गांव की लड़कियों के लिए सस्ते नैपकिन

महिलाएं
Image caption इस योजना के तहत गांवों की लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन का एक पैकेट मात्र छह रूपए में दिया जाएगा

भारत सरकार की एक नई महत्वाकांक्षी योजना के तहत गांवों में किशोरियों को रियायती दरों पर सैनिटरी नैपकिन दिए जाएँगे.

स्वास्थ्य और कल्याण मंत्रालय ने 10 से19 साल की लड़कियों में मासिक धर्म से संबंधित साफ़-सफ़ाई के प्रति जागरूगता फैलाने के लिए इस योजना को मंज़ूरी दी है.

आमतौर पर गांवों में महिलाएं या लड़कियां मासिक धर्म के दौरान कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं.

इस योजना का मक़सद इस उम्र की लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान सफ़ाई के बारे में बताना और सैनिटरी नैपकिन के इस्तेमाल की जानकारी देना है.

इस योजना के तहत गांवों की लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन का एक पैकेट मात्र छह रूपए में दिया जाएगा और उसमें छह नैपकिन होंगे

फ्रीडे

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन के तहत सैनिटरी नैपकिन के इन पैकटों को लड़कियों को बांटा जाएगा और इस नैपकिन का नाम फ़्रीडे होगा.

एक ग़ैर सरकारी संस्था 'गूंज' 2004 से इस मुद्दे पर काम कर रही है. ये संस्था पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं के लिए कपड़ों के नैपकिन बनाती है.

गूंज़ के संस्थापक अंशु गुप्ता ने इस पर खुशी ज़ाहिर की, लेकिन आशंकाएं भी जताई.

अंशु का कहना था, "सरकार ने परिवार नियोजन के तहत कंडोम का भी वितरण किया, लेकिन ये उतना कारगर नहीं हुआ. क्योंकि वितरण प्रणाली को ठीक से पारिभाषित नहीं किया गया और वह कार्यक्रम विफल हो गया. मेरा सवाल अब यहीं है कि वितरण को लेकर कितना काम किया गया है और आशा नेटवर्क इसे लेकर कितना मज़बूत है की गांव-गांव तक आशा कार्यकर्ता पहुंच जाएंगी."

सरकार की इस योजना के अनुसार पहले चरण में आबादी के 25 फ़ीसदी यानी डेढ़ करोड़ लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन दिए जाएंगें.

ये उम्मीद की जा रही है कि ग्रामीण स्तर पर सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता बढ़ाकर इसके इस्तेमाल को बढ़ाने में मदद मिलेगी.

इसके लिए सरकार ने सैनिटरी नैपकिन को आसानी से उपलब्ध कराने और उचित दाम पर देने की रणनीति बनाई है.

आशा करेगी वितरण

पंजीकृत सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (एएसएचए यानी आशा) इन सैनिटरी नैपकिनों को इन लड़कियों को बेचेंगी और उन्हें हर पैकेट के वितरण पर एक रूपए दिया जाएगा और एक पैकेट मुफ़्त मिलेगा

मध्यप्रदेश के खंडवा ज़िले के रोशनी गांव में आशा कार्यकर्ता रजनी सोनी का कहना है कि गांव में पढ़े-लिखे घर की लड़कियां तो नैपकिन इस्तेमाल करती है लेकिन ग़रीब या अनपढ़ घर की लड़कियां कपड़ा इस्तेमाल करती है.

रोशनी का कहना है, "अब जब ये नैपकिन सस्ते मिलेंगे, तो सभी लड़कियां इस्तेमाल कर पाएंगी."

खंडवा में ही एक और संस्था में काम करने वाली सुगंधा कहती है कि गांव में औरते किसी भी प्रकार के कपड़े का इस्तेमाल कर लेती है जिससे उन्हें कई तरह के संक्रमण हो जाते है.

सुगंधा का कहना है ,"सैनिटरी नैपकिन अगर सस्ते मिले तो अच्छा है, लेकिन बाज़ार में मिलने वाले कई नैपकिन त्वचा के लिए ठीक नहीं होते जिससे खारिश और दाने आ जाते है ऐसे में सूती कपड़े के नैपकिन सुविधाजनक होते है. "

पर्यावरण के लिए ख़तरा

अंशु इन नैपकिन के इस्तेमाल को लेकर पर्यावरण का भी मु्द्दा उठाते है.

उनका कहना है कि ये नैपकिन अगर प्लास्टिक के होंगे तो इन्हें ज़मीन में गाड़ा जाएगा या पानी के आसपास फेंका जाएगा. ऐसे में गांवो में प्रदूषण ही बढ़ेगा और खेता की ज़मीन पर असर पड़ेगा.

मासिक धर्म के दौरान साफ़ सफ़ाई में कमी, सैनिटरी नैपकिन, स्कूल में शौचालय, पानी की उपलब्धता की कमी से कई तरह के संक्रमण हो जाते है.

साथ ही इसमें प्रजननीय संबंधी संक्रमण भी शामिल है.

संबंधित समाचार