माया को झटका, नोएडा में 156 हेक्टेयर का अधिग्रहण रद्द

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Image caption किसानों के आंदोलन में राजनीतिक दल कूदे

उत्तर प्रदेश में नोएडा के भट्टा परसौल में ज़मीन अधिग्रहण का मामला अभी ठंडा नहीं पड़ा था कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा में अधिगृहीत 156 हेक्टेयर ज़मीन की अधिसूचना को रद्द कर दिया है.

कई जाने-माने बिल्डर इस क्षेत्र में अपनी रिहायशी इमारतों को खड़ी करने की योजनाओं की घोषणा कर चुके हैं. मायावती सरकार को इस फ़ैसले से बहुत बड़ा राजनीतिक धक्का पहुँचा है.

न्यायाधीश सुनील अंबवानी और केएन पांडे की पीठ ने जून 10 वर्ष 2009 को ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण की ओर से शाहबेरी गांव की ज़मीन के अधिग्रहण संबंधी अधिसूचना और बाद में इस ज़मीन को कब्ज़ों में लिए जाने के मामले पर ये फ़ैसला सुनाया है.

'किसानों को सुनवाई का हक़ नहीं मिला'

इलाबाद हाई कोर्ट की पीठ ने 21 प्रभावित लोगों की याजिका पर सुनवाई के बाद कहा कि भूमि अधिग्रहण क़ानून के भाग पाँच के तहत शाहबेरी गांव के किसानों को अपनी आपत्ति दर्ज करने का मौक़ा दिया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

फ़ैसले में ये भी कहा गया है कि स्पष्ट होता है कि ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण की मंशा ही नहीं थी कि वह उक्त ज़मीन पर योजनाबद्ध तरीके से समग्र विकास करे.

अदालत ने ये भी कहा है कि प्राधिकरण की मंशा इस पूरी परियोजना में बिल्डरों के ज़रिए केवल बहुमंज़िला रिहायशी कॉंपलेक्स बनाने की थी. इसमें बिल्डरों को ज़मीन 10 हज़ार रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से दी जानी थी और शर्तों में इतनी रियायत दी जानी थी कि केवल पाँच प्रतिशत प्रीमियम देने के बाद वे दी गई ज़मीन के और हिस्से करके इस पर रिहायशी कांपलेक्स बना सकें.

'सरकार संतुलन कायम करे'

अपने फ़ैसले में जजों ने स्पष्ट कहा, "भारत एक बड़ा देश है. शहरी विकास बेढंगे तरीके से हो रहा है. कोई शक़ नहीं कि योजनाबद्ध विकास और घर बनाना प्राथमिकता है. लेकिन क्या योजनाबद्ध तरीके से शहरी विकास के हर मामले में सरकार को इन (आपात स्थिति के) प्रावधानों और भू-अधिग्रहण क़ानून के भाग-5ए के तहत सुनवाई और जाँच को दरकिनार करना चाहिए? हम ऐसा नहीं मानते. सरकार को संतुलन कायम करते हुए आपात स्थिति के प्रावधानों को सोच समझकर ही इस्तेमाल करना चाहिए."

याचिकाकर्ताओं का दावा था कि प्रशासन के रिकॉर्ड के अनुसार इस 156 हेक्टेयर के अधिग्रहण से 211 प्रभावित परिवारों में से 185 के पास कोई ज़मीन नहीं बचेगी और इनमें से 88 परिवार छोटे किसानों के हैं.

अदालत ने ये भी कहा, "सरकार को जनहित में निजी संपत्ति के अधिग्रहण का हक़ है लेकिन याद रहे कि जबरन निजी संपत्ति लेना गंभीर मसला है. यदि ये संपत्ति आर्थिक तौर पर पिछले वर्ग के लोगों की हो तो आदलत को हक़ ही नहीं बल्कि उसका फ़र्ज़ भी है कि वह सरकार के फ़ैसले को परखे क्योंकि इससे भू-स्वामी भूमि विहीन होने और आजीविका खोने की संभावना है."

'औद्योगिक विकास के बहाने निजी हितों के लिए'

जजों की पीठ ने अपने फ़ैसले में सरकार के उस तर्क को दरकिनार कर दिया जिसमें कहा गया था कि जल्द से जल्द भूमि के अधिग्रहण की ज़रूरत थी नहीं तो भूमि पर अवैध कब्ज़ा हो सकता है, सड़कों और अन्य सुविधाओं को सुनिश्चित करने के लिए ऐसा करना ज़रूरी थी, जाने-माने औद्योगिक घराने प्रदेश में पूँजी निवेश करना चाहते हैं और वे कहीं और चले जाते.

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Image caption भू-अधिग्रहण क़ानून के भाग-5 के तहत सुनवाई का मौक़ा अनिवार्य है पर आपात स्थिति में ये निलंबित हो सकता है

जजों का कहना था, "ये तर्क क़ानूनी तौर पर स्वीकार्य नहीं क्योंकि अधिग्रहण ज़िले के औद्योगिक विकास के नाम पर निजी हितों के लिए किया जा रहा था. इसलिए राज्य सरकार की ओर से क़ानून के भाग 17(1) के तहत मामले की उच्च प्राथमिकता को देखते हुए भाग 5 के तहत लोगों को सुनवाई का मौक़ा न देना तर्कसंगत नहीं है."

इस ज़मीन पर कब्ज़ा करने के बाद ग्रेटर नोएडा ऑथॉरिटी ने मुआवज़े की राशि को ज़िले के ख़ज़ाने में जमा करवा दिया था. इसके बाद भूमि अधिग्रहण क़ानून के तहत प्रक्रिया पूरी होने के बाद इस ज़मीन को बड़ी-बड़ी कंपनियों को दे दिया गया.

किसनों के नेता सत्यपाल चौधरी और 20 अन्य प्रभावित लोगों ने इस पूरी प्रक्रिया ग़ैरक़ानूनी बताते हुए चुनौती दी थी.

ग़ौरतलब है कि दिल्ली से सटे नोएडा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई इलाक़ों में आगरा को दिल्ली से जो़ड़ने वाले 156 किलोमीटर के यमुना एक्सप्रेसवे के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण पर बवाल मचा हुआ है.

किसानों का तर्क है कि जहाँ उनसे ज़मीन लगभग 850 रुपए प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से ली गई है, उसी ज़मीन को बिल्डरों को कई गुना दाम पर दिया गया जो आगे इस पर भी मुनाफ़ा कमा रहे हैं.

पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि भूमि अधिग्रहण मूलभूत ढांचे, भारी कारखाने या ऐसे मक़सद के लिए हो तो बात समझ में आती है लेकिन बिल्डरों और मॉल बनाने के लिए उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण समझ से बाहर है.

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