'हमारे रिश्ते कई सदियों पुराने हैं'

मनमोहन सिंह, अफ़ग़ानिस्तान में (फ़ाइल फ़ोटो) इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption मनमोहन सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान संसद को संबोधित किया.

भारत के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने 13 मई को काबुल में अफ़ग़ानिस्तान की संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया था. इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने भारत और अफ़ग़ानिस्तान के सदियों पुराने रिश्ते का ज़िक्र किया. उनके सम्बोधन के मुख्य अंश इस प्रकार है:

"मुझे आज अफ़ग़ानिस्तान की संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करने का जो सम्मान दिया गया है, उससे मैं अभिभूत हूँ.

मुझे मालूम है कि यह किसी विदेशी नेता को मिलने वाला एक दुर्लभ सम्मान है. मैं भारत के प्रति प्रदर्शित इस प्रेम और स्नेह के लिए आपका आभारी हूं.

वोलेसी जिरगा और मेशरानो जिरगा के आप सभी माननीय सदस्य इस महान और प्राचीन देश की शानदार विविधता, उम्मीदों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं.

मैं आप लोगों के लिए भारत की जनता की ओर से बधाई और शुभकामनाएँ लेकर आया हूं.

अफ़ग़ानिस्तान संस्कृति, विरासत, वास्तुकला और प्राकृतिक संसाधनों से व्‍यापक पैमाने पर संपन्न देश है.

अफ़ग़ानिस्तान सभ्यता का एक केंद्र रहा है. इसने दरी तथा पश्तो के साहित्य, चिश्‍तियों की सूफ़ी परंपराएं, बामियान में बुद्ध और बौद्ध कला की विरासत, गांधार कला विद्यालय और तमाम समृद्धि के तत्‍व इस क्षेत्र और पूरी दुनिया को दिया है.

अफ़ग़ानिस्तान दक्षिण और मध्य एशिया का मिलन बिंदु तथा इस दिशा से भारत में प्रवेश का द्वार बना हुआ है.

इतिहास और संस्कृति के क्षेत्रों में हमारे रिश्ते कई सदियों पुराने हैं.

मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बादशाह बाबर को यहीं काबुल में उनके पसंदीदा बाग़ में दफनाया गया है.

शेरशाह सूरी ने अपने पांच साल के शानदार शासनकाल में काबुल से दिल्ली के लिए ग्रैंड ट्रंक रोड बनवाया था.

इसने धार्मिक विचारों के आदान प्रदान के साथ, मालढुलाई, राजाओं तथा आम लोगों के लिए बेहतर यात्रा जैसी सुविधाएं उपलब्‍ध कराई.

काग़ज़ी बादाम और कांधारी अनार जैसे स्‍वादिष्‍ट खाद्य भारत में बेहद लोकप्रिय हैं.

महात्मा गांधी के साथ अपनी मित्रता की वजह से सीमांत गांधी के रूप में विख्‍यात बादशाह ख़ान को भी उनकी इच्छा के अनुसार जलालाबाद में दफ़नाया गया था.

संबंधों की विरासत

हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंधों की एक समृद्ध विरासत छोड़ी है.

इन सभ्‍यतागत संबंधों ने हमारी सांस्कृतिक परंपराओं, विश्‍वासों, भूगोल और हमारी मनोदशा को लगभग एक जैसा कर दिया है.

नेताओं और जनप्रतिनिधियों के रूप में, हमारा पवित्र कर्तव्य है कि हमारी जनता के बीच सदियों से चले आ रहे इस समृद्ध बंधन को और मज़बूत करने के लिए प्रयास करें.

मैं दोस्ती, एकता और भाईचारे के इन संबंधों को नवीनीकृत करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान आया हूं. यह मेरे यहां आने का एकमात्र एजेंडा है और भारत तथा अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के बीच भी केवल यही एजेंडा है.

अफ़ग़ानिस्तान ने बहुत बड़ी परीक्षाएं और पीड़ाएं झेली हैं, लेकिन हम जानते हैं कि अफ़ग़ान लोग स्‍वाभिमानी, बहादुर और पूरी तरह स्वतंत्र हैं.

हम जानते हैं कि वे प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने में मज़बूत और विवेकी रहे हैं. इन गुणों की भारत में व्यापक रूप से प्रशंसा की जाती है.

दस साल पहले अफ़ग़ानिस्तान ने अतीत को भुलाकर बेहतर भविष्‍य पर ध्‍यान केन्‍द्रित किया था, तबसे इसने कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति की है.

बेशक यहाँ आगे कई चुनौतियां हैं. राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया काफ़ी लंबी और बाधाओं से भरी है. राष्ट्र पुनर्निर्माण के लिए कड़ी मेहनत, त्‍याग और निरंतर सीखने की प्रक्रिया की ज़रूरत है.

हम दोनों देश विकास के मामले में एक जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. भारत अफ़ग़ान लोगों को उनकी प्राथमिकताओं और राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार उनके देश के पुनर्निर्माण में सहयोग के लिए तैयार है.

अफ़ग़ानिस्तान की प्राथमिकताओं में से कई हमारी भी प्राथमिकताएं हैं और आपकी समस्याएं हमारे लिए भी समस्याएं है.

हम पूरी तरह से सुरक्षित, समृद्ध और लोकतांत्रिक भविष्य वाले अफ़ग़ानिस्तान तथा यहां की सरकार द्वारा शुरू किए गये राष्‍ट्रीय प्राथमिकता कार्यक्रमों का पूरी तरह समर्थन करते हैं.

सहभागी लोकतंत्र

नीतियों के कार्यान्वयन के मामले में भारत में हमारा अनुभव रहा है कि ज़मीनी स्तर पर सहभागी लोकतंत्र सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण का एक महत्वपूर्ण एजेंट है.

इसने प्रशासन को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाया है. अफ़ग़ानिस्‍तान की संसद में पहले से ही महिलाओं के लिए आरक्षण की व्‍यवस्‍था है.

हमने पाया है कि भारत में स्थानीय निकायों में इसी तरह के आरक्षण की व्‍यवस्‍था एक नए मानवीय मूल्‍य के साथ विकास को नई गति दे रही है.

अफ़ग़ानिस्‍तान में 2002 के बाद स्कूल में नामांकन दस लाख से बढ़कर 70 लाख हो गया है और लड़कियों के नामांकन की दर भी पिछले चार वर्षों में दोगुनी हो गई है.

मुझे मालूम है कि हर बच्चे को स्कूल में दाख़िला दिलाना और उसे वहाँ बनाए रखना आपकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है.

भारत में मध्याह्न भोजन योजना हमारे स्कूलों में बहुत ही सफल रहा है. हम पिछले कुछ वर्षों से अफ़ग़ानिस्‍तान के स्कूली बच्चों के लिए पौष्टिक बिस्कुट की आपूर्ति करते रहे हैं.

बच्चों का पाठ्यक्रम

लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हम अपने बच्चों को क्या पढ़ा रहे हैं.

भारत में हमने हाल ही में स्कूलों के पाठ्यक्रम को नए सिरे से तैयार किया है. स्कूलों में बच्चों को जो सिखाया जाता है उनका उनके जीवन से भी संबंध होना चाहिए.

उनमें राष्ट्रीयता की भावना, सहिष्णुता के मूल्य और दूसरों के लिए सम्मान की भावना आत्मसात होनी चाहिए.

उन्‍हें पर्यावरण के महत्व के बारे में भी बताया जाना चाहिए. शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बच्‍चों में रचनात्मक विचार भरे और कल्पना के लिए उन्‍हें दिमाग़ खुला रखने के प्रति प्रोत्साहित करना चाहिए.

हमारे देशों की उम्‍मीदें और सपने हमारे छोटे बच्चों के कंधों पर टिकी हुई हैं. इसलिए हमें उन्हें अच्छी तरह से शिक्षित करने की ज़रूरत है.

मुझे मालूम है कि अफ़ग़ानिस्तान ने पिछले एक दशक में आम लोगों को स्वास्थ्य देखभाल सुविधा प्रदान करने में उल्‍लेखनीय प्रगति की है.

इंदिरा गांधी बाल स्वास्थ्य संस्‍थान को मज़बूत करने और विभिन्न प्रांतों में हमारे मेडिकल मिशन के काम को गति देने से हमें खुशी होगी.

बुनियादी ढांचा

बुनियादी ढांचे का निर्माण हमारे सामने एक और प्रमुख चुनौती है. हम अफ़ग़ानिस्तान को बिजली और सड़क के क्षेत्र में सहयोग प्रदान कर सकते हैं और हमने इस रूप में सहायता उपलब्ध कराने की कोशिश की है.

मुझे खुशी है कि पुल-ए-ख़ुमरी पर बनी संचरण लाइन के ज़रिए अब राजधानी तक बिजली की सतत आपूर्ति की जा रही है.

मुझे खुशी है कि जरांज- डेलाराम हाईवे के निर्माण में किया गया बलिदान व्‍यर्थ नहीं हुआ है.

जरांज की जनसंख्या बढ़ गई है, व्यापार समृद्ध हो रहा है और सीमा शुल्क राजस्व में बढ़ोतरी हुई है.

भारत के लोग यह देखकर गर्व महसूस कर रहे हैं कि विकास की प्रक्रिया में उनके सहयोग का अफ़ग़ानिस्तान में इतनी गर्मजोशी से स्वागत किया जा रहा है.

कोई भी बात हमें इससे अधिक संतुष्टि नहीं देगी कि भारतीय संसाधनों का प्रयोग अधिक सड़कें, अधिक बिजली, अधिक स्कूलों, अस्पतालों या अधिक से अधिक सामुदायिक परियोजनाओं के लिए उपयोग किया जा रहा है और इन गतिविधियों से सीधे आम अफ़ग़ान लोगों को फ़ायदा होगा.

हम क्षमता और कौशल विकास की दिशा में विकास परिव्यय में वृद्धि करेंगे. इसके तहत भारत में अध्ययन के लिए अफ़ग़ान छात्रों को अधिक छात्रवृत्ति, संस्था निर्माण के प्रयासों, सामाजिक विकास और एक चिकित्सा पैकेज के माध्यम से स्वास्थ्य के क्षेत्र में उच्च निवेश आदि पर ध्‍यान दिया जाएगा.

हम काबुल और अन्य नगरपालिकाओं के लिए बस प्रदान करेंगे.

हम काबुल विश्वविद्यालय के कृषि विभाग को कृषि विश्वविद्यालय के रूप में समुन्नत करने, किसानों को ट्रैक्टर देने के साथ ही कृषि विज्ञान के अध्ययन के लिए छात्रवृत्तियां देने का प्रस्‍ताव कर रहे हैं.

हम ज़मीनी स्तर पर स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ विकास को बढ़ावा देने के लिए सभी प्रांतों में हमारी लघु विकास परियोजनाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करेंगे.

हम अफ़ग़ानिस्तान की पुरातात्विक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा काबुल के ऐतिहासिक स्‍टॉर पैलेस के पुनरुद्धार में मदद करेंगे.

अफ़ग़ानिस्तान सरकार के परामर्श से अगले कुछ वर्षों में शुरू की जाने वाली इन अन्य अतिरिक्त योजनाओं के लिए कुल परिव्यय 50 करोड़ अमरीकी डॉलर होगा. इससे अफ़ग़ानिस्‍तान की सहायता में हमारी कुल प्रतिबद्धता दो अरब अमरीकी डॉलर पहुंच जाएगी.

अतिवादी विचारधारा

समृद्धि और विकास की हमारी महत्वाकांक्षाएं तब तक नहीं पूरी हो सकती हैं जब तक कि शांति और सद्भाव के वातावरण में हमारे लोगों को सम्मान और गरिमा के साथ जीने और काम करने का माहौल नहीं मिल जाता.

मैं उन सभी निर्दोष पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को श्रद्धांजलि देता हूं जिन्‍होंने एक बेहतर कल की खोज में अपना जीवन खो दिया है. भारत के लोग उनके अफ़ग़ान भाइयों और बहनों की पीड़ा तथा कष्‍टों को समझते हैं तथा उनसे सहानुभूति रखते हैं.

हमारे लोगों को आतंकवाद और अतिवाद जैसे विचार बिल्‍कुल प्रतिकूल लगते हैं. ये विचार अपने प्रसार से केवल मौत और तबाही लाते हैं.

ये ग़रीबी, अशिक्षा, भूख और बीमारी की समस्याओं का कोई समाधान नहीं प्रदान करते हैं. एक सभ्य समाज में उनकी कोई जगह नहीं है.

आख़िरकार, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और एक दूसरे के साथ शांति तथा सद्भाव में रहने की हमारी सदियों पुरानी परंपराएं इन विकृत विचारधाराओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और टिकाऊ होंगी.

हम न तो अतिवाद और आतंकवाद की आग को फिर से फैलने की अनुमति दे सकते हैं और न ही किसी सूरत में हमें ऐसा होने देना चाहिए.

सुलह की कोशिश

अफ़ग़ानिस्तान ने राष्ट्रीय सुलह की प्रक्रिया पर अमल शुरू किया है.

हम इस लक्ष्‍य के लिए आपको शुभकामनाएं देना चाहते हैं. जनप्रतिनिधि होने के नाते यह आप पर निर्भर है कि अपने देश के भविष्य के बारे में आप बाहरी हस्तक्षेप या प्रभाव के बिना निर्णय करें.

यह आपका संप्रभु अधिकार है. आप जो भी विकल्प चुनेंगे और निर्णय लेंगे भारत उनका आदर करेगा.

हमारी एकमात्र दिलचस्‍पी है कि अफ़ग़ानिस्तान अपने पड़ोसियों के साथ स्थिर, शांतिपूर्ण और स्वतंत्र रूप में रहे.

हमें उम्मीद है कि अफ़ग़ानिस्तान क्षेत्रीय सहयोग की एक रूपरेखा तैयार करेगा जिससे इसके राष्ट्र के निर्माण के प्रयासों में मदद मिलेगी.

अफ़ग़ानिस्तान अपनी सुरक्षा की पूरी ज़िम्मेदारी संभालने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और हम इस क्षेत्र में अपने सहयोग का विस्तार करने के लिए तैयार हैं.

सार्क में प्रवेश

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) में अफ़ग़ानिस्तान का प्रवेश एक ऐतिहासिक कदम था.

हमें अपने साझे भविष्य के लिए निश्‍चित रूप से निवेश और साथ मिलकर काम करना चाहिए.

दक्षिण एशिया के देश जब आपस में एक दूसरे से और शेष दुनिया से अच्‍छी तरह जुड़े रहे हैं, वे सबसे समृद्ध और स्थिर देशों में शुमार हुए हैं.

भूगोल और इतिहास गवाही देते हैं कि हम अपनी साझा ज़रूरतों के लिए सहयोग करते रहें हैं.

यदि हम अपनी साझा क्षेत्रीय पहचान का निर्माण कर रहे हैं, तो हमें एक दूसरे के बारे में अधिक जानने की ज़रूरत है.

मैंने कई बार कहा है कि हम पश्चिम के देशों के बारे में जितना जानते हैं उसकी तुलना में एक दूसरे के बारे में कम ही जानकारी हमारे पास है. यही कारण है कि दोनों देशों के लोगों के बीच परस्‍पर संपर्क को बढ़ावा देना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

मैं और राष्ट्रपति करज़ई कल सामरिक भागीदारी के एक घोषणा पत्र पर सहमत हुए हैं.

हम सभी क्षेत्रों में परस्‍पर सम्मान और समानता के आधार पर अपने संबंधों को पुनर्जीवित करने पर सहमत हुए हैं.

यह दीर्घकालिक साझेदारी होगी. अधिक से अधिक राजनीतिक संपर्क, व्यापक आर्थिक भागीदारी, व्यापार विकास रणनीति, सामाजिक विकास रणनीति, कृषि आउटरीच रणनीति, सांस्कृतिक विकास और नागरिक संस्‍थाओं के बीच भागीदारी की रणनीति आदि इसके मुख्य स्‍तंभ होंगे.

दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के अधीन एक साझेदारी परिषद भी स्थापित की जाएंगी.

मैं बुद्धिजीवियों, युवाओं, महिलाओं और मीडिया समेत आम लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के निर्णय को विशेष रूप से रेखांकित करना चाहता हूं.

संसदीय विनिमय बेहद उपयोगी और सहायक होते हैं. मैं आपको भारत- अफ़ग़ानिस्तान संसदीय मैत्री मंच के गठन पर सहमति बनाने के लिए सुझाव देना चाहूँगा.

हम अपने कारोबारी और व्यापारी समुदाय के बीच संबंधों को नए आयाम देना चाहते हैं ताकि भारत की आर्थिक वृद्धि से अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से लाभ उठा सके.

मुझे ख़ुशी है कि अफ़ग़ानिस्तान के लोग युद्ध के विनाश से अब उबर रहें हैं और अपने देश को संस्कृतियों के समागम, वाणिज्य और विकास के एक कें‍द्र के रूप में विकसित कर रहें हैं जहां इस क्षेत्र के अन्‍य देश भी एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा के बजाए सहयोग करने के लिए तैयार रहेंगे.

भारत हमेशा इस नेक कार्य में पक्‍के मित्र के रूप में आप के साथ खड़ा रहेगा.

हम हमेशा अपने अफ़ग़ान मित्रों के साथ डटे रहें हैं और मैं फिर से कहना चाहता हूं कि हम भविष्य में भी ऐसा ही करेंगे.

मैं एक बार फिर आपके साथ अपने विचारों को साझा करने का यह महान सम्मान देने के लिए आपका धन्यवाद करना चाहता हूं.

मुझे अपने साथ व्‍यक्‍तिगत मित्रता के लिए मैं राष्ट्रपति करज़ई का आभारी हूँ और इस ख़ूबसूरत देश में अपने प्रवास के दौरान मेरे हार्दिक आतिथ्य के लिए यहां के लोगों और अफ़ग़ानिस्तान की सरकार को धन्यवाद देता हूं.

भारत-अफ़ग़ानिस्तान दोस्ती दीर्घायु हो.''

भारत के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने अपने दो दिवसीय अफ़ग़ानिस्तान यात्रा के दौरान 13 मई को काबुल में अफ़ग़ानिस्तान की संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया था. ये उसी संबोधन के मुख्य अंश है.

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