ममता और जयललिता की पार्टियाँ आगे

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भारत की राजनीति की दृष्टि से दो अहम राज्यों पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के राजनीतिक भविष्य का फ़ैसला शुक्रवार को होने जा रहा है.

इन दोनों राज्यों के अलावा केरल, असम और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनाव के बाद मतगणना चल रही है.

फ़िलहाल रुझान मिल रहे हैं. रुझानों पता चल रहा है कि पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने इतनी बढ़त बना ली है कि संवाददाताओं को लग रहा है कि वाममोर्चा एतिहासिक हार की ओर बढ़ रहा है.

रूझानों के अनुसार तमिलनाडु नें जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके आगे चल रही है और करुणानिधि की पार्टी डीएमके पीछे चल रही है.

केरल में वामदलों के नेतृत्व वाले गठबंधन एलडीएफ़ और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूडीएफ़ के बीच अच्छी टक्कर दिखाई दे रही है.

माना जा रहा है कि परिणामों का इन राज्यों के साथ-साथ केंद्र की राजनीति पर असर पड़ेगा.

एक के बाद एक सामने आए कई घोटालों से जूझ रही कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गंठबंधन (यूपीए) सरकार के लिए कई राज्यों में कई कुछ दांव पर लगा है.

हालाँकि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी का इन राज्यों में कोई मज़बूत आधार नहीं है लेकिन कांग्रेस और इसके सहयोगियों को लगा कोई भी झटका उसके सरकार विरोधी अभियान में नई जान फूँकने का काम कर सकता है.

चुनौतियाँ

इन चुनावों में सबसे दिलचस्प लड़ाई है पश्चिम बंगाल की जिस पर सभी की नज़र टिकी हैं.

वहाँ वर्ष 1977 से यानी लगभग 34 साल से लगातार सत्ता में बनी आई मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली वामपंथी मार्चे की सरकार को टक्कर मिल रही है ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन से.

ममता बनर्जी ने ये चुनाव 'परिवर्तन' के नारे पर लड़ा है लेकिन वाम मोर्चे के नेताओं ने इस चुनौती कम से कम अपने भाषणों में तो ख़ारिज किया है.

तमिलनाडु में जयललिता के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया अन्ना डीएमके और पिछले पाँच वर्ष से सत्ता में बनी हुई करुणानिधि के नेतृत्व वाली डीएमके के बीच कांटे की टक्कर है.

केरल में सत्ताधारी वाम मोर्चे का सीधे कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट के साथ सामना है. वहाँ 87 वर्षीय मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन के मैदान में उतरने से जहाँ वाम मोर्चे के फ़ायदा है वहीं उसे सीपीएम की अंतरकलह का नुक़सान भी झेलना पड़ सकता है.

असम में पिछले दस साल से सत्ता में बनी हुई तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस एक विभाजित विपक्ष का सामना कर रही है जिसमें असम गण परिषद भी शामिल है.

केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में सत्ताधारी कांग्रेस का मुकाबला एआईएडीएमके और पूर्व कांग्रेस मुख्यमंत्री एन रंगास्वामी के एआईएनआरसी गठबंधन से है.

इसके साथ ही आंध्र की कडप्पा लोकसभा सीट, छत्तीगढ़ की बस्तर लोकसभा सीट, उत्तर प्रदेश की पिपराइच विधानसभा सीट, आंध्र की पुलिवेंदुलू सीट, नगालैंड की अंगलेंडेन और कर्नाटक की तीन विधानसभा सीटों के उपचुनावों नतीजे भी घोषित किए जाएँगे.

अत्यधिक सुरक्षा इंतज़ाम

भारत के चुनाव आयोग ने मतगणना के लिए 800 से अधिक मतगणना केंद्रों में वोटों की गिनती करने का इंतज़ाम किया है.

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Image caption सीआरपीएफ़ की 177 कंपनियाँ तैनात हैं

वोट इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के ज़रिए डाले गए थे इसलिए सुबह आठ बजे शुरु होने के बाद अधिकतर जगहों के नतीजे दोपहर 12 बजे तक आ जाने की संभावना है.

मतगणना के काम में चुनाव आयोग ने लगभग 44 हज़ार कर्मियों को तैनात किया है और सुरक्षा का काम केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल की 177 कंपनियों के सुपुर्द किया गया है.

मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने कहा है कि पूरी मतगणना प्रक्रिया की वीडियोग्राफ़ी कराई जाएगी ताकि किसी तरह की गड़बड़ी की आशंका न रहे

पश्चिम बंगाल: क्या 'परिवर्तन' होगा?

पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव इस बार सबसे ज़्यादा रोचक बना हुआ है.

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Image caption पश्चिम बंगाल में भारी मतदान हुआ

वहाँ 294 सीटों के लिए छह चरणों में चुनाव कराए गए हैं. लगभग 34 साल से सत्ता में बनी हुई वाम मोर्चा सरकार को ये सबसे कड़ी चुनौती मानी जा रही है.

कांग्रेस और तृणमूलकांग्रेस के गठबंधन का नेतृत्व केंद्रीय रेल मंत्री ममता बनर्जी ने ही किया है और उन्होंने 'परिवर्तन' का नारा दिया है.

पिछले चुनावों में वाम मोर्चे को कुल 294 में से 235 सीटें, कांग्रेस को 21 सीटें और तृणमूलको 30 सीटें मिली थीं जबकि आठ अन्य को हिस्से में आई थीं.

तमिलनाडु: करुणानिधि बनाम जयललिता

तमिलनाडु में पिछले दो दशकों की ही तरह इस बार भी ऑल इंडिया अन्ना डीएमके की जयललिता और डीएमके के मुख्यमंत्री करुणानिधि के नेतृत्व वाले गठबंधन (जिसमें कांग्रेस भी शामिल है) के बीच जंग है.

इस बार इसे कांटे की टक्कर बताया जा रहा है क्योंकि रिपोर्टों के अनुसार सत्ताधारी डीएमके अपनी सरकार की निम्न वर्ग, विशेष तौर पर ग्रामीण वर्ग के लिए कल्याणकारी योजनाओं के सहारे मैदान में है.

उधर जयललिता ने कल्याणकारी योजनाओँ के साथ-साथ डीएमके के अनेक नेताओं के कथित भ्रष्टाचार में लिप्त होने का मुद्दा उठाया है. एआईएडीएमके ने शहरी वोटर को रुझाने, बिजली के संकट का मुद्दा उठाने का प्रयास किया है.

पिछली विधानसभा में कुल 234 सीटों में से डीएमके के पास 99, कांग्रेस के पास 34, पीएमके के पास 18, ऑल इंडिया अन्ना डीएमके के पास 57 और अन्य के पास 26 सीटें थी, यानी डीएमके की सरकार कांग्रेस के समर्थन से ही चल रही थी.

केरल: अच्युतानंदन और पार्टी की अंतरकलह

केरल में कई दशकों से हर पाँच साल बाद सत्ता परिवर्तन जैसे एक नियम बन गया है. लेकिन इस बार अच्युतानंदन के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यडीएफ़ के बीच कांटे की टक्कर बताई जाती है.

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Image caption केरल का चुनाव अच्युतानंदन के इर्दगिर्द घूमा

वैसे भी केरल जैसे उच्च साक्षरता और जागरूकता वाले प्रदेश में कुल वोट के मात्र एक से तीन प्रतिशत इधर-उधर होने से पासा पलट जाता है.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पास जहाँ 87-वर्षीय अच्युतानंदन का नेतृत्व है वहीं पहले उन्हें टिकेट न देकर और बाद में दबाव में आकर मैदान में उतारने से पार्टी को नुक़सान हुआ है. इसी के साथ उनकी संगठन के नेता पिनारायी विजयन के साथ पूरे पाँच साल चले द्वंद्व का असर भी वाम मोर्चे को झेलना पड़ सकता है.

कांग्रेस के पास करुणाकरन के निधन के बाद इस तरह वरिष्ठ नेता की कमी है. हालाँकि पार्टी ने सत्ताधारी गठबंधन की ख़ामियों को उजागर करने का प्रयास किया है.

केरल की कुल 140 सीटों में से पिछले चुनाव में वाम मोर्चे को 91 और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ़ को 49 सीटें मिली थीं.

असम: कांग्रेस का सामना बिखरे हुए विपक्ष से

असम में तरुण गोगोई तीसरी बार कांग्रेस को सत्ता दिलाने के प्रयास में जुटे हैं.

असम में पिछली बार कुल 126 सीटों में से कांग्रेस को 54 सीटें मिली थीं लेकिन निर्दलीयों ने जल्द ही कांग्रेस का दामन थाम कर उसकी सीटों की संख्या को 64 कर दिया था.

असम गणपरिषद को पिछली बार 24 सीटें मिली थी और वह अब भी पुरानी मज़बूती और आधार के साथ खड़ी नज़र नहीं आ रही है.

बोडोलैंड पीपुल्स फ़्रंट को 10 सीटें मिली थीं, भारतीय जनता पार्टी को छह और अन्य को 22 सीटें मिली थीं.

भाजपा इस बार में असम में मैदान में उतरी है.

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