र आ रहे हैं जिनसे पर्यावरण को नुक़सान होगा.

उनका मानना है कि लोगों की नाराज़गी का सबसे बड़ा कारण है कि लोगों को सरकार पर भरोसा नहीं है.

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