राजपक्षे पर जयललिता की मांग का मतलब

श्रीलंकाई तमिल
Image caption लिट्टे के ख़िलाफ़ युद्द के दौरान श्रीलंका की सेना पर आरोप है कि उसने बहुत ज्यादतियां की थी.

तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने के बाद मुख्यमंत्री जयललिता ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए श्रीलंका में तमिलों के कथित जनसंहार के लिए श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे पर केंद्र सरकार से कार्रवाई की मांग की है.

मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद अपने पहले संवाददाता सम्मेलन में जयललिता ने कहा, ''श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे पर युद्ध अपराध का मुक़दमा चलना चाहिए और उन्हें अंतरराष्ट्रीय क़ानून के समक्ष लाया जाना चाहिए.''

जयललिता ने आगे कहा कि भारत अब और मूक दर्शक नहीं बना रहेगा और ज़रूरत पड़ने पर श्रीलंका की आर्थिक नाकेबंदी की जानी चाहिए.

जयललिता के इस बयान का क्या प्रभाव पड़ेगा और यह भारत-श्रीलंका के संबंधों को किस तरह प्रभावित करेगा?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिन पर आने वाले महीनों में ख़ूब चर्चा होगी. जयललिता के सत्ता मे आने के बाद संभावना है कि श्रीलंका के प्रति भारत की नीति थोड़ी बदलेगी.

जयललिता हमेशा से श्रीलंका के मामले में केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचक रहीं हैं.

विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान वो अपने प्रतिद्वंदी डीएमके को हमेशा यह कहकर रक्षात्मक स्थिति में ला देती थी कि 'हज़ारों श्रीलंकाई तमिलों की जान बचाई जा सकती थी अगर करूणानिधि केंद्र सरकार से समर्थन वापसी की बार बार धमकी देने के बजाए इस बारे में गंभीरता से सोचते.'

मुख्यमंत्री बनने के फ़ौरन बाद श्रीलंका के बारे मे उनके बयान से लगता है कि जयललिता केंद्र सरकार से निपटने के लिए इसे एक अहम मुद्दा बनाएंगी.

अपने नए कार्यकाल में अपने तमाम चुनावी वादों को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए जयललिता काफ़ी दृढ़संकल्प नज़र आ रहीं हैं.

यहां तक कि इसके लिए उन्होंने 18 महिनों की समयसीमा भी तय कर ली है. दफ़्तर जाने के पहले ही दिन उन्होंने ढेर सारे आदेश जारी किए जो ग़रीबों के लिए बहुत सी मुफ़्त सेवाएं मुहैया कराएगा.

Image caption जयललिता, श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे के ख़िलाफ़ युद्ध अपराध का मुक़दमा चलाने की मांग कर रहीं हैं.

ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए 20 किलो मुफ़्त चावल और बुज़ुर्गों के लिए पेशन में बढ़ोतरी संबंधित आदेश भी उन्होंने पहले ही दिन जारी कर दिए.

और श्रीलंका का मुद्दा भी अगर उनके 18 महीनों के कार्यक्रम में शामिल है जैसा कि लगता है तो आने वाले दिनों में केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच हमें बयानबाज़ी का दौर देखने को मिल सकता है.

चूंकि वह केंद्र की गठबंधन सरकार में शामिल नहीं है इसलिए अपनी सुविधा के अनुसार वो जब चाहेंगी केंद्र सरकार को श्रीलंकाई तमिल के मुद्दे पर परिशान करेंगी.

श्रीलंकाई तमिलों के मामले में वह पहले ज़्यादातर उदासीन हीं रहीं हैं, हालाकि वह कच्चाटीवू को भारत वापस किए जाने की लगातार मांग करती रहीं हैं.

इसका एक मुख्य कारण तमिल छापामार गुट लिट्टे का उदय रहा है जिसका उन्होंने कभी समर्थन नहीं किया.

उनसे आशा भी यही थी क्योंकि एआईएडीएमके के संस्थापक और जयललिता के राजनीतिक गुरू एमजी रामचंद्रन ने 1987 के भारत-श्रीलंका समझौता और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का पूरी तरह समर्थन किया था.

2002 में जब जयललिता मुख्यमंत्री थीं उन्होंने एमडीएमके के नेता वायको को लिट्टे और उनके प्रमुख प्रभाकरण का समर्थन करने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया था.

लिट्टे भारत में एक प्रतिबंधित संगठन है.

लेकिन 2006 में जब उन्होंने वायको से समझौता किया तब लिट्टे के प्रति उनका रूख़ पूरी तरह बदल गया.

Image caption युद्द के दौरान हज़ारों तमिलों को देश छोड़कर भागना पड़ा था

हालाकि जयललिता ने 2011 के चुनाव में वायको का साथ छोड़ दिया लेकिन श्रीलंकाई तमिलो के प्रति उनके दिल में शायद सच्ची हमदर्दी अब भी बाक़ी है.

लेकिन क्या यह सिर्फ़ एक राजनीतिक ज़रूरत है?

हालांकि जयललिता मनमौजी फ़ैसले करने और फिर उन्हें वापस लेने के लिए काफ़ी मशहूर हैं लेकिन श्रीलंकाई तमिलों के बारे में उनके ताज़ा बयान को सिर्फ़ राजनीतिक अवसरवादिता कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता.

उनके साथ अभी वायको भी नहीं हैं जो तमिलों के मामले में उनकी राय को प्रभावित कर सकें और विधान सभा चुनाव में इतनी बड़ी जीत हासिल करने के बाद उन्हें राजनीतिक दिखावे की भी ज़रूरत नहीं है.

इसलिए यह नतीजा निकाला जा सकता है कि श्रीलंका में लिट्टे के ख़िलाफ़ युद्ध के दौरान मानवाधिकार हनन और युद्ध अपराध पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट आने के बाद हज़ारों भारतीयों की तरह जयललिता का दिल भी सच मुच में पिघल गया हो.

इसलिए भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को श्रीलंकाई तमिलों के मामले में अब पहले से ज़्यादा सावधानी बरतने की ज़रुरत है.

शायद यही कारण है कि भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने तीन दिनों के भारत दौरे पर आए श्रीलंकाई विदेश मंत्री जीएल पेरिज़ से मुलाक़ात के दौरान उनसे कहा कि भारतीय मछुआरों के मामले में संयम से काम लें.

भारतीय मछुआरे अक्सर श्रीलंका के इलाक़े में चले जाते हैं और श्रीलंका की नौसेना या तो इन पर फ़ायरिंग कर देती है या उन्हें पकड़ लेती है.

'भारत के लिए परीक्षा की घड़ी'

भारत के लिए परीक्षा की घड़ी तब आएगी जब कथित युद्ध अपराध से संबंधित रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार फ़ोरम में रखी जाएगी.

पिछली बार भारत ने श्रीलंका का साथ दिया था लेकिन इस बार भारत का रूख़ क्या होगा इसी सवाल पर श्रीलंका विदेश विभाग के अधिकारी आपस मे विचार विमर्श कर रहें होंगे.

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Image caption करुणा की करारी हार से हो सकता है कि कॉंग्रेस और जयाललिता क़रीब आएं

डीएमके की करारी हार से भविष्य में यूपीए में उसकी स्थिति पर काफ़ी असर पड़ेगा.

2-जी घोटाले को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ करने और डीएमके नेता करूणानिधि को बिना शर्त समर्थन देते रहने के कारण पहले ही कॉग्रेस की छवि को काफ़ी धक्का लग चुका है.

करूणानिधि की बेटी कनिमोड़ी और पार्टी के कोटे से केंद्र में संचार मंत्री रहे ए राजा 2-जी घोटाले में मुख्य संदिग्ध हैं.

इसके अलावा तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में कॉग्रेस को राज्य में अब तक की सबसे शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है.

इसलिए राज्य में एक विश्वसनीय पार्टी बने रहने के लिए कॉंग्रेस को डीएमके के साथ अपने रिश्ते को लेकर बहुत गंभीरता से विचार करने की ज़रुरत है.

लेकिन साथ ही डीएमके के पास इतनी संख्या में सांसद हैं जो केंद्र की यूपीए सरकार के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं.

जयललिता की जीत पर कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने फ़ोन कर उनको बधाई दी थी जिससे कहा जा रहा है कि डीएमके काफ़ी नाराज़ है.

डीएमके को लगता है कि कॉंग्रेस इसी बहाने जयललिता से संबंध बढ़ाने की कोशिश कर रही है.

मीडिया में तो यहां तक ख़बरें आ गई कि डीएमके केंद्र सरकार से अपने मंत्रियों को अलग कर सिर्फ़ बाहर से समर्थन देते रहने का मन बना रहा था.

हालांकि यह यक़ीन करना मुश्किल है कि डीएमके इस तरह की कोई बात सोच रही होगी क्योंकि इस वक़्त उसे केंद्र सरकार में बने रहने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है क्योंकि 2-जी केस तेज़ी से आगे बढ़ रहा है.

इसी तरह जयललिता को भी अपने बहुत सारे चुनावी वादों को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार की ज़रूरत पड़ेगी और उन्हें केंद्र सरकार से काम चलाने लायक़ संबंध बनाने होंगे.

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Image caption 2-जी घोटाले में ए राजा के फंसने से कॉंग्रेस की छवि काफ़ी ख़राब हुई है.

इसलिए पेट्रोल की क़ीमत में बढ़ोतरी जैसे आम जनता से जुड़े मुद्दे छोड़ कर जयललिता दूसरे मुद्दों पर केंद्र सरकार से किसी तरह का टकराव नहीं चाहेंगी.

श्रीलंकाई तमिलों का मामला विदेश मंत्रालय के तहत है इसलिए भारत की नीति को प्रभावित करने के लिए जयललिता को केंद्र सरकार से सहयोग करना पड़ेगा.

क्या भारत श्रीलंका के प्रति नीति बदलेगा?

इसकी बहुत ज़्यादा संभावना है कि जयललिता आने वाले दिनों में श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे पर अपनी बयानबाज़ी को कम करें ताकि केंद्र सरकार तमिलों के मामले मे कोई सकारात्मक क़दम उठा सके.

कुल मिलाकर अनुमान लगाया जा सकता है कि भारत आने वाले महीनों में अपनी श्रीलंकाई नीति को बदलेगा और पहले की तरह महिंदा राजपक्षे को दिए जा रहे पूर्ण समर्थन में कमी आएगी.

इस संदर्भ में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की प्रस्तावित श्रीलंका यात्रा और राष्ट्रपति राजपक्षे से संभावित मुलाक़ात के सिलसिले में कोलंबो से बहुत रोचक ख़बरें आ रहीं हैं.

उनके अनुसार भारतीय प्रतिनिधिमंडल श्रीलंका पर इस बात का दबाव डालेगा कि तमिलों की शिकायतों को दूर करने के लिए वो संविधान के 13वें संशोधन को पूरी तरह लागू करें जिसमें प्रांतीय काउंसिल को ज़मीन और पुलिस अधिकार दिए जाने की बात कही गई है.

श्रीलंका पर लगे युद्ध अपराध के आरोपों का क्या होगा ?

शायद इसे ख़ामोशी से भूला दिया जाए क्योंकि कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दोनों तमिल पार्टियों से कामचलाने लायक़ संबंध बनाए रखने के लिए संतुलन बनाए रखना होगा.

भारत शायद सार्वजनिक रूप से संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर ख़ामोश रहेगा जबकि अकेले में वो राष्ट्रपति राजपक्षे पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में जो सिफ़ारिशें की गई हैं उन पर अमल करने का दबाव डालेगा.

इसके बदले में संयुक्त राष्ट्र फ़ोरम में जब रिपोर्ट पेश की जाएगी तब भारत या तो श्रीलंका का समर्थन करेगा या तटस्थ रहेगा.

इस आकलन में हो सकता है कि कई कमियां लगे लेकिन दूर्भाग्य से विदेश नीति के मामले में ज़्यादातर समझौते दूर्गामी उद्देश्य के बजाए मौजूदा हालात को देख कर किए जाते हैं.

जैसा कि हेनरी किसिंजर ने कहा था, '' कोई भी विदेश नीति चाहे वह कितनी भी चालाकी से क्यों न बनाई गई हो उसके सफल होने की संभावना बहुत कम होगी अगर वो सिर्फ़ कुछ ही लोगों के दिमाग़ की उपज हो और जो किसी के दिल को ना छू सके.''

भारत और श्रीलंका दोनों देशो के नीति निर्धारण के मामले में यह बात बिल्कुल सही लागू होती है.

कर्नल आर हरिहरण (रिटायर्ड) दक्षिण एशिया मामलों के सुरक्षा विशेषज्ञ हैं. वह श्रीलंका में भारतीय शांति सेना के ख़ुफ़िया विभाग के प्रमुख रह चुके हैं. वे आजकल चेन्नई सेंटर फ़ॉर चाइना स्टडीज़ एंड साउथ एशिया एनालीसिस ग्रुप से जुड़े हुए हैं.

उनसे colhari@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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