नक्सल प्रभावित बस्तर में पहुंची सेना

भारतीय सेना (फ़ाईल फोटो)
Image caption माओवादियों के ख़िलाफ़ सेना के इस्तेमाल को लेकर भारत में बहस जारी है.

भारत सरकार ने छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में सेना की मौजूदगी के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत तय कर दिए हैं.

इसका मतलब यह हुआ कि अब सेना को इस इलाक़े में क़ानूनी सुरक्षा प्राप्त होगी जैसा कि उसे जम्मू और कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में हासिल है.

काफ़ी समय से यह मामला सरकार के पास लंबित था जिस कारण सेना को बस्तर संभाग के तीन ज़िलों में जंगल वारफ़ेयर का प्रशिक्षण केंद्र खोलने में मुश्किलें आ रहीं थीं.

यह प्रशिक्षण केंद्र बस्तर संभाग के कांकेर, बस्तर और नारायणपुर ज़िलों में खोले जाएंगे.

चूँकि छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग नक्सली हिंसा के मद्देनज़र पूरे भारत में सबसे संवेदनशील इलाक़ा माना जाता है इसलिए सेना ने सरकार से कहा था कि वह यह पहले ही साफ़ कर दे कि अगर सेना के जवानों पर नक्सलियों द्वारा हमला किए जाते हैं उस सूरत में वह क्या करें ? जवाबी कारावाई का दायरा क्या होगा ? आदि.

कहा जा रहा है कि कुछ संशोधनों के बाद रक्षा मंत्रालय और विधि मंत्रालय ने इस इलाक़े में सेना के काम करने के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत तय किए हैं.

सेना की छत्तीसगढ़-उड़ीसा सब-एरिया हेडक्वार्टर के कमांडिंग अफ़सर ब्रिगेडियर अमरीक सिंह ने रायपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान इसकी पुष्टि कर दी है.

मगर सिंह ने इसका खुलासा नहीं किया कि यह शर्तें आख़िर हैं क्या.

सोमवार को लखनऊ स्थित मध्य कमांड के मुख्यालय से सेना का एक कॉलम यानी के टुकड़ी छत्तीसगढ़ पहुँची.

इस टुकड़ी में हज़ार से ज़यादा जवान और अधिकारी मौजूद हैं.

'प्रशिक्षण केंद्र'

फ़िलहाल यह तय नहीं हो पाया है कि बस्तर के तीन ज़िलों में किस-किस जगह पर सेना अपना प्रशिक्षण केंद्र खोलेगी मगर इतना तो तय है कि नारायणपुर के इलाक़े में सेना का सबसे बड़ा पड़ाव होगा.

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption अरुणधति रॉय और कई मानवाधिकार कार्यकर्ता माओवादियों के ख़िलाफ़ सेना के इस्तेमाल करने का विरोध करते रहें हैं.

इस काम के लिए छत्तीसगढ़ की सरकार ने पहले से ही 750 वर्ग किलोमीटर का इलाक़ा सेना के प्रशिक्षण केंद्र के लिए आवंटित कर दिया है.

छत्तीसगढ़ की सरकार का कहना है कि ज़रुरत पड़ी तो वह सेना को और भी ज़मीन मुहय्या कराएगी.

सेना के जवान और अधिकारी बस्तर संभाग के तीनों ज़िलों में रेकी कर रहे हैं ताकि वह प्रशिक्षण केंद्रों के लिए उपयुक्त जगह चिन्हित कर पाएं.

कहा जाता है कि बस्तर संभाग में लगभग 50 हज़ार वर्ग किलोमीटर का इलाक़ा ऐसा है जहां सरकार की मौजूदगी नहीं के बराबर है.

कई दशकों से इस इलाक़े का सर्वे भी नहीं हो पाया है.

अब इस इलाक़े में माओवादियों की समानांतर सरकार चल रही है.

ख़ास तौर पर नारायणपुर ज़िले के अबूझमाड़ इलाक़े के बारे में सरकार के पास बहुत कम जानकारिया उपलब्ध हैं.

सरकार की दलील है कि चूँकि यह इलाक़ा दुर्गम है और जंगलों और पहाड़ियों से घिरा हुआ है लिहाज़ा मौजूदा परिस्थितियों में यहां जाया नहीं जा सकता है.

यह भी कहा जाता है कि इस इलाक़े में माओवादियों ने बारूदी सुरंगों का जाल बिछा रखा है.

माओवादी, बस्तर मे सेना की मौजूदगी का विरोध कर रहे हैं.

उनका कहना है कि सरकार अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ सेना का इस्तेमाल करने जा रही है.

मगर पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में ब्रिगेडियर अमरीक सिंह ने स्पष्ट किया कि सेना छत्तीसगढ़ में माओवादियों से लड़ने नहीं बल्कि अपने प्रशिक्षण केंद्र खोलने आ रही है.