'कुष्ठ रोगी को भी मिले इंसान का दर्जा'

कुष्ठ रोगियों की मरहम पट्टी करते आशीष गौतम.

सिटीज़न रिपोर्ट के ज़रिए आम लोगों के बेमिसाल हौसलों की खोज के लिए इस हफ़्ते हमें ले गई उत्तराखंड और हम पहुंचे गंगा के तट हरिद्वार.

कहते हैं गंगा किनारे मोक्ष की प्राप्ति होती है. हरिद्वार के घाटों पर हमें ऐसे अनगिनत लोग मिले जो उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं और अपनी मौत का इंतज़ार कर रहे हैं.

इन लोगों में एक बड़ी संख्या है कुष्ठ रोगियों की. गंगा के घाट से गुज़रते लोग इन्हें दान देकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन इनसे बात करना तो दूर इनके नज़दीक जाना भी किसी को मंजूर नहीं.

इन्ही लोगों के बीच हमें मिले आशीष गौतम जो कुष्ठ रोगियों को समाज में इंसान का दर्जा दिलाने की कोशिशों में जुटे हैं.

पेश है सिटीज़न रिपोर्टर आशीष गौतम की ये रिपोर्ट.

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'' मेरा नाम आशीष गौतम है. 14 साल पहले मैं हरिद्वार आया और मैंने देखा कि कई सौ की संख्या में कुष्ठ रोगी गंगा किनारे अपने प्राण त्यागने की मनोकामना लिए हरिद्वार आते हैं.

जब मेरे पति को कुष्ठ रोग हुआ तो लोगों ने हमें गांव के नल से पानी भरने को मना कर दिया. हम अस्पताल जाते थे तो हमारा इलाज नहीं करते थे. कहते थे तुम गांव छोड़कर चले जाओ. यहां आकर हम भीख मांग कर अपना गुज़ारा करते हैं.

गीता, कुष्ठ रोगी की पत्नी

कुष्ठ रोग के प्रति घ्रणा के चलते कुष्ठ रोगी पहचान छिपा कर अपने गांव अपने शहर से दूर भाग आते हैं.

अपना गांव छोड़ कर हरिद्वार आई गीता कहती हैं, ''जब मेरे पति को कुष्ठ रोग हो गया तो गांव के लोग हमें नल से पानी नहीं भरने देते थे. गांववालों का कहना था कि हमारे छूने के बाद वो नल से पानी नहीं पी पाएंगे. हम अस्पताल जाते थे तो हमारा इलाज नहीं करते थे. कहते थे तुम गांव छोड़कर चले जाओ. फिर हम यहां आकर एक कुष्ठ आश्रम में रहने लगे. अब भीख मांग कर अपना गुज़ारा करते हैं.''

कुष्ठ रोग में शरीर पर जगह-जगह घाव हो जाते हैं और ऐसे में कुष्ठ रोगियों की प्राथमिक ज़रूरत है इन घावों की मरहम-पट्टी. लेकिन कुष्ठ रोगियों की इन झुग्गी बस्तियों में कोई जाना पसंद नहीं करता. समाज से तिरस्कृत ये लोग इलाज से महरुम रहते हैं

इस समस्या को समझते हुए मैंने सबसे पहले इन लोगों के लिए दवाइयों और मरहम पट्टी का इंतज़ाम किया.

महिला को अगर कुष्ठ रोग हो जाए तो पति उसे तिरस्कृत कर दूसरी शादी कर लेता है लेकिन कुष्ठ रोगी पति के साथ महिला अपना घरबार छोड़कर चली आती है.

झुग्गी बस्तियों में जाकर मैंने खुद इनकी मरहम-पट्टी की और उन्हें दवाइयां उपलब्ध कराईं. धीरे-धीरे लोग मेरे साथ जुड़ने लगे और कई कुष्ठ रोगी खुद प्राथमिक चिकित्सा सीख गए.

फिर हमने एक डिस्पेंसरी शुरु की जो कई लोगों की मदद से अब एक छोटे अस्पताल में बदल चुकी है.

इस अस्पताल में नियमित रुप से आने वाले कुष्ठ रोगी निरंजन दत्त कहते हैं, ''अस्पताल से हमें ज़ख्म साफ़ करने की दवा, पट्टी, ग़ॉज़, मल्हम सब कुछ मिल जाता है. कोई इमरजेंसी होती है तो बड़े अस्पताल जाने का इंतज़ाम भी हो जाता है.''

अपनी ज़िम्मेदारी को मैंने यहीं खत्म होते नहीं पाया. मैंने देखा कि महिला को अगर कुष्ठ रोग हो जाए तो पति उसे तिरस्कृत कर दूसरी शादी कर लेता है लेकिन कुष्ठ रोगी पति के साथ महिला अपना घरबार छोड़कर चली आती है.

इन महिलाओं के लिए भी जीवन कम कठिन नहीं. हमारी कोशिश थी इन महिलाओं को आत्मविर्भर बनाने की ताकि वो भीख मांगने को मजबूर न रहें और इसके लिए हमने गृह उद्योगों की शुरुआत की.

कुछ साल पहले कुष्ठ रोगियों के बच्चों के लिए एक स्कूल भी बनाया गया है.

मेरा मानना है कि समाज में बदलाव और सुधार का काम सिर्फ सरकार के ज़िम्मे नहीं. आम लोग समाज का हिस्सा हैं और उन्हें खुद इस बदलाव के लिए आगे आना चाहिए.

यही वजह है कि 14 साल की मेहनत से तैयार हुए इस ताने-बाने में सरकारी धन का अंशमात्र भी खर्च नहीं किया गया है.

दिव्य प्रेम सेवा मिशन नामक हमारा संगठन आज भी स्वयंसेवकों की मेहनत और आम लोगों की ओर से दिए गए पैसे से ही चलता है.

कुष्ट रोग को लेकर समाज में कई भ्रांतियां है लेकिन सच ये है कि न तो यह रोग छूने से फैलता है और न ही ये लाइलाज है.

एक कहावत है रोग से घ्रणा करो रोगी से नहीं लेकिन भारत में लोग कुष्ठ रोग से ज़्यादा कुष्ठ रोगी से घ्रणा करते हैं.

समाज अगर अपने नज़रिए में बदलाव लाए और कुष्ठ रोगियों के लिए मदद का हाथ बढ़ाए तो ये समस्या जड़ से खत्म हो सकती है.

यही अब जीवन में मेरा लक्ष्य है और जब तक ये लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता मेरा ये मिशन जारी रहेगा.''

आशीष गौतम की इस बेमिसाल कोशिश पर अपनी राय हमें भेजें या भेजें ऐसी ही कोई बदलाव की कहानी. हमसे संपर्क करें hindi.letters@bbc.co.uk पर.

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