वीरान न हो जाएं ये गलियां..

सोने की बारीक कारीगरी का ज़िक्र हो तो बंगाल के ज़ेवरात और स्वर्ण शिल्पियों के बग़ैर चर्चा अधूरी है.

कोलकाता में कई इलाके कई बस्तियां ऐसी हैं जहां गलियों से गुज़रते, हर घर में सोने के ज़ेवरात बनते देखे जा सकते हैं.

इन कोठरी नुमा घरों और दुकानों में काम कर रहे कारीगरों के लिए जीवन का असली संगीत है छेनी और हथौड़ी की ठक-ठक.

लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी रात-दिन बेशकीमती ज़ेवर बनाने वाले इन कारीगरों की अपनी ज़िंदगी अब ग़रीबी और बेरोज़गारी की गर्त में जा रही है और कई इलाके अब ऐसे हैं जहां छेनी और हथौड़ी की ठकठक अब नहीं गूंजती.

जेम एंड जूलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (जीजेईपीसी) के क्षेत्रिय अध्यक्ष पंकज पारिख ने बीबीसी से बातचीत के दौरान बताया कि किस तरह कोलकाता के कारीगर अपने काम के लिए भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी जाने जाते हैं.

दुनियाभर में मशहूर

पंकज कहते हैं, ''चंडीगढ़, हिमाचल, चेन्नई, हैदराबाद और दिल्ली में बड़ी संख्या में बंगाल के कारीगर काम कर रहे हैं. मुंबई में तो अक्सर इन्हें बंगलादेशी कहकर इनके साथ दुर्व्यवहार की बात सामने आती है. स्विट्ज़रलैंड में रोलेक्स की घड़ियों में हीरे जड़ने के लिए भी बंगाल के कारगीरों की बेहद मांग है. यहां तक लंदन में ज़ेवरातों के लिए मशहूर हैडिंगटन लेन में किसी कारीगर से बात करें तो जवाब बंगाली में मिलेगा.''

लेकिन देश-दुनिया में अपने हुनर के लिए मशहूर ये कारीगर खुद बंगाल में पिछड़ गए हैं.

एक अंधेरी कोठरी में सोने के मोती तराशने में जुटे ऐसे ही एक कारीगर कृष्ण चंद्रदत्त ने हमें बताया कि सोने के बढ़ते दामों के चलते ग्राहक कम होते जा रहे हैं और आभूषणों पर किया जाने वाला परंपरागत भारी काम कोई नहीं कराता.

जीजेईपीसी के अध्यक्ष पंकज पारिख ने हमें बताया सोने के बढ़ते आयात के बावजूद आभूषण उद्योग पर मंदी की मार है.

Image caption कलकत्ता में सोने और चांदी के ज़ेवरों से लदी अनगिनत कतारबद्ध दुकानें आम दिखाई पड़तीं.

पंकज कहते हैं, ''सोने का आयात तो बढ़ रहा है लेकिन बढ़ते दामों की वजह से सोने के आभूषणों कि बजाय निवेश के लिए सोने के सिक्कों की मांग बढ़ रही है. ज़ाहिर हैं इससे हस्तशिल्प पिछड़ रहा है.''

खत्म न हो जाए हस्तशिल्प

कारीगरों के लिए समस्याएं और भी है. सोनापट्टी के कारीगर शांतनु सेठ कहते हैं कि अब दिखावट का दौर है और बड़े शोरूमों ने भी छोटे कारीगरों को बाज़ार से खदेड़ दिया है.

शांतनु कहते हैं,''दिन पर दिन जो ग्राहक हमारी दुकानों में आते थे उनकी संख्या कम होती जा रही है. खरीददार अब बड़ी दुकानों में जाते हैं, क्योंकि बड़ी दुकानों में दिखावा है और चीज़ें सजाकर रखी जाती हैं. हम लोगों के पास ऐसी सुविधा नहीं है. अब जब शोरुम मालिकों को पता लग गया है कि हमारे पास अपने ग्राहक नहीं तो उन्होंने मेहनताना भी कम कर दिया है.''

सोने के दाम के अलावा मशीनों ने भी हाथ के हुनर को पछाड़ दिया है. मशीन का काम सीख चुके श्रीकांत सहाय कहते हैं, ''मशीन से एक सा काम होता है और हल्के ज़ेवर बनाना संभव हो पाता है. चेन तो अब पूरी तरह मशीनों ने ही बनतीं हैं. काम जल्दी भी मशीन से ही हो सकता है.''

Image caption सोने के दाम के अलावा मशीनों ने भी हाथ के हुनर को पछाड़ दिया है.

कुलमिलाकर हैरत नहीं कि अब हालात ये हैं कि अंधेरी कोठरियों में ढिबरी या बल्ब की तीखी रोशनी में 10 से 12 घंटे काम के बावजूद एक आम कारीगर महीने भर में ढाई से तीन हज़ार रुपए ही कमा पाता है

मशीन की मार

यही वजह है कि सोने के काम में माहिर कई कारीगर अब धान की कटाई और मज़दूरी का काम करने लगे हैं.

कृष्णदत्त कहते हैं, '' कई कारीगर आधे साल धान की कटाई और मज़दूरी के लिए हुगली, मिदनापुर ज़िलों तक चले जाते हैं. कई कारीगरों ने दिल्ली मुंबई जाकर दूसरा काम शुरु कर दिया है.''

तो ऐसे में हाथ का ये हुनर क्या समय के साथ खत्म हो जाएगा.

पंकज पारिख कहते हैं, '' मुझे डर हे कि उड़ीसा के फिल्ग्री शिल्प की तरह ये हुनर भी अगले 10-20 साल में खत्म सा ही हो जाएगा. फिर भी हम लगातार कोशिश कर रहे हैं कि इन कारीगरों को मशीन का काम और हल्के ज़ेवर बनाना सिखाएं ताकि इनका रोज़गार कम से कम खत्म न हो.''

हालात जो भी हो सोने के छोटे से छोटे टुकड़े को तराशने में माहिर बंगाल के स्वर्ण शिल्पी दिन रात इसी उम्मीद में काम कर रहे हैं कि हो न हो एक दिन गहनों की खनक लौटेगी और सोने की चमक से उनकी ज़िंदगी एक बार फिर रौशन होगी.

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