संसद पर भारी बाबा रामदेव

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Image caption बाबा रामवेद ने काला धन और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरु किया है

चार दिन पहले योग गुरु बाबा रामदेव जब दिल्ली पहुँचे, तो केंद्र सरकार ने सबसे वरिष्ठ मंत्री प्रणब मुखर्जी सहित चार मंत्रियों को उनका स्वागत करने के लिए हवाई अड्डे पर भेजा.

और जब बाबा रामदेव ने अपने हज़ारों समर्थकों के साथ दिल्ली में काले धन और काला धन जमा करने वालों के ख़िलाफ़ अनशन शुरू किया तो सरकार ने उन्हें और उनके समर्थकों को आधी रात को जबरन वहाँ से हटा दिया और बाबा को एक विमान में बिठा कर दिल्ली से बाहर भेज दिया.

उन्हें 15 दिनों तक शहर में प्रवेश होने की भी अनुमति नहीं है. कांग्रेस पार्टी ने बाबा को ‘ठग’ और ‘धोखेबाज़’ क़रार दिया है और उनके आंदोलन को जबरन ख़त्म करवाने का बचाव किया है.

दूसरी ओर विपक्ष ने सरकार के उस क़दम को लोकतंत्र की हत्या कहा और बाबा का जम कर समर्थन किया. यह स्थिति भारत की संसदीय राजनीतिक प्रणाली में फैली हुई गड़बड़ी और राजनीतिक दलों के काम करने की प्रक्रिया के बारे में जनता की निराशा दर्शाती है.

जनता देश में फ़ैले भ्रष्टाचार, सरकारी अधिकारियों की अयोग्यता और विकास के कामों में सरकर की सुस्ती पर नाराज़ है.

जनता काफ़ी समय से अपेक्षा कर रही थी कि ईमानदार समझे जाने वाले मनमोहन सिंह की सरकार भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कोई उचित क़दम उठाएगी. लेकिन वह कोई क़दम उठाने के बजाए मंत्रियों और सरकारी विभागों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का बचाव करने में व्यस्त रही.

'बढ़ता जन आंदोलन'

दूसरी ओर विपक्षी दल भी नकारात्मक राजनीति में फ़ंसे हुए हैं. उसी परिप्रेक्ष्य में महाराष्ट्र के गाँधीवादी नेता अन्ना हज़ारे और उत्तर भारत के अरबपति साधू बाबा रामदेव ने जब भ्रष्टाचार और काले धन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, तो वह कुछ दिनों में एक ज़बरदस्त जन आंदोलन में बदल गई.

विपक्ष को जो काम करने चाहिए थे, अब वह एक साधू और एक साधारण व्यक्ति कर रहा है. यह दोनों नेता मूल रूप से चुनी हुए लोकतांत्रिक तंत्र के विरुद्ध हैं.

उन्हें जो समर्थन मिल रहा है, वह भी इस बात को दर्शाता है कि राजनीतिक दल जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रहे हैं. लोगों का देश के राजनीतिक दलों पर विश्वास उठता जा रहा है.

सरकार ने जन आंदोलन के दबाव के बावजूद कुछ दिनों में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जो क़दम उठाए हैं उससे जनता को और विश्वास हो गया है कि सरकार भ्रष्टाचार को ख़त्म करने में गंभीर नहीं है.

पूरा देश इस आंदोलन को गंभीरता से देख रहा है और इस में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं है. राजनीतिक दल केवल पृष्ठभूमि में ही नहीं चल रहे हैं बल्कि उन्हें एक ‘विलेन’ के तौर पर देखा जा रहा है.

क़ानून किस तहर का बनेगा वह आज का एक साधू और पाँच ऐसे लोग तय कर रहे हैं जो जनता के चुने हुए प्रतिनिधि भी नहीं हैं. जो काम संसद में होना था वह अब संसद से बाहर हो रहा है.

'विपक्ष शर्मिंदा'

Image caption बाबा रामदेव का देश भर में व्यापक स्तर पर समर्थन हो रहा है

सरकार पूरी तरह से भीड़ में फ़ंसी हुई है. विपक्षी दल शर्मिंदगी के साथ उस भीड़ का समर्थन कर रहे हैं और साथ ही उन्हें यह भी तकलीफ़ है कि यह काम उन्हें करना चाहिए था, अब वह काम एक साधू और ऐसे लोग कर रहे हैं जो जनता के चुने हुए प्रतिनिधि भी नहीं हैं.

सरकार को अपने काम पर धचका महसूस हुआ है. उसने जिस तरह देश के लोकप्रिय साधू बाबा रामदेव को आधी रात को पकड़ कर शहर से निकाल दिया है वह अब और उस भीड़ में फंसना नहीं चाहती. सरकार के इस क़दम की कड़ी निंदा की जा रही है.

लेकिन कई जानकार मानते हैं कि निर्वाचित संसदीय प्रणाली की बेहतरी के लिए राजनीति को साधुओं और ग़ैर-सरकारी संस्थाओं के चुंगल से मुक्त रखना होगा.

इसमें महत्वपूर्ण यह है कि अगर सरकार ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ तुरंत क़दम नहीं उठाए तो वह न केवल भारत के इतिहास में सबसे भ्रष्ट सरकार के तौर पर जानी जाएगी बल्कि भविष्य के चुनाव उसके लिए राजनीतिक ताबूत साबित होंगे.

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