बधाई हो, बेटी हुई है

गर्भ में ही बच्चियों को मारने के लिए बदनाम राज्य हरियाणा में बेटी के जन्म पर जश्न हो रहा है.

Image caption मुन्नी चाहती हैं कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर अपने भविष्य के फैसले खुद करे.

पूरे प्रदेश में तो नहीं, पर कुछ गांवों में ये पहल की जा रही है.

कुछ परिवार बेटी के जन्म पर वही रीत-रिवाज मना रहे हैं जैसे वो बेटे के जन्म पर निभाते आए हैं.

वो चाहते हैं कि बेटी को बोझ मानने की मानसिकता को बदला जाए और बेटी के जन्म पर भी ख़ुशी का इज़हार किया जाए.

हरियाणा के छपार गांव में पहली बार बेटी के जन्म पर गांववालों को इकट्ठा कर ‘कूंआ-पूजन’ किया गया.

अगले सात जन्म हो बेटी

हमने जब छपार गांव के सत्यवान के घर में क़दम रखा तो थाली को चम्मच से बजाने की आवाज़ आई.

सत्यवान की बेटी हुई है और उनकी मां थाली बजा कर इसकी मुनादी कर रहीं हैं.

घर का आंगन खचाखच भरा है, बच्चे, बूढ़े, जवान, पूरा गांव जुटा है.

फिर ख़ास पीली और लाल रंगों की चुनरी ओढ़े सत्यवान की पत्नी, मुन्नी अपने कमरे से बाहर आईं और अपनी बेटी दिव्या को गोद में ले लिया.

इस गांव में रहने वाले जाट समुदाय में बेटे के जन्म पर मां को डेढ़ महीने तक घर में आराम करने दिया जाता है.

लेकिन बेटी के जन्म पर दूसरे दिन ही घर के काम पर लगना पड़ता है.

पर दिव्या के जन्म के बाद उसकी मां को तीन हफ्ते तक आराम करने दिया गया.

दिव्या की बुआ के बाद इस परिवार में 36 साल बाद फिर बेटी हुई है.

सत्यवान कहते हैं, “मैं ये कूंआ पूजन कर रहा हूं ताकि पूरे गांव में बेटी को सम्मान मिले और वो ऐसा करें, पहल करना मुश्किल होता है, पर मैंने हिम्मत की है.”

कूंआ पूजन की रीत में मां कूंएं में पानी डालकर अगले सात जन्मों तक बेटा होने की कामना करती है, दिव्या की मां ने अपनी पूजा में बेटे की जगह बेटी मांगी है.

आठवें फेरे का वचन

छपार गांव की सभी महिलाएं अपना मुंह ढांपें ये सब देख रही हैं. लेकिन उनकी आंखों में हैरत और अविश्वास साफ़ झलक रहा है.

कुछ आंखें नम भी हैं. खास तौर पर बुज़ुर्ग महिलाओं की, जिनकी ज़िन्दगी का सच कुछ और ही रहा है.

भीड़ से निकलकर माया देवी मेरे पास आईं और बोलीं, “20 साल पहले मेरे घर में पोती हुई थी, तो मेरे पति ने कहा कूंआ पूजन करते हैं, मैंने मना कर दिया कि गांव वाले बोलेंगे यो क्या नई बात कर रहे हो.”

उन्होंने कहा कि आज वही ख़ुशी मनाने वो यहां आईं हैं.

Image caption समाजसेवी श्याम सुंदर स्कूली बच्चों से भी भ्रूण हत्या के खिलाफ वचन दिलवाते हैं.

और फिर कुछ महिलाएं लोकगीत गाना शुरू करती हैं, तो कुछ उनपर थिरकना.

22 साल की मोनिका बहुत झूम के नाचती है, मानो जश्न उसके पैदा होने पर मनाया जा रहा हो. मोनिका कॉलेज में है और एम.ए. कर रही है.

मोनिका भी कुछ ऐसा करने वाली है जो यहां कभी नहीं हुआ. अगले महीने उसकी शादी है. अपनी शादी पर वो सात की जगह आठ फेरे लेगी.

आठवें फेरे में वो अपने पति के साथ वचन लेगी कि कभी भी गर्भ में लिंग जांच करवा बेटी को नहीं मारेंगे.

समाज की सोच बदलने का प्रयास

श्याम सुंदर इस कूंआ-पूजन समारोह के ख़ास अतिथि हैं. पेशे से तो वो अंतर्राष्ट्रीय संस्था रेड क्रॉस के भिवानी ज़िले के अफ़सर हैं, लेकिन यहां वो समाजसेवी की भूमिका में हैं.

चार साल पहले श्याम ने बच्चियों की भ्रूण हत्या की समस्या का हल ढूंढने के लिए कुछ पारंपरिक तरीक़े निकाले.

श्याम बताते हैं, “इसे रोकने के लिए ये ज़रूरी है कि समाज की सोच बदली जाए, इसलिए मैंने शादियों में आठवां फेरा लगवाना शुरू किया, ताकि पूरे समाज के सामने पवित्र अग्नि को साक्षी मान वचन लिया जाए.”

श्याम जिन जोड़ों को शादी के समय भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ वचन दिलवाते हैं, उनके संपर्क में रहते हैं.

इन परिवारों में बेटी होने पर उन्होंने कूंआ-पूजन करवाना शुरू किया है, और इसीलिए उन्हें यहां बुलाया गया.

श्याम कहते हैं कि बेटियों को बेटों से हीन समझने वाली रूढ़ीवादी सोच को युवा ही बदल सकते हैं, इसलिए उनके प्रयास नई पीढ़ी के साथ जुड़े हैं.

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