'ममता,जया जीतीं लेकिन महिलाएं हारीं'

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Image caption पांच राज्यों में हुए चुनाव में केवल 72 महिला विधायक है

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल हों , सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी हों या फिर विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, ये सभी महिलाएं बड़े पदो पर आसीन है लेकिन फिर भी विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है.

एसोशिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म नामक संस्था के अनुसार हाल ही में पांच राज्यों में हुए चुनाव में केवल 72 महिला विधायक बन सकी है.

इन्हीं पांच राज्यों में वर्ष 2006 में 80 महिला विधायक थीं.

चार राज्यों दिल्ली में शीला दीक्षित,उत्तप्रदेश में मायावती,पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में जयललिता मुख्यमंत्री है.

एसोशिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म की ओर से पश्चिम बंगाल के चुनाव पर नज़र रखने वाले बिप्लव हलीम का कहना है कि पश्चिम बंगाल में 1121 पुरूष उम्मीदवार थे और 134 महिला उम्मीदवार लेकिन इन चुनाव में केवल 34 महिलाएं ही चुनाव जीत पाई.

कारण

बिप्लव हलीम महिलाओं की कम भागीदारी का कारण पुरूष प्रधान मानसिकता और राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी को बताते है.

उनका कहना है, "हर पार्टी के लिए चुनाव में जीत सर्वोपरि होती है. इसमें बाहुबल का भी इस्तेमाल होता है,महिलाएं चाहे मेहनत ज़्यादा करें लेकिन वह इन मामलों में मात खा जाती है. ऐसे में पैसा और बाहुबल जीत जाता है और महिलाएं पीछे छूट जाती हैं."

इसका मतलब ये हुआ कि इन पांच राज्यों में महिला विधायकों की संख्या केवल नौ फीसदी है जो कि लोकसभा में महिलाओं की संख्या से भी कम है.लोकसभा में महिलाओं की संख्या 11 फीसदी है .

इन पांच राज्यों में सबसे ज़्यादा महिला विधायकों की संख्या पश्चिम बंगाल में है. यहां 34 विधायक है वहीं असम में 14,तमिलनाडु में 17 और केरल में केवल सात महिला विधायक है.

Image caption ममता बनर्जी के केबिनेट में केवल एक महिला को पद दिया गया है

पूदुचेरी में तो और भी बुरा हाल है जहां एक भी महिला विधायक नहीं है.

अगर इन राज्यों में महिला का प्रतिनिधित्व पार्टी के अनुसार देखें तो सबसे ज़्यादा 24 महिला विधायक तृणमूल कांग्रेस से है वहीं कांग्रेस पार्टी में 17 और जयललिता के नेतृत्व वाली पार्टी अन्नाद्रमुक की 12 महिला विधायक है.

विडंबना

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के 43 सदस्यों वाले नई कैबिनेट में केवल एक महिला को जगह मिल पाई है.

इसे एक विडंबना ही कहेंगे कि संसद में 33 फीस़दी महिला आरक्षण की मांग लगभग हर पार्टी ज़ोर शोर से उठाती रही है.

इसी साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौक़े पर राजनीतिक दलों ने पार्टी की लाइन से हटकर एक मत होकर महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने की मांग की थी.

सरकार ने भी लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार से इस विधेयक पर आम सहमति बनाने के लिए एक नई पहल करने की अपील की थी.

मीरा कुमार ने इस पर एक कविता की पक्तियां भी पढ़ी थी, "पंख भी है,खुला आसमान भी है,फिर ये न उड़ पाने की मजबूरी कैसी.

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