क्या घर लौट जाएँ?

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Image caption सरोज मिश्रा ने सामने से फोटो खिंचवाने से इनकार कर दिया

कोलकाता में आकर बसे बिहारियों को पलट कर देखने पर लगता है बिहार बंगाल से आगे निकल रहा है.

बिहार के दरभंगा से पहले कोलकाता आ कर बसे सरोज मिश्रा के मन में कई बार ये सवाल उठता है कि क्या वापस बिहार लौट जाएँ? क़रीब 15 साल पहले आए सरोज कोलकाता में इन दिनों टैक्सी चलाते हैं और उनका पूरा परिवार यहीं बस चुका है.

उनसे उनकी राजनितिक पसंद पूछने पर सरोज मिश्रा ज़रा परखते हैं और फिर कहते हैं कि वोट तृणमूल को दिया है.

सरोज कहते हैं कि बरसो पहले जब बिहार से निकले थे, तो बिहार की हालत बहुत ही ख़राब थी.

आंदोलन

कोलकाता में आकर बसे और एक मिल में नौकरी कर ली, जो दो ही साल में चली गई क्योंकि मिल आंदोलनों के कारण बंद हो गई.

जब सरोज गाँव से निकले थे तब वहाँ कुछ नहीं था. उन्होंने बताया, "लालू यादव ने सब कबाड़ा कर दिया था. लेकिन नीतीश कुमार के आने के बाद से वहां चीज़ें बदल रही हैं. हर गाँव में सर्व शिक्षा अभियान का स्कूल है. लड़कियों को साइकिल मिली है, ड्रेस मिलती है. मिड डे मील का खाना नहीं मिले तो हंगामा हो जाता है. यहाँ तो कुछ भी नहीं है."

सरोज के तीन बेटे हैं, जो कोलकाता के एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं. वे कहते हैं, "यहाँ कोलकाता से निकलिए. सड़कें नहीं हैं, बिजली नहीं है. सड़क, बिजली होगा तभी तो कल-कारखाना आएगा. इसलिए इस बार यहाँ जनता चेंज चाहती है."

बंगाल और बिहार की राजनीति का फ़र्क समझाते हुए सरोज मिश्रा कहते हैं कि बिहार में पार्टी-पॉलिटिक्स में इतना ख़ून-ख़राबा नहीं है जितना यहाँ है. यहाँ पर आदमी पार्टी को लेकर लड़ता है. वो जानता है कि हमारी पार्टी होगी तो हमको नौकरी देगी. जो किसी पार्टी में नहीं है, वो बेचारे कहीं के नहीं हैं.

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