गिलास आधे से ज़्यादा खाली है..

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चेन्नई सुपर क्वीन, दीदी की ‘जया’ हो, वुमेन पावर,.ममता की आँधी, वगैरह-वगैरह....राज्य चुनावों के नतीजों के बाद से अख़बार, ट्विटर, फ़ेसबुक इस तरह के जुमलों से पटे पड़े हैं.

बंगाल में दीदी, तमिलनाडू में अम्मा, दिल्ली में शीला, यूपी में बहनजी, यूपीए में मैडम...कहा जा रहा है कि भारत में महिला शक्ति का बोलबाला है.

इस बात में कोई शक नहीं है कि कई महिला राजनेताओं ने पिछले कुछ बर्षों में अपना दबादबा कायम किया है. और सबका अंदाज़ भी जुदा रहा है.

मायावती ने कांशीराम से मिली राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया और उत्तर प्रदेश में बहुमत हासिल कर वो कर दिखाया जो बरसों में कोई न कर पाया था. उनके जन्मदिन की आलीशान पार्टी, गुलाबी रंग का उनका पर्स, गले में नोटों के हार, मूर्तियाँ....ये मायावती की हस्ती की पहचान हैं.

लेकिन लोग अंतत उन्हें इस कसौटी पर नहीं परखेंगे कि वो महिला मुख्यमंत्री थी या पुरुष मुख्यमंत्री, और न ही इस बात पर कि उनकी हस्ती कितनी अनोखी थी. बल्कि इस बात पर परखेंगे कि उनका कामकाज कितना अनोखा था....अगर इस बात का जवाब हाँ तो ही वे महिला मुख्यमंत्री होने पर गर्व महसूस कर सकती हैं. वरना.....

मंज़िल अभी दूर

वहीं जयललिता का व्यक्तिव भी कम रंगीला और विवादित नहीं है. कथित तौर पर एक हज़ार साड़ियाँ और सैकड़ों जोड़ी जूते अपने घर में रखने वाली जयललिता ने तमिल राजनीति में बार-बार अपना लोहा मनवाया है. लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों ने उन्हें हमेशा घेरा है.

जयललिता की रंगीन नफ़ासत से पहनी साड़ियों, उनके सामने नतमस्तक होते नेताओं की छवि के ठीक उलट हैं ममता बनर्जी. बल पड़ी मामूली सी साड़ी, पैरों में हवाई चप्पल, अपने कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष करती.. यही उनकी पहचान रही है.

लेकिन जल्द ही लोगों के बीच उनकी पहचान यही होगी कि क्या वे एक अच्छी मुख्यमंत्री साबित होंगी या नहीं. महिला मुख्यमंत्री अच्छी प्रशासक साबित होगी राजनीति में इस बात की कोई गारंटी नहीं होती.

दरअसल महिला नेताओं की आई इस बहार में ऐसा माना जा रहा है मानो महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण पूरा हो गया है, लेकिन ये केवल फौरी उत्साह है और इसे हक़ीकत के चश्मे से देखने की ज़रूरत है.

संसद में कितनी महिला सदस्य हैं, कैबिनट में कितनी महिलाएँ हैं, विधानसभाओं में कितनी महिलाएँ चुनकर आ पाती हैं, कितनी महिलाएँ बिना पारिवारिक या राजनीतिक विरासत की मदद के बगैर शीर्ष तक पहुँच पाई हैं....ये अहम सवाल हैं.. कई अन्य देशों से तुलना करें तो भारत इस मामले में काफ़ी पीछे है.

ज़ाहिर है महिला नेताओं के चुनावों में जीतने से महिला सशक्तिकरण को बल ज़रूर मिला है लेकिन मंज़िल अभी दूर है. देश की करीब- करीब आधी आबादी

को इतना कम प्रतिनिधित्व ...बात कुछ जमती नहीं है. गिलास थोड़ा बहुत भरा हुआ ज़रूर नज़र आ रहा है लेकिन आधे से ज़्यादा अब भी खाली ही है.