लड़ाकू विमान के सौदे में अमरीका को झटका

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Image caption भारत ने फ़्रांस के लड़ाकू विमान रेफ़ाल को ख़रीदने का फ़ैसला किया है.

भारत ने 126 लड़ाकू विमान ख़रीदने के लिए अमरीका और रूस की कंपनियों की दावेदारी को ख़ारिज करते हुए यूरोप की कंपनियों को शॉर्टलिस्ट किया है.

समाचार एजेंसियों के मुताबिक़ 10 अरब डॉलर से भी ज़्यादा के इस सौदे के लिए यूरोप की कंपनी डेसो और यूरोफ़ाइटर को चुना गया है.

अमरीकी कंपनियों को ठेका ना देने के फ़ैसला की ख़बर उस दिन सामने आई है, जिस दिन भारत में अमरीकी राजदूत टिमोथी रोमर ने पारिवारिक कारणों से अपने पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा की.

इस ठेके के लिए ख़ुद अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी पूरी कोशिश की थी.

अमरीका निराश

अमरीका ने भारत के इस फ़ैसले पर दुख जताया है.

भारत में अमरीकी दूतावास ने एक बयान जारी कर कहा है कि भारत के रक्षा मंत्रालय ने बुधवार को इस बारे में दूतावास को सूचित किया था कि अमरीकी कंपनियों के दो लड़ाकू विमानों को भारत ने ख़रीदने से इनकार कर दिया है.

भारत में अमरीकी राजदूत टिमोथी रोमर ने कहा, ''हम भारत सरकार की तरफ़ से भेजे गए दस्तावेज़ों की समीक्षा कर रहे हैं. लेकिन इस ख़बर से हमें काफ़ी निराशा हुई है. भारत सरकार के उच्चतम पदों पर बैठे लोगों के ज़रिए मुझे निजी तौर पर आश्वस्त किया गया था कि लड़ाकू विमान को ख़रीदने की प्रक्रिया बिल्कुल पारदर्शी और निष्पक्ष होगी. मुझे पूरा विश्वास है कि अमरीकी लड़ाकू विमान, बोइंग का एफ़-18 और लॉकहीड मार्टिन का एफ़-16 भारतीय वायु सेना को बहुत वाजिब क़ीमत पर बेहतरीन तकनीक मुहैया कराएगा.''

भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इसे भारत और अमरीका के बीच राजनीतिक संबंधों के लिए एक झटका क़रार दिया है.

सिब्बल ने कहा,''अमरीकी इससे बहुत नाख़ुश होंगे और जो लोग इस ठेके की पैरवी कर रहे थे वो कहेंगे कि भारत ने अमरीका से अपने राजनीतिक संबंधों का उचित ख़्याल नहीं रखा.''

इस सौदे के लिए शॉर्टलिस्ट की गई कंपनी यूरोफ़ाइटर चार यूरोपीय देशों की एक कन्सॉर्शियम अथवा संघ है जिसमें जर्मनी, स्पेन, ब्रिटेन और इटली की कंपनियां शामिल है.

'यूरोप की जीत'

लंदन स्थित बीजीसी पार्टनर्स के वरिष्ठ सामरिक विशेषज्ञ हावर्ड व्हीलडॉन ने भारत के इस फ़ैसले पर कहा,''एक तरह से यूरोप की जीत हुई है. भारत अपने अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है.''

10 अरब डॉलर यानी लगभग 50 हज़ार करोड़ रुपए का ये सौदा रक्षा के इतिहास में सबसे बड़े सौदों में से एक है.

भारत अब तक रूस के लड़ाकू विमानों या फ़्रांस के मिराज विमानों पर निर्भर करता रहा है.

लेकिन इस सौदे को पाने के लिए सुरक्षा उपकरण बनाने वाली दुनिया भर की छह बड़ी कंपनियां दौड़ में शामिल थी.

अमरीकी कंपनी बोइंग के एफ़-18 और लॉकहीड मार्टिन के एफ़-16 के अलावा फ्रांस का रेफ़ाल, स्वीडन में बना ग्रिपन विमान, रूसी मिग-35 और यूरोपीय टाइफ़ून इस ठेके की दौड़ में शामिल थे.

यहां तक कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन, फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोला सारकोज़ी और रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव अपने-अपने देश की कंपनियों के लिए पैरवी कर रहे थे.

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