बंगाल में आख़िरी चरण का मतदान

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भारी बख़्तरबंद गाड़ियों, हज़ारों बंदूकों और हेलिकॉप्टरों की निगरानी के बीच पश्चिम बंगाल में छठे और अंतिम चरण का मतदान शुरू हो गया है. मतदान के लिए लोगों में काफ़ी उत्साह देखा जा रहा है.

लालगढ़ में कई मतदान केंद्रों पर सुबह से ही लंबी-लंबी कतारें देखी जा रही हैं. लालगढ़ के इलाक़े में एक लाख सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है.

इस बार चुनाव आयोग ने मतदान के दिन के लिए एक विशेष होलोग्राम स्टिकर बनवाया है, जो सभी हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों को दिया गया है.

इसकी वजह ये है कि अधिकारियों को आशंका है कि कहीं माओवादी सुरक्षाकर्मियों के वेश में न आ जाएँ.

कई अंदरुनी इलाक़ों में मतदानकर्मियों को मंगलवार तड़के बख़्तरबंद गाड़ियों और कड़ी सुरक्षा के बीच भेजा गया है.

वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग लालगढ़ इलाक़े में एक भी मतदान केंद्र नहीं बना पाया था लेकिन इस बार कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान केंद्र बनाए गए हैं.

माओवादी नेता छत्रधर महतो के क़रीबी मनोज महतो ने कहा है कि ये लोकतंत्र है और जो मतदान करना चाहते हैं वो कर सकते हैं.

यूं तो पश्चिम बंगाल के चुनावों पर राजनीति में रूचि रखने वालों की निगाहें लगी हुईं हैं लेकिन इस अंतिम चरण पर ख़ास नज़रें होने के कई कारण हैं.

पहला करण तो ये है कि ये माओवादियों के गहरे प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है.

दूसरा इस चरण में पश्चिमी मिदनापुर ज़िले के झाड़ग्राम, लालगढ़, निताई, बेल पहाड़ी सहित कई ऐसे इलाक़े हैं, जहाँ माओवादियों, सीपीआई (एम) कार्यकर्ताओं और सुरक्षा बालों के बीच हुई झड़पों में सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं.

आरोप

इसी साल सात जनवरी को पश्चिमी मिदनापुर के निताई गाँव में हुए एक ख़ूनी संघर्ष में छह लोग मारे गए थे. तृणमूल कांग्रेस ने ये आरोप लगाया था कि इन लोगों को सीपीआई (एम) के कार्यकर्ताओं ने मारा था.

तृणमूल कांग्रेस और कई अन्य संगठन ये आरोप लगते रहे हैं कि सीपीएम के कार्यकर्ता यहाँ निजी हथियारबंद दस्ते चला रहे हैं. इन लोगों का ये भी आरोप है कि माओवादिओं के ख़िलाफ़ अर्ध सैनिक बल भी इन हथियारबंद दस्तों की खुल कर मदद ले रहे हैं.

सीपीएम के पश्चिम बंगाल के सचिव और राज्य में सत्ताधारी वाम मोर्चे के समन्वयक बिमान बसु इन आरोपों को नकारते हैं.

उनका कहना है, "साल 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद से माओवादियों और तृणमूल के लोगों ने मिल कर हमारे 400 नेताओं और कार्यकर्ताओं को मार डाला है. तृणमूल ने कभी माओवादियों के ख़िलाफ़ कोई काम नहीं किया है."

मई 2010 में माओवादियों ने ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को पटरी से उतर दिया था जो दूसरी तरफ़ से आ रही मालगाड़ी से टकरा गई थी. इस दुर्घटना में 141 लोग मारे गए थे.

भय का माहौल

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Image caption सुरक्षा व्यवस्था काफ़ी तगड़ी है

राज्य में चुनावों के अंतिम दो चरणों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इन दोनों चरणों में कुल मिला कर 52 सीटें हैं, जिनमे से वाम मोर्च पिछले चुनावों में 48 पर काबिज था.

मंगलवार को प्रत्याशियों का भाग्य तय करने जा रही 14 में से 13 सीटें वाम मोर्चा के कब्जे में थीं.

पश्चिमी मिदनापुर के संथाल आदिवासी बहुल किसी भी इलाक़े में घुसते ही भय की साफ़ तस्वीर लोगों के चेहरों पर देखी जा सकती है.

इस इलाक़े में घूमती बख़्तरबंद गाड़ियों और अत्याधुनिक बंदूकें लिए बुलेटप्रुफ़ हेलमेट पहने अर्धसैनिक बलों की तादाद को देख कर लगता है कि किसी युद्धग्रस्त इलाक़े में आ गए हों.

झाडग्राम विधानसभा में लोग अजनबियों से बात नहीं करते और इलाक़े के राजनीतिक विभाजन का अंदाज़ा गाँवों में लगे झंडों को देखकर लगाया जा सकता है.

कुछ गाँवों से सीपीएम के झंडे और कार्यकर्ता एकदम ग़ायब हैं, वहीं दूसरी तरफ़ कुछ गाँवों में केवल सीपीएम के झंडे हर छत पर दिखते हैं लेकिन माओवादी समर्थक माने जाने वाले जेल में बंद चक्रधर महतो के झंडे पोस्टर कहीं नहीं दिखते.

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