ज़मीन के नीचे बिछी मौत

बारूदी सुरंग

छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के बड़े हिस्से में माओवादी छापामारों नें बारूदी सुरंगों का जाल बिछा रखा है जिनकी चपेट में ज़्यादातर सुरक्षा बल के जवान आ जाते हैं.

एक आंकलन के हिसाब से माओवादी हिंसा में मारे गए सुरक्षा बलों के जवानों में से ज़्यादातर बारूदी सुरंगों के विस्फोट में मारे गए हैं.

अभी तक सरकार के पास इससे निपटने के लिए कोई ठोस या कारगर उपाय नहीं है. बारूदी सुरंगों की वजह से इन इलाकों में सफ़र जोखिम भरा है.

घने जंगलों से होकर गुज़रती सडकें और इन सडकों पर बारूदी सुरंगों की शक्ल में बिछी मौत.

क्या सुरक्षा बल और क्या आम आदमी, सभी इसकी चपेट में आ जाते हैं.

बारूदी सुरंगों के विस्फोटों की वजह से सुरक्षा बलों को सबसे ज्यादा नुकसान का सामना करना पड़ा है.

लेकिन आम आदमी को भी इसकी वजह से ख़ासा नुकसान हुआ है.

फिर चाहे वो दंतेवाड़ा में यात्री बस पर बारूदी सुरंद से हमला हो या फिर छत्तीसगढ़ से महाराष्ट्र के गडचिरोली जा रहे बाराती वाहन पर किया गया हमला हो.

इन हमलों में आम लोगों को ही मौत के घाट उतारा गया है. छत्तीसगढ़ में तो कई सडकें ऐसीं हैं जिनपर बारूदी सुरंगों की वजह से लोग पैदल भी नहीं चलते हैं

बारूदी सुरंगों की तलाश

कब कहाँ बारूदी सुरंग का विस्फोट होगा किसी को नहीं पता. यही कारण है कि सुरक्षा बल के जवान एक बड़े इलाके में बारूदी सुरंगों को पैदल घूम घूम कर ढूँढने का काम कर रहे हैं.

दंतेवाड़ा के भुसारस के पास मेरी मुलाक़ात केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल की एक ऐसी ही टुकड़ी से हुई जो जंगलों में पैदल घूम-घूम कर बारूदी सुरंगों का पता लगाने का काम कर रही थी.

इसी दौरान इन जवानों के हाथ लगे दो भारी भरकम विस्फोटक.

इस दल का नेतृत्व कर रहे सहायक समादेष्टा नें मुझे बताया कि ये विस्फोटक कम से कम 200 लोगों को मारने के लिए काफी़ हैं.

ये विस्फोटक घाटी में सड़क के बीचो बीच लगाए गए थे.

यही वजह है कि इस इलाके में जवानों को हिदायत है कि वे वाहनों में सफ़र ना कर पैदल ही गश्त करें.

कोई हैरानी की बात नहीं अगर दंतेवाड़ा में सफ़र करते हुए कोई बीच सड़क पर किसी बारूदी सड़क से टकरा जाए.

सुरंगें हर जगह

Image caption बारूदी सुरंग फटने से आम आदमी भी मरते रहे हैं.

सड़क कच्ची हो या पक्की, बारूदी सुरंगें हर जगह बिछी हुई हैं.

बस्तर चुनाव के दौरान मैं सुकमा के इलाके में जिस सड़क पर लोगों से बात कर रहा था, दो दिन बाद ठीक उसी स्थान पर बारूदी सुरंग का विस्फोट हुआ जिसमे सीआरपीऍफ़ के सात जवान मारे गए.

नारायणपुर के कोंडागांव वाली जिस सड़क से होकर मैं गुज़रा था वहां भी बारूदी सुरंग का विस्फोट हुआ.

हालाकि पुलिस बलों के पास बारूदी सुरंग निरोधक वाहन हैं मगर अब माओवादियों नें इन वाहनों को भी उड़ाने की तकनीक विकसित कर ली है.

कई हमलों में देखा गया है कि माओवादियों नें खास तौर पर बारूदी सुरंग निरोधक वाहनों को अपना निशाना बनाया है.

पुलिस की चिंता

पुलिस के अधिकारी और सरकार बड़े पैमाने पर बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल से चिंतित हैं.

छत्तीसगढ़ पुलिस के मुख्यालय में तैनात एक वरिष्ट अधिकारी के अनुसार बारूदी सुरंगों से ही सुरक्षा बलों को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है.

वह कहते हैं, "हमारे पास बारूदी सुरंग निरोधक वाहन हैं. मगर एहतियात यानी की सावधानी के अलावा इससे निपटने का कोई दूसरा चारा नहीं है."

अमूमन देखा गया है कि यह विस्फोट उस समय होते हैं जब सुरक्षा बल के जवान अभियान ख़त्म कर वापस अपने बेस कैंप लौट रहे होते हैं.

पुलिस अधिकारी कहते हैं, "कई किलोमीटर का सफ़र पैदल तय कर अभियान पूरा होने के बाद जवान थक जाते हैं और अपने वाहनों में बैठ जाते हैं. यही वह वक़्त है जब इनपर हमला होता है. वैसे हमने सख्त निर्देश दिए हैं कि सुदूर इलाकों में वाहनों का इस्तेमाल नहीं किया जाए."

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में भी कुछ ऐसा ही हुआ.

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में दस जवान एक छोटी सी सूमो गाड़ी में दुर्गम इलाकों में गए हुए थे.

जब माओवादियों का हमला हुआ तो उस छोटे से वाहन में इतनी जगह नहीं थी कि वह अपने हथियार चला पाते.

माओवादी अपने छापामार युद्ध को जारी रखने के लिए बारूदी सुरंगों का सहारा लेते आ रहे हैं.

सच्चाई यही है कि ज़मीन के नीचे बिछी मौत के इस जाल नें झारखण्ड और छत्तीसगढ़ के इलाकों में ज़िन्दगी को काफी मुश्किल और जोखिम भरा बना दिया है.

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