फिर घिरी छ्तीसगढ़ सरकार

रमेश अग्रवाल
Image caption छत्तीसगढ़ में मानवधिकार और सामाजिक कार्यर्कता भारी दबाव में रह रहे हैं.

उद्योग समूहों के ख़िलाफ़ झंडा बुलंद करनेवाले पर्यावरण कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल की गिरफ़्तारी और फिर अस्पताल में इलाज के दौरान उन्हे हथकड़ियों में रखे जाने के मामले में छत्तीसगढ़ सरकार घिरती नज़र आ रही है.

रमेश अग्रवाल के साथ उनके सहयोगी हरिहर पटेल को भी गिरफ्तार किया था.

पुलिस पर आरोप है कि गिरफ़्तारी के बाद तबियत ख़राब होने की वजह से जब रमेश अग्रवाल को अस्पताल में भरती करवाया गया तो उन्हें बिस्तर में ही हथकड़ियों से जकड़ कर रखा गया.

बाद में विरोध के कारण उनकी हथकड़ियाँ खोली गईं.

अब लंदन स्थित मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी अग्रवाल और पटेल की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए इन्हें फ़ौरन छोड़े जाने की मांग की है.

एमनेस्टी इंटरनॅशनल की एशिया पेसिफिक की उपनिदेशक मधु मल्होत्रा नें एक बयान जारी करके कहा है, "किसी बीमार इंसान को अस्पताल के बिस्तर में हथकड़ियों से जकड़ देना ना सिर्फ अमानवीय है बल्कि यह एक क्रूर आचरण भी है. यह व्यवहार ऐसे इंसान के ख़िलाफ़ हुआ है जो शांतिपूर्ण तरीके से अभियान चलाने के लिए जाना जाता हो."

संस्था ने राज्य सरकार से मांग की है कि वह अग्रवाल और पटेल के ख़िलाफ़ दर्ज किये गए मामले को ख़त्म कर दे.

रायगढ़ पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा का कहना है कि किन परिस्थितियों में अग्रवाल को हथकड़ी लगाई गई उसकी जांच हो रही है. उनका मानना है कि अस्पताल में उन्हें हथकड़ियों में नहीं रखा जाना चाहिए था.

पुराना मामला

दोनों पर्यावरण कार्यकर्ताओं को पिछले माह रायगढ़ शहर से गिरफ्तार किया गया था और पुलिस का कहना है कि उनके ख़िलाफ़ एक साल पुराना मामला दर्ज है.

ये मामला पिछले साल जिंदल कंपनी के प्रस्तावित 2400 मेगावाट विद्युत् इकाई के लिए ज़मीन अधिग्रहण से संबंधित एक जनसुनवाई के दौरान मामला दर्ज किया गया था.

कंपनी पर्यावरण मंत्रालय से प्रस्तावित प्लांट के लिए सहमति की मांग कर रही थी.

लेकिन अग्रवाल ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को एक प्रतिवेदन देकर दावा किया था कि कंपनी ने बिना मंत्रालय की आज्ञा के ही प्लांट का निर्माण के काम शुरू कर दिया है. जनसुनवाई के दौरान भी उन्होंने प्लांट का विरोध किया था.

केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय नें एक जांच दल का गठन किया और पाया के अग्रवाल के प्रतिवेदन में लगाए गए आरोप सही हैं. मंत्रालय के आदेश पर कंपनी को काम बंद करना पड़ा.

हालांकि बाद में उसे इसकी सहमति मिल गई मगर अग्रवाल के अभियान की वजह से कंपनी को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ा था.

अग्रवाल जन चेतना नामक एक सामजिक संगठन चलाते हैं और सूचना के अधिकार के तहत उन्होंने कई मामलों को उजागर करने का काम किया है. जिंदल के प्रस्तावित प्लांट को लेकर हो रही जनसुनवाई में वह और हरिहर पटेल काफ़ी मुखर रहे.

बाद में कंपनी की शिकायत पर पुलिस नें दोनों ही कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ मानहानि, धमकी सहित भारतीय दंड संहिता के तहत कई मामले दर्ज किए.

इस महीने की दो तारीख़ को रायगढ़ ज़िला एवं सत्र न्यायालय नें दोनों लोगों की ज़मानत की अर्जी ख़ारिज कर दी थी.

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