सीरिया से अत्याचार बंद करने की अपील

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Image caption सीरिया में सैंकड़ो सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्लै ने सीरिया सरकार से अपने ही लोगों पर अत्याचार बंद करने की अपील की है.

उनका कहना था कि सीरिया बर्बरतापूर्वक जनता के विरोध को कुचल रहा है और मार्च में विरोध की शुरुआत के बाद से संभवत: 1100 लोग मारे गए हैं और हज़ारों अन्य हिरासत में हैं.

पिल्लै का बयान सुरक्षा परिषद में सीरिया की निंदा के लिए एक नया प्रस्ताव पेश किए जाने के बाद आया है. नया प्रस्ताव पश्चिमी देशों की ओर से ब्रिटेन और फ़्रांस ने पेश किया है.

ब्रिटेन और फ़्रांस की अगुआई में पश्चिमी देश सीरिया पर दबाव बढ़ाना चाहते हैं. सीरिया में हिंसा बढ़ते जाने के मद्देनज़र दरअसल इन देशों पर आंतरिक दबाव ज़्यादा है.

इसीलिए सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ लंदन और पेरिस जैसी राजधानियों से बयान निरंतर कड़े होते जा रहे हैं. इसके बाद भी सीरिया के ख़िलाफ़ पेश किया गया प्रस्ताव पूर्व में लीबिया के ख़िलाफ़ पारित प्रस्ताव के मुक़ाबले कम कड़ा है.

फिर भी संयुक्तराष्ट्र में ब्रिटेन के राजदूत मार्क लायल ग्रांट नए प्रस्ताव को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं. उन्होंने कहा, "प्रस्ताव की मुख्य बात ये है कि इसमें हिंसा पर तत्काल रोक की माँग करते हुए मानवाधिकारों के उल्लंघन की निंदा की गई है. इसमें सीरिया के अधिकारियों से विभिन्न शहरों की घेरेबंदी को समाप्त करने की भी माँग की गई है. इसमें जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए ज़रूरी क़दम उठाने के लिए भी कहा गया है."

प्रतिबंधों का विरोध

यूरोपीय संघ के भीतर अलग से सीरिया पर प्रतिबंध लगाने के बारे में विचार-विमर्श हो रहा है, लेकिन रूस के विरोध के रहते प्रतिबंधों के किसी भी प्रस्ताव का पारित हो पाना नामुमकिन है.

शायद रूसी विरोध को शांत करने के लिए ही सुरक्षा परिषद में पेश नए प्रस्ताव को अपेक्षाकृत नरम रखा गया है.

वैसे रूस ने अभी खुल कर ये नहीं कहा है कि सीरिया पर प्रतिबंधों के किसी प्रस्ताव को वो वीटो करेगा. परिषद के चीन और भारत जैसे सदस्यों ने भी अपने रुख़ को साफ़ नहीं किया है. उल्लेखनीय है कि चीन के पास भी वीटो अधिकार है.

कुल मिलाकर सीरिया मामले पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया उतनी त्वरित और कठोर नहीं है जो कि लीबिया मामले में देखी गई थी.

पश्चिम एशिया में सीरिया की अवस्थिति सामरिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण है. रूस के लिए तो सीरिया इस इलाक़े में दीर्घावधि का सहयोगी है.

अरब देश भी सीरिया को लेकर एकमत नहीं है क्योंकि अलग-अलग देशों के सीरिया के साथ अलग-अलग स्तर के संबंध हैं.

यानि मध्य-पूर्व में सीरिया की महत्वपूर्ण स्थिति के कारण अन्य देशों के लिए उसके बारे में दोटूक फ़ैसला लेना अपेक्षाकृत कठिन हो जाता है. इसलिए सीरिया के बारे में कूटनीतिक बैठकों का सिलसिला अभी आगे भी जारी रहेगा.

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