अनशन कर रहे साधु की मौत

निगमानंद
Image caption निगमानंद ने पहले भी गंगा को लेकर आंदोलन किए थे.

गंगा में अवैध खनन के विरोध में पिछले 68 दिनों से हरिद्वार में अनशन कर रहे हिंदू धार्मिक गुरू स्वामी निगमानंद की मौत हो गई है.

पिछले तेरह दिनों से वो देहरादून के जॉली ग्रांट अस्पताल में भर्ती थे जहाँ रविवार उनकी मौत हो गई.

देहरादून के इसी अस्पताल में भ्रष्टाचार के विरोध में नौ दिनों तक आमरन अनशन करनेवाले योग गुरू बाबा रामदेव का इलाज चला था.

हालांकि रामदेव को पाँच दिनों के बाद ही अस्पताल में दाख़िल करवा दिया गया था जहाँ उन्हें ग्लूकोज़ पर रखा गया था.

पहले भी कई बार गंगा के 'उद्धार' के लिए अनशन कर चुके निगमानंद ने अपना ये सत्याग्रह 19 फरवरी से शुरू किया था. लेकिन उनकी हालत 15 मई से बिगड़ गई थी जो बाद में और बिगड़ती गई जिसके बाद उन्हें जॉली ग्रांट अस्पताल में भर्ती कर दिया गया था.

निगमानंद श्रृषिकेश में मुनि की रेती से लेकर हरिद्वार के बहादुरगढ़ के क्षेत्र में गंगा के तट पर होनेवाले अवैध खनन और स्टोन क्रशर का विरोध कर रहे थे.

पिछले साल दिसंबर में सरकार ने खननों पर पाबंदी लगा दी थी. लेकिन हाई कोर्ट ने बाद में इसपर स्थगन आदेश जारी कर दिया था जिसके बाद निगमानंद ने दोबारा आंदोलन शुरू कर दिया था.

बाँध परियोजनाएं

सैंतीस-वर्षीय निगमानंद हरिद्वार के मातृ सदन से जुडे हुए थे. मातृ सदन वही संस्था है जहाँ जाने माने पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल ने गंगा पर बन रहे बाँधों को लेकर आंदोलन किया था जिसके बाद गंगोत्री क्षेत्र में दो बड़ी बाँध परियोजनाओं पर रोक लगा दी गई थी.

पिछले माह की 15 तारीख़ को मातृ सदन ने पुलिस में शिकायत की थी कि भू-माफि़या निगमानंद को ज़हर देकर मारने की साज़िश कर रहा है.

सदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद ने सररकार पर संवेदनहीनता का आरोप लगाया है और पूरे मामले की जाँच केंद्रीय जाँच एजेंसी सीबीआई से करवाने की मांग की है.

हरिद्वार सिटीज़न काउंसिल के अध्यक्ष विजय वर्मा ने निगमानंद की मौत के लिये उत्तराखंड सरकार को जिम्मेदार ठहराया है.

उन्होंने कहा, “ये एक संत की हत्या है, प्रदेश सरकार ने कभी भी निगमानंद की मांगों पर ग़ौर नहीं किया और प्रशासन के मज़बूत तत्व भू-माफिया के साथ मिलकर गंगा का दोहन करते रहे.”

हालांकि मुख्यमंत्री के सलाहकार देवेंद्र भसीन ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है और कहा है कि निगमानंद को सरकार की पहल पर ही अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

पुराने आंदोलनकारी

Image caption गंगा मे फैल रहे प्रदूषण को लेकर हाल में कई आंदोलन हुए हैं

निगमानंद इसके पहले भी गंगा के दोहन के ख़िलाफ़ सत्याग्रह कर चुके थे. एक बार तो उनका अनशन 72 दिन और 115 दिनों तक चला था.

उनका कहना था, "त्याग और सत्याग्रह से ही सच्ची लड़ाई लड़ी जा सकती है."

मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित राजेन्द्र सिंह, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े रहे गोविंदाचार्य भी निगमानंद का समर्थन कर रहे थे फिर भी राज्य की भारतीय जनता पार्टी सरकार से उन्हें अपने आंदोलन में राज्य सरकार से कोई मदद नही मिल पाई.

भाजपा ने देश भर में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन को समर्थन दिया है और इसके ख़िलाफ़ ख़ुद भी एक बड़ी मुहिम छेड़ रखी है.

पिछले महीने उमा भारती भी गंगा को बचाने के लिये हरिद्वार में अनशन पर बैठी थीं लेकिन कुछ ही दिनों में ही उनके अनशन का अंत हो गया. बाद में वो भाजपा में शामिल होने दिल्ली चली गईं.

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