एक अनोखा बैंक, एक फुटपाथ अस्पताल

Image caption दवाएं बांटते सिटीज़न रिपोर्टर डी आशीष

कोलकाता शहर को कभी 'सिटी ऑफ जॉय' भी कहा गया, लेकिन इस खुशहाल शहर की एक सच्चाई बड़ी संख्या में हर मौजूद ग़रीब बदहाल लोग भी हैं. जिनकी ज़िंदगी झुग्गी बस्तियों से शुरु होकर कर यहीं खत्म हो जाती है.

शहर भले ही अपनी रफ्तार से चल रहा हो लेकिन इस सब के बीच एक शख्स ऐसा भी है जिसकी कोशिशों ने इन लोगों को वाकई खुश रहने की एक वजह दी है.

सिटीज़न रिपोर्टर डी आशीष बता रहे हैं कि आम लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए कैसे उन्होंने एक अनोखी शुरुआत की.

डी आशीष ने जब होश संभाला तो अपने आसपास देखीं ऐसी बस्तियां जहां बीमार पड़ने पर लोगों के पास इलाज के लिए भी पैसे न थे.....उनकी अपनी ज़िंदगी तो खुशहाल थी लेकिन अपने आसपास फैली इस बेबसी को दूर करने के लिए उन्होंने एक नायाब पहल की.

आशीष कहते हैं, ''हमने देखा कि कई लोग दवाईयों और इलाज के अभाव में मर जाते हैं और कई लोग ऐसे हैं जिनके पास इलाज के बाद बची दवाएं बेकार पड़ी रहती हैं. हमने ठाना कि हम इन दवाओं को घर-घर से इक्कठा करेंगे.''

स्वामी विवेकानंद के आदर्शों ने आशीष और उनके साथियों को खासा प्रेरित किया और वो अपनी इस मुहिम में जुट गए.

आशीष कहते हैं, ''स्वामी विवेकानंद ने कुर्सी पर बैठकर समाजसेवा नहीं की उन्होंने आम लोगों के बीच जाकर आम लोगों के लिए काम किया, इसलिए हमने भी घर घर जाकर दवाओं का भंडारण शुरु किया और एक मेडिकल बैंक की शुरुआत की.''

हाथ में थैला लिए आशीष और उनके दोस्तों की टोली घर-घर जाती और दरवाज़े खटखटा कर लोगों से अपील करती कि वो दवाईयां दान करें.

आम लोगों, डॉक्टरों और मेडिकल रिप्रेसेनटेटिव्स के ज़रिए हर साल हज़ारों रुपए की दवाएं इकट्ठा होने लगीं.

समय के साथ आशीष के थैले में दवाओं के अलावा और भी कई चीज़ें शामिल होने लगीं.

अपना पुराना चश्मा दान करते हुए उनके पड़ोसी तरुण भट्टाचार्जी कहते हैं, ''हम लोग पुराने चश्मे, बैसाखी, वॉकर, जोड़ों के दर्द की पट्टियां सभी कुछ दान करते हैं. एक बार तो एक परिवार ने पेसमेकर दान किया और तुरंत ही एक अस्पताल के ज़रिए वो एक ग़रीब व्यक्ति के काम आ गया.''

इकट्ठा की गई ये चीज़ें आशीष के साथ जुड़े डॉक्टरों की एक टीम के ज़रिए एक्सपाइरी तिथि और बीमारियों के आधार पर छांट ली जाती हैं और फिर एक डिस्पेंसरी के ज़रिए इन्हें ग़रीबों में मुफ्त बांट दिया जाता है.

Image caption कलकत्ता के कुछ ग़रीब और पिछड़े इलाकों में सप्ताह के एक दिन एक फुटपाथ अस्पताल की शुरुआत भी की गई है.

डिस्पेंसरी में आई रीना मलिक कहती हैं, ''सरकारी अस्पतालों में जाते हैं तो वो बाहर से खरीदने को दवाएं लिख देते हैं. हम ग़रीब हैं दवाएं खरीद नहीं सकते. सरकारी अस्पताल में डॉक्टर जब पर्चा पकड़ा देते हैं तो हम यहां आकर मुफ्त दवा ले लेते हैं.''

ग़रीबों तक मुफ्त दवाएं और अन्य सुविधाएं पहुंचाने का ये सिलसिला तीस साल बाद आज भी बदस्तूर जारी है. आम लोगों से मिली आर्थिक मदद और डॉक्टरों से मिले सहयोग के अलावा कई लोग अब उनके इस मिशन में उनके साथी हैं.

आशीष की सहयोगी नमिता कहती हैं, ''शुरुआत में हमें लोगों को दवाएं दान करने के लिए बहुत समझाना पड़ता था वो हमसे पूछते थे कि क्या हम डॉक्टर हैं जो दवाएं इक्टठा कर रहे हैं. धीरे-धारे लोग समझ गए कि डॉक्टरों के ज़रिए दवाएं बांट कर हम लोगों की कितनी मदद कर रहे हैं.''

आशीष की ये अनोखी मुहिम यहीं खत्म नहीं होती. कलकत्ता के कुछ ग़रीब और पिछड़े इलाकों में सप्ताह के एक दिन आशीष ने एक फुटपाथ अस्पताल की शुरुआत भी की है. ये अस्पताल उन मरीज़ों तक पहुंचता हैं जिन मरीज़ों की पहुंच अस्पतालों तक नहीं.

आशीष बताते हैं, ''ये फुटपाथ अस्पताल सप्ताह के हर दूसरे गुरुवार को सड़क के किनारे लगता है. शहर में दो जगह लगने वाले इस अस्पताल में दूर दूर से मरीज़ आते हैं. हम उन्हें मुफ्त दवाएं बांटते हैं और डॉक्टरों की टीम के ज़रिए वो इलाज भी करा सकते हैं.''

डी आशीष का मेडिकल बैंक अब कोलकाता के आसपास कई ज़िलों तक पहुंच चुका है और मुमकिन है कि मदद के जज़्बे की पूंजी से चल रहा ये बैंक हमेशा इसी चलता रहेगा.

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