अन्ना और सरकार में गहरे हुए मतभेद

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Image caption अन्ना हज़ारे की टीम ने मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखी है

लोकपाल विधेयक के मसौदे को लेकर केंद्र सरकार और अन्ना हज़ारे की टीम में मतभेद और गहरे हो गए हैं. सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए मसौदा समिति में नागरिक समाज के सदस्यों ने पिछली बैठक का बहिष्कार दिया था.

लेकिन इस बीच दोनों पक्षों के बीच बयानबाज़ी तेज़ हो गई है और कांग्रेस पार्टी भी इसमें कूद चुकी है. अन्ना हज़ारे की टीम ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर सरकार का रुख़ स्पष्ट करने को कहा है.

अन्ना हज़ारे की टीम ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में पूछा है कि प्रधानमंत्री के पद को लोकपाल के दायरे में क्यों नहीं लाना चाहिए? उन्होंने कहा है कि ऐसा करना इस मामले पर पीछे जाने जैसा है.

पत्र में कहा गया है- आप जैसा ईमानदार प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में आने से डर क्यों रहा है?

पत्र में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के रुख़ पर भी आपत्ति जताई गई है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि नागरिक समाज के लोग लोकतंत्र को कमज़ोर कर रहे हैं.

पत्र में कहा गया है कि वित्त मंत्री लोकतंत्र के स्वरूप को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं.

बयानबाज़ी

इस बीच कांग्रेस ने भी अन्ना हज़ारे और उनकी टीम के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी तेज़ कर दी है. अन्ना हज़ारे और उनकी टीम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के समर्थन का आरोप पार्टी पहले ही लगा चुकी है.

सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि लोकतंत्र को सबसे ज़्यादा ख़तरा अनिर्वाचित तानाशाहों से है. हालाँकि उन्होंने इस संबंध में किसी का नाम नहीं लिया.

अन्ना हज़ारे की टीम की आलोचना करते हुए मनीष तिवारी ने कहा, "अपने को गांधीवादी होने का दावा करने वाले लोगों की 'भाषा में हिंसा' दिख रही है. ऐसा लग रहा है कि वे उनलोगों की स्क्रिप्ट पढ़ रहे हैं, जो देश को अस्थिर करना चाहते हैं."

पिछले दिनों कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री के पद को लोकपाल के दायरे में लाने की वकालत की थी. इस मामले में मनीष तिवारी ने कहा कि दिग्विजय सिंह पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि ये उनकी निजी राय है.

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