नहीं रहा 'भारत का पिकासो'

एमएफ़ हुसैन इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption एमएफ़ हुसैन वर्ष 2006 से भारत से बाहर रहे थे

भारत के मशहूर पेंटर मक़बूल फ़िदा हुसैन का निधन हो गया है. गुरुवार तड़के लंदन के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया.

अपनी कई पेंटिंग्स के कारण विवादों में रहे एमएफ़ हुसैन 95 वर्ष के थे.

मक़बूल फ़िदा हुसैन का जन्म महाराष्ट्र के पंढ़रपुर में 17 सितंबर 1915 को हुआ था.

वर्ष 2006 से ही वे भारत से चले गए थे. हिंदू देवी-देवताओं की विवादित पेंटिग्स के कारण हिंदू संगठनों ने उन्हें धमकी दी थी.

ख़ास बातचीत का वीडियो

पिछले साल बीबीसी संवाददाता राजेश प्रियदर्शी ने लंदन में उनसे विशेष बातचीत की थी. देखिए इस बातचीत का वीडियो....

एमएफ़ हुसैन से बातचीत का पहला हिस्सा

एमएफ़ हुसैन से बातचीत का दूसरा हिस्सा

विवाद

फ़ोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें भारत का पिकासो की पदवी दी थी. वर्ष 1996 में हिंदू देवी-देवताओं की नग्न पेंटिग्स को लेकर काफ़ी विवाद हुआ.

कई कट्टरपंथी संगठनों ने तोड़-फोड़ की और एमएफ़ हुसैन को धमकी भी मिली. पिछले साल जनवरी में उन्हें क़तर ने नागरिकता देने की पेशकश की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था.

हिंदी फ़िल्मों की मशहूर अभिनेत्री माधुरी दीक्षित के बड़े प्रशंसक एमएफ़ हुसैन ने उन्हें लेकर गज गामिनी नाम की फ़िल्म भी बनाई थी.

इसके अलावा उन्होंने तब्बू के साथ एक फ़िल्म मीनाक्षी: अ टेल ऑफ़ थ्री सिटीज़ बनाई थी. इस फ़िल्म के एक गाने को लेकर काफ़ी विवाद हुआ था. कुछ मुस्लिम संगठनों ने इस फ़िल्म पर आपत्ति जताई थी.

करियर

एमएफ़ हुसैन को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान 1940 के दशक के आख़िर में मिली. वर्ष 1947 में वे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप में शामिल हुए.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption एमएफ़ हुसैन वर्ष 2006 से भारत से बाहर रह रहे थे

युवा पेंटर के रूप में एमएफ़ हुसैन बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट्स की राष्ट्रवादी परंपरा को तोड़कर कुछ नया करना चाहते थे. वर्ष 1952 में उनकी पेंटिग्स की प्रदर्शनी ज़्यूरिख में लगी.

उसके बाद तो यूरोप और अमरीका में उनकी पेंटिग्स की ज़ोर-शोर से चर्चा शुरू हो गई. वर्ष 1955 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया.

वर्ष 1967 में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म थ्रू द आइज़ ऑफ़ अ पेंटर बनाई. ये फ़िल्म बर्लिन फ़िल्म समारोह में दिखाई गई और फ़िल्म ने गोल्डन बेयर पुरस्कार जीता.

वर्ष 1971 में साओ पावलो समारोह में उन्हें पाबलो पिकासो के साथ विशेष निमंत्रण देकर बुलाया गया था. 1973 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया तो वर्ष 1986 में उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया.

भारत सरकार ने वर्ष 1991 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. 92 वर्ष की उम्र में उन्हें केरल सरकार ने राजा रवि वर्मा पुरस्कार दिया.

क्रिस्टीज़ ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमरीकी डॉलर में बिकी. इसके साथ ही वे भारत के सबसे महंगे पेंटर बन गए थे. उनकी आत्मकथा पर एक फ़िल्म भी बन रही है.

संबंधित समाचार