ये है कोलकाता का 'हैंडी-कैम गैंग'

Image caption बीबीसी के लिए सिटीज़न रिपोर्टर स्वपन मुखर्जी.

दुनियाभर के हज़ारों-करोड़ों बच्चों का बचपन कारखानों के धुएं और बर्तनों की जूठन के बीच घिर कर रह गया है. इन बच्चों की कहानियां अक्सर हम तक पहुंचती हैं, लेकिन इस बार कहानी के पात्र ही कहानी के सूत्रधार हैं.

अपने बदहाल बचपन की दास्तान बयां करने के लिए ये बच्चे खुद बन गए हैं फिल्मकार.

सिटीज़न रिपोर्ट की कड़ी में पेश है कोलकाता के स्वपन मुखर्जी की कहानी जिन्होंने हाशिए पर जी रहे इन बच्चों को कैमरे का ताकत दी और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ दिया.

मेरा नाम स्वपन मुखर्जी है और मैं कोलकाता के मध्यमग्राम इलाके में रहता हूं. कॉलेज के दिनों से ही मैं बच्चों के अधिकारों को लेकर काम करता रहा हूं.

बाल शोषण से जुड़े इन मामलों को सामने लाने और बच्चों के साथ हो रहे अन्याय के सबूत जुटाने के लिए मैं अक्सर गांव-गांव जाकर इन बच्चों से मिलता और उनकी कहानियां कैमरे में दर्ज कर लेता था.

धारे-धीरे इन बच्चों से मेरा जुड़ाव बढ़ता गया और मैंने बच्चों के लिए एक शेल्टर होम बनाने का फैसला किया.

इस तरह 1990 में मैंने ‘सेंटर ऑफ कम्युनिकेशन एंड डेवेलपमेंट’ के ज़रिए ‘मुक्तनीर’ की स्थापना की. ये बेघर बच्चों के लिए एक आसरा था और उन्हें उनका बचपन लौटाने की एक पहल.

‘मुक्तनीर’ के ज़रिए मैंने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, उनके रहने-खाने और उनके एक बेहतर इंसान बनने की प्रक्रिया शुरु करने की कोशिश की.

अपने कामकाज के दौरान मैंने देखा कि इन बच्चों में कैमरा थामने की ललक है और इसके ज़रिए उन्हें देश-दुनिया से जुड़ने और समाज तक अपनी बात पहुंचाने का एक नया ज़रिया मिल रहा है.

शुरुआत में मैंने उन्हें स्टिल कैमरे दिए और उनसे तस्वीरें खींचने को कहा. इस दौरान बच्चों ने कई अजीबो-ग़रीब चीज़ें कैमरे में कैद कीं. उनसे कई गलतियां भी हुईं, फिर मैंने उन्हें वीडियो कैमरे दिए और एक कहानी कहने का सुझाव दिया.

बच्चों ने इसके लिए घटते जंगलों, इंसान और जानवरों के रिश्ते, बच्चों पर हो रहे अत्याचार और शोषण जैसे कई विषय चुने, और इस तरह फिल्मों की शुरुआत हो गई.

बापी मोंडोल आठ साल की उम्र में चार फिल्मों के लिए काम कर चुके हैं. वो कहते हैं, ''शुरुआत में हमने एक फिल्म बनाई जो पूरी दुनिया में लोगों को बहुत पसंद आई. तब से अब तक मैं और मेरे साथी चार से ज़्यादा फिल्में कर चुके हैं. तीन फिल्मों में मैं स्क्रिप्टराइटर था और चौथी फिल्म में असिस्टेंट डायरेक्टर बना.''

हमने कुछ अनुभवी लोगों से भी मदद ली और मैंने देखा कि फिल्म जैसे माध्यम के बिना ये बच्चे शायद देश-दुनिया तक अपनी बात नहीं पहुंचा सकते थे.

फिल्म एक ऐसी भाषा है जो देश और समाज की सीमाओं से परे हैं और शायद यही वजह है कि इन बच्चों की बनाई ज़्यादातर फिल्मों में संवाद नहीं केवल छायाछित्र हैं.

इन बच्चों की इच्छाशक्ति का ही कमाल है कि हम अब तक आठ से ज़्यादा फिल्में बना चुके हैं. वी आर, आमरा, वी सी, आईऐम जैसी कई फिल्मों के ज़रिए ज़िंदगी के लिए इनका एक अलग ही नज़रिया सामने आया है.

Image caption स्वपन के 'हैंडीकैम गैंग' से जुड़े बच्चों ने कई फिल्मों में बतौर कैमरामैन काम किया है.

ये फिल्में इन बच्चों के लिए अपने ज़िंदगी के अंधेरों से बाहर निकलने का एक ज़रिया भी हैं.

सैफ़ुल मोंडोल ने अब 18 की उम्र पार कर ली है और मुक्तनीर ने उन्हें अलविदा कह दिया है. लेकिन स्वपन के नन्हें फिल्मकारों की फौज में शामिल सैफ़ुल ने कई फिल्मों के लिए कैमरा संभाला. उसकी बनाई इन फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले.

वो कहते है, ''मैंने जब ये काम किया तो मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला. मैं अब और फिल्में बनाना चाहता हूं और मुझे उम्मीद है कि मैं एक अच्छा कैमरामैन बनूंगा.''

बच्चों की बनाई पांच से ज़्यादा फिल्मों को अब तक कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं. ये फिल्में कई जगह दिखाई जा चुकी हैं. वी आर नाम की फिल्म को तो सात अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले.

मेरा मकसद इन बच्चों को सिर्फ आसरा देना नहीं बल्कि बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना और उन्हें समाज में इज़्ज़त का दर्जा दिलाना है.

मेरा मानना है कि जब आप इन ज़रूररमंद बच्चों के लिए कुछ करने की सोचें तो यह सोच कर आगे बढ़ें कि अगर ये आपके अपने बच्चे होते तो उनकी बेहतरी और उनकी तरकक्की के लिए आप क्या करते. अगर हम खुद नीची नज़रों से इन्हें देखेंगे तो इन्हें कभी सम्मान से ऊंचा देखना नहीं सिखा पाएंगे.

मैं मानता हूं कि ये मेरे इस फलसफ़े की ही जीत है कि कैमरे और फिल्में अब इन बच्चों के लिए अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने का नया हथियार बन गए हैं.

अगर आप भी स्वपन की तरह बीबीसी के लिए सिटीज़न रिपोर्टर बनना चाहते हैं तो अपनी कहानियां हम तक पहुंचाएं. हमसे संपर्क करें hindi.letters@bbc.co.uk पर.

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