बिहार:केंद्रीय विश्वविद्यालय खटाई में

नीतीश कुमार
Image caption नीतीश कुमार विश्विधालय को मोतिहारी ले जाना चाहते हैं तो केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री इसके ख़िलाफ़ हैं.

बिहार में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए मंज़ूरी मिले तक़रीबन दो साल हो गए हैं लेकिन उसके स्थान निर्धारण को लेकर राज्य और केंद्र सरकार के बीच जारी वाद-विवाद के कारण मामला अटक-सा गया है.

विश्वविद्यालय को अबतक अपना ठौर-ठिकाना नहीं मिल पाया है और इसका अस्तित्व बी. आई. टी. मेसरा के पटना कैंपस से लगे हुए एक अस्थाई छोटे स्थान में सिमटा पड़ा है.

राज्य सरकार कहती है कि अगर विश्वविद्यालय को बिहार में स्थापित होना है तो गाँधी के चंपारण आन्दोलन से जुड़े एक छोटे शहर मोतिहारी में जाना ही होगा.

कहा जाता है कि ये मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ज़िद है.

गाँधी

नीतीश कुमार का कहना है, ''मोतिहारी में अच्छे कैम्पस के लायक ज़मीन उपलब्ध है और गांधी की कर्मभूमि के रूप में चर्चित उस जगह पर केन्द्रीय विश्वविद्यालय खुलने से राज्य के उस हिस्से में भी मानव संसाधन विकास के साथ-साथ तरक्क़ी के और कई रास्ते खुलेंगे.''

लेकिन यह तर्क केन्द्रीय मानव संसाधन विभाग को क़तई क़बूल नहीं है.

इस विभाग के केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल कहते हैं, '' गांधी का नाम लेकर इसे भावनात्मक मुद्दा बनाना ठीक नहीं है. जहाँ आधारभूत संरचना (बिजली, सड़क, अस्पताल वगैरह) के अलावा आवागमन के साधन ठीक-ठाक ना हों, वहाँ यूनिवर्सिटी खोल देने से शिक्षकों और छात्रों के टोटे पड़ जाएंगे.''

केंद्र सरकार ने इस बाबत राज्य सरकार से स्पष्ट तौर पर कह दिया है कि पटना के आस-पास ज़मीन उपलब्ध कराये जाने पर ही इस केन्द्रीय विश्वविद्यालय के अपेक्षित स्वरुप वाला कैम्पस बन पाएगा.

समावेशी विकास

राज्य के शिक्षामंत्री पी के शाही से इस बाबत जब मैंने बात की तो उन्होंने भी दो-टूक शब्दों में कहा, "पटना के पास अब उतनी ज़मीन मिल कहाँ रही है? और फिर हमारी सरकार चूँकि समावेशी विकास के तहत राज्य के बाक़ी हिस्सों को भी विकसित करना चाहती है इसीलिए मोतिहारी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी के लिए उपयुक्त जगह मानते हुए वहाँ ज़मीन का भी प्रबंध कर चुकी है. अब केंद्र को जो निर्णय लेना हो ले, राज्य सरकार अपने फ़ैसले पर दृढ है.''

पी के शाही ने ये भी जोड़ा कि लगता है इस विश्वविद्यालय के लिए नियुक्त कुलपति, जनक पाण्डेय, को मोतिहारी के नाम पर ज़्यादा आपत्ति है.

हालांकि जब मैंने कुलपति से संपर्क किया तो उन्होंने कहा, ''मेरी व्यक्तिगत आपत्ति संबंधी आरोप निराधार है. स्थल चयन के लिए बनी कमिटी ने निर्धारित मानदंडों के मुताबिक़ निरीक्षण करके ये रिपोर्ट दी थी कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय के लिए मोतिहारी उपयुक्त जगह नहीं है. राज्य सरकार की ज़िद दुर्भाग्यपूर्ण है और मैं तो मौजूदा हालात में भी इस यूनिवर्सिटी का शैक्षणिक ढांचा तैयार करने के बुनियादी काम में जुटा हूँ.''

ज़ाहिर है कि राजनीति के दो पाटन - केंद्र और राज्य सरकार; के बीच फंसा यह केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिहार में तभी मुक्त होकर निकल सकेगा, जब नीतीश कुमार और कपिल सिब्बल की मिली-जुली कृपा होगी.

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