आईएमएफ़ की ज़रुरत किसे है ?

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क्या वजह है की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के रिक्त अध्यक्ष पद के लिए किसी भारतीय का चुना जाना बहस का मुद्दा बना रहा?

जब से पूर्व अध्यक्ष डोमिनिक स्ट्रॉस कान ने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया तभी से भारतीय नामों को लेकर चर्चा गर्म रही.

योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया पहले भी आईएमएफ़ में एक वरिष्ठ पद पर कार्यरत थे, इसलिए उनका नाम लिया जाना स्वाभाविक था.

हालांकि अपने नाम पर चर्चा शुरू होने के बाद ही मोंटेक सिंह ने ख़ुद साफ़ कर दिया कि उन्हें इस पद में कोई दिलचस्पी नहीं है.

वैसे भी मोंटेक सिंह अहलुवालिया इस पद के लिए अनिवार्य 65 वर्ष कि आयु सीमा को पार कर चुके हैं.

नाम चाहे जिसके भी उठ रहे हों, बुनियादी सवाल यही है कि आखिर क्यों है अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भारत के लिए अहम? या फिर बदलते हुए आर्थिक समीकरणों के बीच अब भारत जैसे विकाशील देश को आईएमएफ़ के लिए ज़रूरी बताया जाए?

बदले समीकरण

इस बात में कोई श़क नहीं कि दुनिया के हर विकसित देश ने तेज़ी से बढती भारतीय अर्थव्यवस्था का लोहा माना है.

Image caption स्ट्रॉस कान के पद छोड़ने के बाद कई बड़ी हस्तियों के नाम इस पद के लिए उठते रहे हैं.

दुनिया के सभी 'शक्तिशाली' देशों के व्यवसायी भारत में निवेश करने के मौक़े तलाश करते रहे हैं.

हालांकि इसके बावजूद भी अभी तक किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था के शीर्ष पद पर किसी भारतीय का चयन नहीं हुआ है.

लेकिन इसी बहस के बीच याद रखने कि ज़रुरत है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं का गठन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ही बदले हुए अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच हुआ था.

आईएमएफ़ या विश्व बैक जैसी संस्थाओं का प्रमुख उद्देश्य दुनिया में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का था.

इस बात में भी कोई दो राए नहीं कि आईएमएफ़ ने तमाम विकासशील और पिछड़े हुए देशों की अर्थव्यवस्थाओं को समय समय पर मदद दी है और ज़रुरत पड़ने पर उन्हें आर्थिक संकट से भी उबारा है.

लेकिन ये भी गौ़रतलब है कि आईएमएफ़ के समय की तक़रीबन सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं पश्चिमी देशों, ख़ासतौर पर अमरीका के नेतृत्व में गठित की गई थी जिनका नेतृत्व भी पश्चिमी देशों के पास ही रहता रहा है.

जानकारों के मुताबिक़ आईएमएफ़ जैसी संस्थाओं के इतिहास में ऐसा भी हुआ है जब उसने ऐशिआई देशों के मुक़ाबले पश्चिमी देशों के हितों की ज्यादा रक्षा भी की है.

भारतीय दावेदारी

अंतरराष्ट्रीय संबंधो के कई विश्लेषक अब इस बात के पक्ष में है कि भारतीय ज़रुरत से ज्यादा बदले समीकरणों में आईएमएफ़ को भारत की ज़रुरत है.

तेज़ी से बढती अर्थव्यवस्था, सामरिक शक्ति और लोकतंत्र की मज़बूत नींव होने के साथ साथ भारत के भौगोलिक महत्व से भी इस तरह के तर्क को बल मिलता है.

Image caption योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया आईएमऍफ़ में कार्यरत रह चुके हैं.

कुछ जानकारों का ये भी मत है कि भारत को चीन जैसे देश का उदाहरण अपनाना चाहिए.

आमतौर पर चीन की सरकार कभी भी किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्था के शीर्ष पद के लिए दावेदारी नहीं पेश करती क्योंकि उन्हें लगता है देश का हित किसी भी व्यक्ति विशेष के ज़रिये नहीं फैलाया जा सकता.

रहा सवाल भारत और आईएमएफ़ का. पिछले कई दशकों में दुनिया के कई देशों को बड़े आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ा है.

अमरीका और ब्रिटेन जैसे आर्थिक महाशक्ति कहे जाने वाले पश्चिमी देश भी इससे अछूते नहीं रहे हैं.

लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था पर कभी भी इस तरह के आर्थिक संकट वाले बादल नहीं मंडराए हैं.

अगर पश्चिमी देशों की बात हो तो ग्रीस और पुर्तगाल जैसी यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को भी आईएमएफ़ की सशर्त मदद की दरकार रही.

ज़ाहिर है आईएमएफ़ या विश्व बैक जैसी संस्थाओं की मदद की सूची में भारत का नाम शीर्ष में तो कहीं भी नहीं है.

तो फिर किस बात की दावेदारी ? दावेदारी महज़ अंतरराष्ट्रीय समाज में एक बड़ी 'कुर्सी' पर किसी भारतीय के काबिज़ होने की?

लेकिन उस 'कुर्सी' के बिना भी तो एक नामचीन आर्थिक महाशक्ति बनने के दरवाज़े खुले हुए हैं !

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