सुरेश कलमाड़ी का जीवन परिचय

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भारतीय वायुसेना के पायलट से लेकर राजनीति, खेल नीतिऔर फिर कॉमनवेल्थ. ये हैं सुरेश कलमाड़ी का जीवन.

मीडिया में उन पर इतने आरोप लगे हैं कि वो बहुत से लोगों की नज़र में भ्रष्टाचार का जैसे पर्याय बन गए लगते हैं. उन पर चुटकुले तक निकले पड़े.

उधर पुणे के लोग कलमाड़ी को उनकी पार्टियों, पेज-थ्री व्यक्तित्व के कारण भी जानते है.

लोकसभा में पुणे का प्रतिनिधित्व करने वाले सुरेश कलमाड़ी की दिल्ली के नेताओं से नज़दीकी और उनके राजनीतिक ग्राफ़ का सालों से लगातार ऊपर जाना कांग्रेस के कई लोगों के मुताबिक समझ से बाहर है.

एक कांग्रेस नेता कहते हैं,हमें देखिए, दशकों से पार्टी की सेवा की, लेकिन आगे नहीं बढ़ पाए. दूसरी ओर कलमाड़ी को देखिए. उन्होंने पार्टी छोड़ी, लेकिन जब चाहा वापस आ गए.

वायुसेना से भी जुड़े रहे...

राजनीति में सुरेश कलमाड़ी को शरद पवार का नज़दीकी माना जाता है, यहाँ तक कि एक विश्लेषक ने उन्हें कलमाड़ी का गॉड-फॉदर तक बताया.

कांग्रेस के कुछ स्थानीय नेता तो ये भी कहते हैं कि कलमाड़ी ने पवार को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भी पूरा ज़ोर लगा दिया था.

पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज के पढ़े 67-वर्षीय सुरेश कलमाड़ी ने नेशनल डिफ़ेंस अकादमी (एनडीए) खड़कवासला से स्नातक किया. वर्ष 1965 में पायलट के तौर पर वो भारतीय वायुसेना से जुड़े. उन्होंने 1965 और 1971 की जंग में भी हिस्सा लिया.

ऐसा भी कहा जाता है कि उन्हें पदकों से सम्मानित किया गया. वर्तमान में पुणे से कांग्रेस विधायक उल्हास पवार कहते हैं कि पदक की बात अब कही जा रही है लेकिन उन्हें इस बारे में पता नहीं था.

ये उल्हास पवार ही थे जिन्होंने कलमाड़ी को सत्तर के दशक में पुणे युवा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया था.सुरेश कलमाड़ी एनडीए में वायुसेना ट्रेनिंग टीम के इंस्ट्रक्टर भी रहे. बाद में वायुसेना से सेवानिवृत्ति ले ली.

उद्यमी कलमाड़ी

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सुरेश कलमाड़ी के पिता डॉक्टर के शामराव पुणे के जानेमाने समाजसेवी थे. उन्होंने कन्नड संघ और पुणे में कन्नड स्कूल की शुरुआत की. दरअसल कलमाड़ी परिवार कर्नाटक का रहने वाला था.

वायुसेना के बाद सुरेश कलमाड़ी ने पुणे के डेकन जिमखाना इलाके में होटल पूना कॉफ़ी हाऊस को एक समाजवादी राजनीतिज्ञ नीलूभाऊ लिमय से खरीदा.

उस वक़्त ये एक छोटी सा रेस्तराँ था, लेकिन कलमाड़ी ने इसमें बदलाव कर इसे चमकदार बनाया. अब भी कई लोग उन्हें पूना कॉफ़ी हाउस के दिनों में पैसे गिननेवाले सुरेश कलमाड़ी के तौर पर याद करते हैं.

वो सत्तर का दशक था और पूना कॉफ़ी हाऊस जैसे कलमाड़ी के उद्यम की शुरुआत थी.

उन्हीं दिनों में कलमाड़ी की मुलाकात ग़ैर-सरकारी संस्था जायंट्स इंटरनेशल के नाना चुदासामा से और बाद में शरद पवार से हुई. पवार उन दिनों कांग्रेस में थे.

पवार से नज़दीकी

जानकार बताते हैं कि पवार को कलमाड़ी में ऐसा व्यक्ति दिखा जो शहरी अंदाज़ में बातचीत कर लेता हो, जो उद्योगपतियों से परिचित हो और अच्छा नेटवर्कर हो.

पवार की मदद से सुरेश कलमाड़ी वर्ष 1977 में पुणे युवा कांग्रेस के अध्यक्ष और बाद में महाराष्ट्र यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बने.

उल्हास पवार कहते हैं, “उस वक्त कई लोगों ने मुझसे कहा कि उन्हें अध्यक्ष बनाओ. लेकिन मैने कहा कि इन्हें थोड़ा तजुर्बा तो होने दो. लेकिन बाद में मैने उन्हें अध्यक्ष बना दिया.

उस वक्त संजय गाँधी का बोलबाला था. उनके साथी राजनीतिज्ञों के मुताबिक कलमाड़ी बेहद महत्वाकांक्षी थे और वो पार्टी हाईकमान की नज़रों में आना चाहते थे.

कहा जाता है कि एक बार मोरारजी देसाई पुणे आए तो कलमाड़ी ने उनकी कार पर चप्पल फेंकी. ख़बर संजय गाधी के कानों तक भी पहुँची और वो उनकी नज़र में चढ़ गए.

लेकिन उल्हास पवार कहते हैं, “मैं उस वक़्त मोरारजी देसाई की कार के पास था. ये बात सच है कि चप्पल फेंकी गई थी, लेकिन यूथ कांग्रेस की ओर से चप्पल नहीं फेंकी गई. उस समय वहाँ तीन विभिन्न संगठनों का आंदोलन चल रहा था.

कांग्रेस में बढ़ी पैठ

जब शरद पवार कांग्रेस अलग हुए और नई पार्टी कांग्रेस एस बनाई, तो कलमाड़ी भी उनके साथ हो लिए. वो नई पार्टी के युवा ईकाई के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और 1986 तक इस पद पर रहे.

इसी दौरान शरद पवार की बदौलत वो पहली बार 1982 में राज्य सभा पहुँचे. बाद में वो वापस कांग्रेस पहुँचे.

वर्ष 1991 में लोकसभा चुनाव में उस समय के पुणे सांसद विट्ठलराव गाडगिल की हार के बाद कलमाड़ी ने स्थानीय कांग्रेस की कमान अपने हाथों में ली.

नरसिम्हाराव सरकार में वो केंद्र में रेलवे राज्य मंत्री बने. वो अब तक के एकमात्र रेलवे राज्यमंत्री हैं जिन्होंने संसद में रेल बजट प्रस्तुत किया.

प्रशंसका भी, आलोचक भी...

एक स्थानीय कांग्रेस नेता के मुताबिक, कलमाड़ी अख़बारों में इतने इश्तिहार देते थे कि ऐसा लगता ता कि पूरा मंत्रायल उन्हीं की वजह से चल रहा है. उन्होंने अपनी बेहतरीन छवि प्रस्तुत करने की कोशिश की. वो कुशल मैनेजर हैं.

कलमाड़ी के राजीव गाँधी से भी अच्छे संबंध थे. दोनो का पायलट होना भी अच्छे संबंधों का कारण था.

पुणे में जहाँ उनके कई आलोचक हैं, तो कई उनकी तारीफ़ भी करते हैं. एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक जब पुणे मे राष्ट्रीय खेल हुए, तो शहर का नक्शा ही बदल गया.

उनका कहना था, लमाड़ी ने पुणे फ़िल्म समारोह या पुणे मैराथन की शुरुआत की जिससे शहर का प्रोफ़ाईल बढ़ा. वो महाराष्ट्र टूरिज़्म डेवलपमेंट कार्पोरेशन के प्रमुख रहे. कलमाड़ी ने ऐसा दिखाने की कोशिश की थी कि वो पुणे का एकमात्र चेहरा हैं. दिल्ली में पार्टी नेताओं को उन्होंने पिछले कई सालों से यही बताने की कोशिश की है कि वो यहाँ एकमात्र नेता हैं जो शरद पवार को टक्कर दे सकता है.

लेकिन कलमाड़ी के विरोधी इसे मात्र भभकाबताते हैं जिसका आम आदमी की परेशानियों से कोई लेना देना नहीं था.

वर्ष 1997 में कलमाड़ी ने कांग्रेस को विदा कहा. उस वक़्त पार्टी के प्रमुख सीताराम केसरी थे, और कलमाड़ी को लगा कि उन्हें पुणे से टिकट नहीं मिलेगा.

दिल्ली में पहुँच

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कलमाड़ी ने एक नई पार्टी पुणे विकास अघाड़ी बनाई, लेकिन उसका बहुत असर नहीं हुआ. वो 1999 का चुनाव हार गए. बाद में वापस कांग्रेस में आ गए.

उन्हें 2004 के लोकसभा चुनाव में सफ़लता मिली. वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भी पुणे से उनकी जीत के लिए शरद पवार को ज़िम्मेदार माना जाता है.

वरिष्ठ कांग्रेसी बताते हैं कि कलमाड़ी की दिल्ली में इतनी चलती थी कि वर्ष 2009 में कांग्रेस का एक जत्था सोनिया गाँधी से कलमाड़ी के खिलाफ़ शिकायत करने गया था, लेकिन उन्हें मिलने का समय भी नहीं दिया गया.

माना जाता है कि अब भी कलमाड़ी के संबंध शरद पवार से अच्छे हैं लेकिन अजीत पवार से नहीं जिन्होंने कलमाड़ी के रास्तों में मुश्किलें खड़ी की हैं.

पुणे के एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक कलमाड़ी पर भ्रष्टाचार के आरोप सालों से लग रहे थे.

वे कहते हैं, “जब उनके गुट ने पुणे कॉर्पोरेशन का संचालन अपने हाथों में लिया, तो लोगों को आभास था को वो धन कमा रहे हैं. वो पार्टियों पर बेइंतहा पैसा खर्च करते थे. वो कोई मास लीडर या आम लोगों के नेता नहीं हैं. वो अनुसूचित जाति, अनूसूचित जनजाति, ओबीसी और गैर-मराठी लोगों की राजनीति करते हैं.

क्या होगा भविष्य

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खेल से उनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था. वो पहले एथलेटिक्स फ़ेडरेशन के प्रमुख बने, बाद में भारतीय ओलंपिक संघ से जुड़े.

कांग्रेस से निलंबन के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि कलमाड़ी का भविष्य क्या होगा. एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक कलमाड़ी के लिए बड़ी मुश्किल है पार्टी से निलंबन, न कि सीबीआई चार्जशीट.

उधर स्थानीय कांग्रेसी नेता विश्वास व्यक्त कर रहे हैं कि पिछली बार की तरह इस बार पार्टी उन्हें वापस नहीं लेगी.

उधर कलमाड़ी समर्थक भ्रष्टाचार के आरोपों को राजनीतिक साज़िश बता रहे हैं.

उनके एक समर्थक कहते हैं, “अगर कोई व्यक्ति 35 साल तक राजनीति में हो, तो उसके विरोधी होना लाज़मी है. मीडिया ने उनपर लगातार आठ महीने से हमला बोल रखा है. अगर वो व्यक्ति सही-सलामत है तो उसके अच्छे कर्मों की वजह से है. तभी हम सब बोलते हैं, सबसे बड़ा खिलाड़ी, सुरेश भाई कलमाड़ी. आखिरी फ़ैसला कोर्ट करेगा.

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