रफ़्तार के साथ दुर्घटनाएँ भी बढ़ीं

गाँवों के बीच से गुज़रती सड़क

भारत में देश के चारों कोनों को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग स्वर्णिम चतुर्भुज ने लोगों के लिए सुविधाएँ पैदा नहीं की हैं उनके लिए मुसीबत भी पैदा की है.

ख़ासकर सड़क दुर्घटनाओं के मामले में.

सड़कों पर रफ़्तार तो बढ़ गई है लेकिन लोगों को इस रफ़्तार के साथ तालमेल बिठाने में दिक़्कत हो रही है.

कुछ समय पहले बीबीसी हिंदी की टीम ने बनारस से कोलकाता और फिर चेन्नई से मुंबई तक इस स्वर्णिम चतुर्भुज पर यात्रा की और लोगों से जानना चाहा था कि सड़कों ने उनके जीवन को किस तरह से प्रभावित किया है.

बच्चे सड़क पर नहीं जाते

राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक दो यानी पुराने जीटी रोड की शक्ल अब बदल गई है.

अब बच्चों को तो बाज़ार भेजना ही बंद कर दिया गया है. पहले वे आते थे और घर के कई लोगों के जूते सुधरवाकर पॉलिश करके ले जाया करते थे

कृपाल रविदास

हज़ारीबाग ज़िले का चौपारण उन दर्जनों गाँवों में से एक है जो सड़क के किनारे बसा हुआ है.

पहले तो पता नहीं गाँव सड़क के एक किनारे रहा होगा लेकिन अब दोनों ओर आबादी है. इस बीच सड़क की चौड़ाई एकाएक चार गुना से अधिक हो गई है.

इससे गाँव वालों को ख़ुश होना चाहिए था लेकिन वे दुखी हैं.

सड़क बनने के बाद से उन्होंने अपने बहुत से परिजनों को सड़क दुर्घटनाओं में खो दिया है.

लोकनाथ यादव चौपारण में सड़क के किनारे 1989 से रेस्तराँ चला रहे हैं.

उनकी शिकायत है कि चौड़ी तेज़ रफ़्तार सड़कों से दुर्घटनाएँ बढ़ गई हैं जिसकी वजह से लोग अब सड़क पार करके कम ही आर-पार जाते हैं.

इसी सड़क के किनारे जूता पॉलिश करने वाले कृपाल रविदास भी इसी तरह की शिकायत करते हैं, “अब बच्चों को तो बाज़ार भेजना ही बंद कर दिया गया है. पहले वे आते थे और घर के कई लोगों के जूते सुधरवाकर पॉलिश करके ले जाया करते थे.”

एक और दुकानदार विष्णु प्रसाद साव कहते हैं कि दुकानदार और गाँव वाले यहाँ पर ओवरब्रिज बनवाने की माँग कर रहे हैं लेकिन अफ़सर सुन ही नहीं रहे हैं.

बँट गए गाँव

चौपारण अकेला उदाहरण नहीं है, पूरे देश में स्वर्णिम चतुर्भुज की सड़कें शहर से बाहर एक विभाजन रेखा की तरह दिखने लगी हैं.

इन सड़कों ने कई जगह गाँवों को दो हिस्सों में बाँट दिया है. आधी आबादी सड़क के इस पार रह गई हैं और आधी दूसरी तरफ़.

अब हल, बैल और ट्रैक्टर लेकर खेती के लिए सड़क पार करना भी मुश्किल हो गया है

सीतारमैय्या, किसान

पहले वह एक इकाई थी इसलिए सब कुछ साझा था लेकिन अब उनको अपनी ज़रुरतों के लिए नेशनल हाइवे को पार करना होता है.

बंगलौर से हुबली के रास्ते में एक किसान ने शिकायत की, “स्कूल, पीने का पानी, दुकानें सब कुछ को सड़क ने विभाजित कर दिया है. हमें हर बार अपनी ज़रुरतों के लिए उस ओर जाना होता है. हर वक़्त एक्सीडेंट का ख़तरा बना रहता है.”

गाँव हैं इसलिए उनकी अर्थव्यवस्था अभी भी खेती पर टिकी हुई है.

खेत एक ओर रह गए हैं और खेत के मालिक दूसरी ओर. खेती के लिए उन्हें अपने हल, बैल और ट्रैक्टर लेकर दूसरी ओर जाना होता है और अक्सर तेज़ रफ़्तार वाहन की वजह से मुसीबत ही झेलनी पड़ती है.

बंगलौर से 50 किलोमीटर दूर वार्डाहल्ली गाँव के किसान सीतारमैय्या भी उन्हीं किसानों में से एक हैं.

वे कहते हैं, “अब हल, बैल और ट्रैक्टर लेकर खेती के लिए सड़क पार करना भी मुश्किल हो गया है.”

ये सड़कें उनके लिए हादसे का पर्याय बन गई हैं.

स्कूल चिंतित हैं कि बच्चे सुरक्षित स्कूल पहुँचें और वापस घर भी सुरक्षित पहुँचें.

आठवीं कक्षा की सुनीता अपने स्कूल से लौटती हुई मिली. उसने बताया कि नई सड़क बनने के बाद से स्कूल में विशेष तौर पर सुरक्षित ढंग से सड़क पार करना सिखाया जाने लगा है.

बंगलौर से 40 किलोमीटर दूर नेलमंगला गाँव से तुमकुर तक के चालीस किलोमीटर में सड़क के किनारे क़रीब चालीस गाँव हैं. ये सभी गाँव इसी तरह की परेशानी झेल रहे हैं.

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