बस्तर बना बड़ा राजनीतिक अखाड़ा

जब भारतीय जनता पार्टी के सांसद बलिराम कश्यप का निधन हुआ और जब बस्तर संसदीय सीट के उपचुनाव की घोषणा हुई थी तो ऐसा नहीं लग रहा था कि ये राजनीतिक दलों के लिए इतनी प्रतिष्ठा का सवाल बन जाएगा.

सब को लग रहा था कि ये एक आम उपचुनाव मात्र है. मगर जैसे-जैसे मतदान का दिन करीब आता गया, राजनीतिक खुमार चढ़ता गया. अब आलम ये है कि यह सीट ना सिर्फ भारतीय जनता पार्टी बल्कि कांग्रेस और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल बन गई है.

सभी दलों नें इस सीट पर अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है जिस कारण मुकाबला काफी रोचक हो गया है.

भारतीय जनता पार्टी नें बलिराम कश्यप के बेटे दिनेश कश्यप को अपना उम्मीदवार बनाया है जबकि कांग्रेस नें बस्तर संभाग से अपने एकमात्र विधायक कवासी लकमा को इस सीट पर खड़ा किया है.

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से रामा सोढ़ी खड़े हुए हैं वहीं छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच के तरफ से सुभाष चंद्रा मौर्या चुनाव लड़ रहे हैं. शेष सभी चार निर्दलीय उम्मीदवार हैं.

शुरू में भारतीय जनता पार्टी को लगा कि सुहानुभूति के आधार पर उनके उम्मीदवार की जीत लगभग पक्की है. वैसे भी बस्तर में 12 विधान सभा सीटों में से 11 भारतीय जनता पार्टी के पास हैं जबकि कांग्रेस के पास सिर्फ एक सीट है.

कड़ा मुक़ाबला

प्रदेश अध्यक्ष का बदला जान और सभी नेताओं का जगदलपुर और बस्तर में डेरा डालना इस बात का संकेत है कि कांग्रेस के लिए यह उपचुनाव कितना महत्व रखता है.

सत्यनारायण पाठक

जब कांग्रेस नें कोंटा के विधायक कवासी लकमा की उम्मीदवारी की घोषणा की तो पूरा खेल ही पलट गया.

ये सीट आदिवासियों के लिए आरक्षित है और बलिराम कश्यप इस इलाके के कद्दावर नेता रहे. उन्हें बस्तर टाइगर के नाम से जाना जाता था क्योंकि वह इस इलाके और यहाँ के आदिवासियों के मुद्दों को लेकर काफी मुखर रहे थे.

कवासी लकमा की छवि भी कुछ ऐसी ही है. लकमा की उम्मीदवारी की घोषणा के साथ ही भारतीय जनता पार्टी नें अपनी रणनीति बदली और मुख्यमंत्री रमन सिंह सहित मंत्रिमंडल के लगभग सभी सदस्यों नें बस्तर में डेरा डाल दिया.

वहीं कई गुटों में बंटी कांग्रेस ने ऐन वक़्त पर अपना प्रदेश अध्यक्ष बदल डाला. पूर्व गृह मंत्री नन्द कुमार पटेल को पार्टी का नया अध्यक्ष बनाया गया.

इतना ही नहीं सभी खेमो के कांग्रेसी नेता बस्तर में कवासी लकमा के लिए पूरे जोर शोर से भिड़े हुए नज़र आ रहे हैं, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ का हर छोटा और बड़ा कांग्रेस का नेता बस्तर के उपचुनाव में लगा हुआ है.

विश्लेषक मानते हैं कि बस्तर के उपचुनाव को लेकर कांग्रेस नें अपना होम वर्क भी ठीक तरह किया. वरिष्ट पत्रकार सत्यनारायण पाठक के अनुसार दंतेवाड़ा के ताद्मेतला में सुरक्षा बलों द्वारा कथित रूप से आदिवासियों के घर जलाने की घटना को लेकर कांग्रेस नें छत्तीसगढ़ की विधानसभा में जो हंगामा किया वह दरअसल बस्तर के उपचुनाव का होम वर्क ही था.

कांग्रेस एकजुट

सत्यनारायण पाठक कहते हैं, "प्रदेश अध्यक्ष का बदला जान और सभी नेताओं का जगदलपुर और बस्तर में डेरा डालना इस बात का संकेत है कि कांग्रेस के लिए यह उपचुनाव कितना महत्व रखता है."

ये उपचुनाव ऐसा पहला मौका है जब एक दूसरे के घोर विरोधी माने जाने वाले अजीत जोगी, रविन्द्र चौबे और महेंद्र करमा एक साथ कवासी लकमा के लिए काम कर रहे हैं.

हालांकि टिकट नहीं मिलने से करमा कुछ नाराज़ ज़रूर हैं.

मगर भारतीय जनता पार्टी भी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है. पार्टी के नेता और राज्य के नगर विकास मंत्री राजेश मूणत का कहना है कि बस्तर में पार्टी का आधार काफी मज़बूत है और बलिराम कश्यप के कार्यों को लेकर जनता के बीच अच्छा संदेश गया है.

वहीं पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता अजीत जोगी नें बीबीसी को बताया कि इस बस्तर की जनता बदलाव के मूड में है.

जोगी कहते हैं कि बस्तर में सरकार का ही अस्तित्व नहीं है और इस इलाके में विकास का कोई काम नहीं हुआ है. वह मानते हैं कि कवासी लकमा के रूप में पार्टी नें एक दमदार उम्मीदवार खड़ा किया है.

दूसरी तरफ भारत की कम्युनिस्ट पार्टी नें भी इस उपचुनाव में काफी जोर लगाया है. एक ज़माने में बस्तर को कम्युनिस्ट पार्टी का गढ़ माता जाता था. पार्टी का दावा है कि ग्रामीण इलाकों में आज भी उसकी काफी मज़बूत पकड़ है.

सभी दलों नें इस उप चुनाव को जीतने के लिए कोई कसार नहीं छोड़ी है. ऐसा माना जा रहा है कि इस उप चुनाव का नतीजा बस्तर की राजनीतिक दिशा और दशा को निर्धारित करेगा.

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