बेहद खूबसूरत जगह है रत्नागिरी...

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समुद्र का किनारा, ऊंचे पहाड़, घुमावदार सड़कें, शांत वातावरण और क्या चाहिए.

प्रस्तावित जैतापुर आणविक ऊर्जा संयंत्र से थोड़ी दूर स्थित एकमात्र होटल के कमरे की खिड़की खोलते ही हरियाली और दूर-दूर तक खाली जगह नज़र आती है.

यहाँ लोगों के घरों में पेड़ अल्फ़ांसो से लदे हुए हैं. बस ऐसे ही.

यह तो साफ़ है कि यहाँ विकास की असीम संभावनाएँ हैं.

सरकार की मानें तो यहाँ संयंत्र बनते ही चमत्कार हो जाएगा. हज़ारों करोड़ों का निवेश होगा. सुविधाएँ बढ़ेंगी, राज्य और देश को बिजली मिलेगी.

उधर स्थानीय लोगों की मानें तो संयंत्र और अणु ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा है, खासकर जो जापान में हुआ उसे देखते हुए.

तो आखिर सच्चाई क्या है. जितना मुझे समझ में आया वो बताता हूँ.

सभी पक्षों से बातचीत कर मुझे लगा कि सरकार ने संयंत्र के काम में शुरुआत से ही ढिलाई बरती लोगों को विश्वास में नहीं लिया, उन्हें संयंत्र के बारे में अच्छे से नहीं समझाया.

मतभेद

इससे लोगों में अविश्वास बढ़ा. लोगों से औने-पौने दाम पर ज़मीन ली गई. बातचीत का रवैया ऐसा था कि हम बंजर ज़मीन लेकर आप पर जैसे एहसान कर रहे हैं. ये शिकायत करने वाले न सिर्फ़ स्थानीय लोग थे, बल्कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और अफ़सर भी.

यहाँ तक कि कई नेताओं को भी संयंत्र के बारे में जानकारी नहीं है. एक वरिष्ठ कांग्रेसी के मुताबिक लोगों से कहा जाता था कि ये प्रोजेक्ट केंद्रीय सरकार का है, जो मिल रहा है ले लीजिए, नहीं तो आगे कुछ नहीं होगा.

उनके मुताबिक कई लोग इसी रवैये से नाराज़ हैं.

कुछ स्थानीय कांग्रेसी सुरक्षा सुविधाओं से भी असंतुष्ट हैं. एक के मुताबिक, ये कहना कि संयंत्र का गरम पानी समुद्र में जाने से उसका तापमान मात्र तीन डिग्री तक बढ़ेगा और असर सिर्फ़ एक किलोमीटर के घेरे में ही फैलेगा, गलत है.

उनका कहना है कि इसका असर और ज़्यादा होगा. उनके मुताबिक लोगों को अमरीकी मानदंडों के अमल की मांग करनी चाहिए जो बेहद कड़े हैं.

Image caption संयंत्र के विरोध में जैतापुर और रत्नागिरी में कई प्रदर्शन हुए हैं.

स्थानीय लोग कांग्रेस नेता नारायण राणे के रवैये से भी खफ़ा थे जो लोगों को समझाने के बजाय उन्हें संयंत्र के पक्ष में होने की जैसे आज्ञा दे रहे थे.

राजनीति

उधर शिवसेना मानो मौके का फ़ायदा उठा रही है. हर जगह पार्टी के पोस्टर लगे हैं. लेकिन पार्टी नेताओं से अकेले मे बात करो तो वो मानते हैं कि पार्टी के सामने अजीब स्थिति है.

हालांकि वो किसी न किसी तरह पार्टी के रवैये को सही बताते हैं. हाँ, उनके चेहरे पर मुस्कुराहट ज़रूर होती है.

पार्टी ने जहाँ अतीत में भारत अमरीका परमाणु समझौते का समर्थन किया था, अब उसे जैतापुर का विरोध करने में कोई हिचक नहीं हो रही है.

जानकार बताते हैं कि यह खेल मिलने वाले कॉट्रेक्ट का है. उधर कांग्रेस नेताओं को उम्मीद है कि वो किसी न किसी तरह लोगों को समझा-बुझा लेंगे. क्या ये इतना आसान होगा?

यानि कई लोगों की तरह मेरे लिए भी स्थिति पूरी तरह साफ़ नहीं है. एक वरिष्ठ अफ़सर के मुताबिक अगर किसी हवाई जहाज़ के साथ दुर्घटना होती है तो क्या आप हर जगह सड़क से सफ़र शुरू कर देंगे? क्या आप हवाई जहाज़ से यात्रा छोड़ देंगे?

लेकिन कभी-कभी लगता है कि जब देश के कई वरिष्ठ वैज्ञानिकों के बीच आपस में आणविक उर्जा को लेकर मतभेद हैं, तो हम जैसे आम लोग इस बारे में कैसे निर्णय ले सकते हैं.

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