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चिराग तले अंधेरा

सोने की बारीक कारीगरी का ज़िक्र हो तो बंगाल के ज़ेवरात और स्वर्ण शिल्पियों के बग़ैर चर्चा अधूरी है.

लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी रात-दिन बेशकीमती ज़ेवर बनाने वाले इन कारीगरों की अपनी ज़िंदगी अब ग़रीबी और बेरोज़गारी की गर्त में जा रही है.

कई इलाके अब ऐसे हैं जहां छेनी और हथौड़ी की ठकठक अब नहीं गूंजती.

पेश है कोलकाता से बीबीसी संवाददाता पारुल अग्रवाल की रिपोर्ट