जब राहुल चले गए तो बाक़ी क्या करेंगे...

भट्टा-परसौल गाँव के लिए रास्ता किस ओर है....दिल्ली से भट्टा गाँव की ओर जाते समय हमने रास्ते में कई लोगों से पूछा. सबका एक ही जवाब था- वही जहाँ गोली चली? ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ किसानों के आंदोलन के बाद अब मानो यही इस गाँव की पहचान बन गई है.

हमारी गाड़ी गाँव के बाहरी क्षेत्र तक पहुंची ही थी कि वहाँ ज़ोरदार हंगामे की आवाज़ आई. सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर गाँव में प्रवेश करने की कोशिश कर रही थी लेकिन हंगामे के बीच पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया.

इसी शोरशराबे और अफ़रातफ़री के बीच नज़र बचाते, पुलिस से छिपते-छिपाते हम भट्ट गाँव में किसी तरह प्रवेश कर गए. गाड़ी ले जाने की इजाज़त नहीं थी, तो पैदल ही निकल पड़े.

गाँव के द्वार पर जितना हंगामा था, गाँव के अंदर उतना ही सन्नाटा. हर ओर वीराना था. कहने में अटपटा लगता है कि लेकिन कुछ समय तक तो ऐसा था कि कुत्तों की भौंकने की आवाज़ और मेरी तरह भटकते कुछ पत्रकारों की आवाज़ के अलावा कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था.

इसी ख़ामोशी की चीरती फिर कुछ औरतों की आवाज़ कानों में पड़ी. गाँव का पहला ही घर था. मुन्नी नाम की बुर्ज़ग औरत हमें देखते ही फूट-फूट कर रोने लगी.

उसने बताया, "पीएसी आई और जो़र-जो़र से डंडे बरसाए. कई बुज़ुर्गों की मारपीट के बाद मौत हो गई है. ऐसी दौलत में आग लग जाए. हमें ले जाओ यहाँ से. ये क्या हमारे डंडा खाने की उम्र है. मेरे नौ और आठ साल के पोतों का पता नहीं है अब तक कि वो ज़िंदा है या मर गए. मायावती कह रही हैं कि हम ड्रामा कर रहे हैं. पैसे वालों के साथ तो तुमने कुछ नहीं किया. हम कभी मायावाती को वोट नहीं देंगे."

उजड़ गया चमन

मुन्नी के पड़ोस में एक और औरत की छलछलाती आँखें हमें उस तक ले गई. महिला का नाम तो था गुलचमन पर उसका चमन पूरी तरह उजड़ा हुआ था. उसका कहना था कि उसके घर के लोगों को देखते ही देखते आग लगा दी गई.

समय होता तो महिला की दास्तां घंटों सुनी जा सकती थी. लेकिन पास की एक युवती अपने घर ले गई. उसने खून से सने तकिए दिखाए...बताया गया कि पर गोली लगने के बाद घर के पुरुष कई घंटों डर के मारे इन तकियों पर लेटे रहे थे.

चिलचिलाती धूप में जैसे ही मैं एक और घर की ओर बढ़ी, एक फटे से पोस्टर ने हमारा स्वागत किया जिस पर वेल्कम लिखा हुआ था. दीवारों की कालिख बता रही थी कि घर को जलाया गया है. घरवालों ने बताया कि मकान पर ताला होने के बावजूद, उसमें आग लगा दी गई.

'राहुल चले गए तो बाकी क्या करेंगे'?

पूरे गाँव में केवल औरतें ही औरतें थी. पुरुष या तो डर के मारे भाग गए हैं, कुछ जेल में है, कुछ मारे गए और कुछ लापता. 90 साल के जिस बुर्ज़ुग से हम गाँव में मिले उन्हें अब न राहुल गांधी से उम्मीद है और न उन्हें अब मुआवाज़ा चाहिए.

मारपीट में मिले अपने ज़ख्म दिखाते हुए उन्होंने कहा, "जब बहू-बेटियों पर अत्याचार हो रहे हैं तो हमें पैसा-वैसा नहीं चाहिए. जब राहुल गांधी को ही पकड़ कर ले गए तो बाकी नेता क्या करेंगे."

लेकिन भट्टा गाँव में दोपहर की चिलचिलाती धूप में कई किलोमीटर पैदल चलकर आते समय गाँववालों की दास्तां ने मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. आख़िर ज़मीन को लेकर मर मिटने वाला भट्टा पहला गाँव नहीं है....

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