नई भूमि अधिग्रहण नीति पर विपक्ष ने उठाए सवाल

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भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों में व्यापक असंतोष, विपक्ष के हमलों और हाईकोर्ट द्वारा अधिग्रहण की कई अधिसूचनाएं रद्द किए जाने के बाद मुख्यमंत्री मायावती ने एक नई अधिग्रहण नीति घोषित की है.

यह नीति भविष्य में होने वाले अधिग्रहण पर लागू होगी, इसलिए किसानों और सरकार के बीच चल रहे मौजूदा विवादों पर इसका असर नही पडेगा.

विपक्ष ने भी इस नई नीति की कड़ी आलोचना करते हुए किसानों के साथ धोखाधड़ी बताया है.

सरकार का कहना है कि नई नीति वृहस्पतिवार को लखनऊ में किसान प्रतिनिधियों के साथ पंचायत के बाद तैयार कि गई है, लेकिन ये पंचायत सचिवालय के बंद सभागार में हुई और पत्रकारों को किसान प्रतिनिधियों से मिलने नही दिया गया.

उत्तर प्रदेश सरकार ने यह किसान पंचायत सचिवालय के बंद सभागार में की, जहां पुलिस का कड़ा पहरा था.

किसानों को सरकारी गेस्ट हाउस से बसों में सचिवालय ले जाया गया. पत्रकारों को सभागार से बाहर रखा गया, इसलिए ये नही मालूम कि किसानों ने मुख्यमंत्री मायावती के सामने क्या क्या मुद्दे उठाए.

बाद में मुख्यमंत्री मायावती ने आपने सरकारी आवास पर पत्रकारों को नई नीति के बारे में जानकारी दी , लेकिन सवाल जवाब का मौक़ा दिए बिना उठकर चली गयीं.

किसानों से नहीं मिलने दिया मीडिया को

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Image caption किसान प्रतिनिधियों को पत्रकारों से नहीं मिलने दिया गया.

मुख्यमंत्री के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार अब भविष्य में निजी कंपनियों के लिए जमीन अधिग्रहण नही करेगी.

मुख्यमंत्री मायावती ने कहा, ''हमारी सरकार ने इस मामले में ये अभूतपूर्व फैसला लिया है कि अब विकासकर्ता अपनी परियोजना की जरूरतों के मुताबिक़ सीधे जमीन लेंगे अर्थात भूमि अर्जन के स्थान पर अब किसानों द्वारा विकासकर्ता को सीधे जमीन ट्रांसफर की जाएगी और ऐसे मामलों में शासन प्रशासन की भूमिका मात्र फेसिलिटेटर की होगी.''

निजी कम्पनी को प्रस्तावित अधिग्रहण से प्रभावित कम से कम 70 प्रतिशत किसानों से आपसी सहमति के आधार पर पॅकेज तैयार कर जमीनें खरीदनी होगी. जिला प्रशासन केवल सहायक की भूमिका अदा करेगा. यदि सत्तर प्रतिशत किसान सहमत नही होते हैं तो परियोजना पर पुनर्विचार किया जाएगा.

इस पॅकेज के तहत किसान 16 फीसदी विकसित भूमि ले सकते हैं, जिसके साथ 23 हज़ार रूपये प्रति एकड़ की वार्षिकी 33 साल तक मिलेगी.

दूसरा विकल्प यह है कि किसान यदि चाहें तो 16 फीसदी भूमि में से कुछ भूमि के बदले नकद मुआवजा भी ले सकते हैं. किसानों को दी जाने वाली विकसित भूमि के लिए कोई भुगतान नही करना पडेगा और उसमे कोई स्टाम्प ड्यूटी भी नही लगेगी.

किसान यदि नकद मुआवजे से एक वर्ष के भीतर कहीं भी कृषि भूमि खरीदते हैं तो उसमे स्टैम्प ड्यूटी से छूट मिलेगी.

पुराने अधिग्रहण पर लागू नहीं

नई नीति में कहा गया है कि सड़क और नहर जैसी सरकारी योजनाओं या विकास प्राधिकरणों के लिए जमीन अधिग्रहण के मामलों में भी करार नियमावली का पालन किया जाएगा. नई नीति में किसानों को मुआवजा एवं अन्य लाभों में वृद्धि की गयी है.

बाद में कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने एक सवाल के जवाब में स्पष्ट किया कि नई नीति केवल भविष्य में होने वाली भूमि अधिग्रहण कार्यवाही पर लागू होगी. वर्तमान में ग्रेटर नोएडा, यमुना एक्सप्रेसवे, करछना, चंदौली, कुशीनगर अथवा अन्य स्थानों पर जो किसान आंदोलन चल रहे हैं, वहाँ के किसानों को इस नीति से कोई राहत नही मिलेगी.

इस नई नीति को बारीकी से पढ़ने पर यह भी साफ़ हो जाता है कि सरकार चाहेगी तो अब भी विकास प्राधिकरणों के नाम पर जमीन अधिग्रहण करके निजी कंपनियों को दे देगी, जैसा कि यमुना एक्सप्रेसवे, ग्रेटर नोएडा और कुशीनगर कि मैत्रेय परियोजना के मामले में किया गया.

इसलिए वास्तव में यह नई नीति किसानों को कोई खास राहत नही दे पाएगी.

लेकिन माया सरकार ने किसानों की तथाकथित पंचायत और नई नीति का जिस तरह जोर शोर से प्रचार किया उससे टीकाकारों का कहना कि बहुजन समाज पार्टी भूमि अधिग्रहण के मामले में विपक्षी हमलों की धार को कम करने की कोशिश कर रही है, ताकि अगले विधान सभा चुनाव में उसे किसानों के व्यापक संतोष का नुकसान न उठाना पड़े.

विपक्ष की प्रतिक्रया

जैसा कि सहज अनुमान था, विपक्ष मुख्यमंत्री मायावती कि इस नई भूमि अधिग्रहण नीति से संतुष्ट नही है. विपक्ष ने इसे किसानों की आँखों में धुल झोंकने वाला कदम बताया है.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डाक्टर रीता जोशी ने एक बयान में कहा है कि इस नीति से उन किसानों को कोई राहत नही मिलेगी जो एक लंबे समय से धरना प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे हैं.

सुश्री जोशी ने कहा , '' राष्ट्रीय महासचिव श्री राहुल गांधी द्वारा भट्टा-पारसौल में किसानों पर किये गये जुल्म को राष्ट्रीय मुद्दा बनाये जाने के बाद प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती का आज आनन-फानन में किसान पंचायत को बुलाना और बिना किसी चर्चा के बयान जारी करना प्रदेश के किसानों की आंखों में सरासर धूल झोंकना है.''

डाक्टर जोशी ने आरोप लगाया कि, '' प्रदेश सरकार ने लाखों एकड़ भूमि जबरन कब्जा करके बिल्डरों को दीं और दलाली खाई। इतना ही नहीं अपने निजी लाभ के लिए कुछ अपने चहेते बिल्डरों के साथ समझौता करके खूब फायदा लिया।''

डाक्टर जोशी ने सवाल किया कि मायावती सरकार ने पहले यह नीति क्यों नही बनायी?

डा. जोशी ने कहा कि जिन लोगों की जमीनें विवाद में हैं और वह धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं, उनके सम्बन्ध में कोई घोषणा नहीं की गयी.

'डरी हुई सरकार माफ़ीनामा'

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने भूमि अधिग्रहण की नई नीति को 'राज्यव्यापी किसान आंदोलन से डरी सरकार का माफीनामा'बताया है.

प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा कि, '' इस सरकार ने स्वयं अपने द्वारा ही घोषित अधिग्रहण नीति का पालन नहीं किया, किसानों पर लाठी, गोली चलवाई. उसी किसान विरोधी सरकार से नई भूमि अधिग्रहण नीति के अनुपालन की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती. सरकार किसानों का विश्वास खो चुकी है और फिर से भूमि अधिग्रहण नीति का राग अलाप रही है. इसका कोई मतलब नहीं है.''

समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता श्री राजेन्द्र चौधरी ने कहा है , '' बैठक को किसानों की ऐतिहासिक पंचायत बताकर मुख्यमंत्री ने अपनी धोखाधड़ी और फरेबी राजनीति का ही प्रदर्शन किया है.किसानों के ज़ख़्म इस तथाकथित पंचायत से भरे नहींजाएगें क्योंकि टप्पल, करछना, भट्टा पारसौल गांवों में किसानों का जो उत्पीड़न किया गया है, उससे राहत देने की कोई घोषणा नहीं हुई है.''

श्री चौधरी ने कहा कि, '' मुख्यमंत्री ने किसानों की समस्या को कानून व्यवस्था का सवाल बताकर किसानों के साथ विपक्ष को भी धमकाने का काम किया है, जो उनके अधिनायकशाही स्वभाव का ही परिचायक है।''

विपक्ष की प्रतिक्रया से साफ़ है कि मुख्यमंत्री इस नई से कोई खास राजनीतिक लाभ नही ले सकेंगी.

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