रद्द हो भू अधिग्रहण क़ानून: मेधा पाटकर

भारत के कई हिस्सों में विभिन्न परियोजनाओं के लिए किसानों और आदिवासियों की ज़मीन अधिग्रहण के लेकर विवाद हो चुके हैं. कई लोगों को हिंसा में अपनी जान भी गंवानी पड़ी है- चाहे वो नंदीग्राम हो, सिंगुर, या फिर नोएडा के पास भट्टा परसौल गाँव.

ज़मीन अधिग्रहण को लेकर जहाँ-जहाँ भी भारत में आंदोलन हो रहे हैं वो एक भंयकर साज़िश के ख़िलाफ़ लोगों का ग़ु्स्सा है.

साज़िश ये है कि जिन किसानों, आदिवासियों ने प्राकृतिक संसाधनों के सहारे सादगीपूर्ण जीवन बिताया है, उनके हाथ से वो संसाधन, वो ज़मीन छीनी जा रही है. इसमें राजनेता, नौकरशाह, बिल्डर, कान्ट्रेक्टर सभी शामिल हैं.

भारत में लागू ज़मीन अधिग्रहण क़ानून ब्रितानी राज का है जो 1894 में बना था. उसके बाद से इसमें एक ही बार 1984 में संशोधन हुआ था. लेकिन समस्या ये है कि ये संशोधन निजी कंपनियों के हित में है.

यूपीए सरकार शायद इस बार जो संसद में भूमि अर्जन बिल लाने के बारे में सोच रही है वो भी कंपनियों और निजी हितों के ही पक्ष में है. इसलिए हम इसका विरोध करते हैं और ज़मीन अधिग्रहण क़ानून रद्द कर देना चाहिए.

मौजूदा क़ानून तो ब्रितानी राज से भी बदतर है. आज की हमारी सरकारें तो ज़मीन अधिग्रहण क़ानून का और भी विकृत रूप अपना रही है. ब्रितानी क़ानून में कम से कम भूमि सार्वजिक हित के कामों के लिए अर्जित करने का प्रावधान था.

लेकिन प्रस्तावित स्वरूप में ज़मीन अधिग्रहण के लिए सार्वजनिक हित की परिभाषा बदल दी गई है और निजी हितों को भी सार्वजनिक हित बताया जा रहा है.

लोगों को मिले अधिकार

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किसान सही जनतांत्रिक विकास चाहते हैं जिसमें उनकी सहभागिता और सहमति होनी चाहिए.लोगों क्यों अपनी ज़मीन नहीं देंगे? जैसे दूसरे लोग योजनाओं में पैसा लगाते हैं, वैसे ही किसान अपनी ज़मीन लगाएगा.

लेकिन उसे ये लगना चाहिए कि योजना से जो कुछ भी निकलेगा उसमें उसका भी भला होगा. यानी परियोजना लागू करवाने का अधिकार लोगों का होना चाहिए. ज़ाहिर है कि सवाल उठता है कि क्या ये तय करने का अधिकारक्षेत्र सरकार का नहीं है. मुझे नहीं लगता कि यहाँ सरकार और लोगों के अधिकारों के बीच कोई टकराव है.

क्योंकि अगर हम लोकतंत्र हैं तो इसमें लोग अहम है. संविधान भी लोगों की बात से ही शुरु होता है. संसद, नौकरशाही, न्यायपालिका, मीडिया ये सब लोकतंत्र के स्तंभ हैं लेकिन इसमें लोग कहाँ गए ?

ये हास्यास्पद है कि लोग जनतंत्र के स्तंभ ही नहीं हैं ? अगर लोगों के सवाल और उनकी प्राथमिकताएँ जनतंत्र में मायने नहीं रखतीं तो वो जनतंत्र ही नहीं है.

ज़मीन छीनना भी हिंसा का एक रूप

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कई जगह ज़मीन अधिग्रहण को लेकर हिंसा हुई है. इसमें कभी-कभी राजनीति भी शामिल रहती है.हर हिंसा करने वाले को माओवादी कहा जाता है ये सही नहीं है. ऐसे लोग जो माओ को जानते भी नहीं, वो भी लोगों को उकसाते हैं.

लेकिन फिर भी मैं यही कहूंगी कि आम आदमी और औरत शांति प्रिय होते हैं. पर जब उनकी ज़मीन पर हमला होता है तो क्या वो भी एक प्रकार की हिंसा नहीं है? उस हिंसा को क्या कहा जाना चाहिए ये देश को तय करना है.

सवाल ये भी है कि अगर खेती की ज़मीन पर यूँ ही उद्योग बनते रहे तो क्या देश में खाद्य सुरक्षा का ख़तरा पैदा नहीं हो जाएगा.

हमें ज़मीन अधिग्रहण बिल के लिए और कड़े मसौदे की ज़रूरत है.

( ये लेख बीबीसी संवाददाता वंदना से बातचीत पर आधारित है)

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