लोकपाल बिल मसौदा समिति में मतभेद

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Image caption मजबूत लोकपाल विधेयक के लिए अन्ना हज़ारे के समर्थन में हज़ारों लोगों ने जंतर मंतर पर धरना दिया था.

लोकपाल की मसौदा तैयार करने वाली समिति में सोमवार को हुई बैठक में सरकार और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों में कई मुद्दों को लेकर मतभेद पैदा हो गए हैं.

प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, सांसदों और संसद के भीतर सांसदों की कार्रवाईयों को लोकपाल बिल के दायरे में लाने के प्रस्ताव का सरकार ने विरोध किया जिसके बाद नागरिक समाज के प्रतनिधियों ने फिर से सड़क पर उतने की चेतावनी दी है.

सरकार का कहना था कि प्रधानमंत्री को इस बिल के दायरे में लाने से प्रधानमंत्री के काम में दखल होगा. सरकार की राय में न्यायपालिका और सांसदों के भ्रष्टाचार को वर्तमान नियमों के तहत रोका जा सकता है.

हालांकि नागरिक समाज के प्रतिनिधि प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल सरकार की इस राय से संतुष्ट नहीं थे.तीन घंटे की बैठक के बाद इन दोनों ने कहा कि अगर छह जून को होने वाली बैठक में इन मुद्दों पर कोई बात नहीं बनती है तो वो मीटिंग से बाहर आ जाएंगे.

नागरिक प्रतिनिधियों ने इस बैठक के बाद एक बयान जारी कर पूरी बैठक में सरकार की मांगों के बारे में जानकारी दी और कहा, ‘‘यह मीटिंग बहुत ही ख़राब रही. सरकार की मंशा पर हमें शक है. देश भर में लोग अगले आंदोलन के लिए तैयार हो जाएं. हम अगले कुछ बैठकों में हिस्सा लेंगे. हम सरकार को प्रभावशाली और ताकतवर लोकपाल बिल बनाने के लिए राज़ी करने की कोशिश करेंगे लेकिन अगर सरकार नहीं मानेगी तो हम फिर सड़कों पर उतरेंगे. ’’

अन्ना हज़ारे की अगुआई में लोकपाल बिल के लिए आंदोलनरत कार्यकर्ताओं का कहना था कि सरकार का रवैया खतरनाक है और वो बिल्कुल नकारात्मक रवैये से काम कर रही है.

सोमवार की बैठक में नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री, सांसदों, न्यायपालिका और संसद में सांसदों की कार्रवाई को शामिल करने का प्रस्ताव रखा था.

केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने कहा कि अगर ये मांग नहीं मानी गई तो लोकपाल में कोई ताकत नहीं रहेगी. इनके बिना लोकपाल के दायरे में सिर्फ़ 2000 अधिकारी ही आएंगे.

हालांकि सरकार का पक्ष रख रहे कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि एक मजबूत लोकपाल बिल तैयार होगा.

उनका कहना था, ‘‘ हम देश को एक पारदर्शी और मज़बूत विधेयक देना चाहते हैं जो भ्रष्टाचार को रोके.’’

नागरिक समाज के प्रतिनिधि इस तथ्य पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में शामिल करने पर सरकार को इतनी आपत्ति क्यों थी. ऐसा इसलिए क्योंकि जनवरी महीने में जब सरकार ने इस बिल का मसौदा तैयार किया था तो उसमें परोक्ष रुप से प्रधानमंत्री के पद को इस दायरे में रखा गया था.

सरकार का अब कहना है कि अगर प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ किसी मामले में जांच शुरु होती है तो फिर वो फैसले नहीं ले सकेंगे और कामकाज ठप हो जाएगा.

हालांकि प्रशांत भूषण ने कहा कि बोफोर्स मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी शक के दायरे में थे लेकिन इससे उनके कामकाज पर प्रभाव नहीं पड़ा था.

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