डीएफ़आईडी: सहायता या कुछ और?

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Image caption एक सोच ये है भारत को अभी भी विदेशी मदद की ज़रूरत है क्योंकि एक बड़ा तबका अभी भी गरीबी रेखा के नीचे है

डीएफ़आईडी ने वर्ष 2015 तक भारत को आर्थिक सहायता जारी रखने का फ़ैसला किया है.

इसके बाद ब्रिटेन में सवाल पूछे जा रहे हैं कि भारत जैसे विकासशील देश को ब्रिटेन धन क्यों दे?

वहीं भारत के कई हलकों में भी डीएफ़आईडी यानि डिपार्टमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट से हर वर्ष मिलने वाली आर्थिक सहायता को लेकर शंकाएँ हैं.

डीएफ़आईडी की वेबसाइट के मुताबिक वर्ष 2009-10 के दौरान एजेंसी ने भारत पर करीब 20 अरब रुपए से ज़्यादा खर्च किए.

इनमें स्वास्थ्य, शिक्षा, शासन प्रणाली जैसे क्षेत्र शामिल हैं.

डीएफ़आईडी ने मलेरिया को खत्म करने के लिए कदम उठाए, बाढ़ से बचे रहने वाले स्कूबा चावल के विकास के लिए काम किया, गर्भवती माताओं को अस्पताल तक ले जाने के लिए विशेष गाड़ियों या जननी एक्सप्रेस शुरु करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी किए.

तारीफ़

उड़ीसा के एक गाँव में रहने वाली ममता माई भाज़ी ने बीबीसी के एक संवाददाता को बताया कि पहले उन्हें अपने परिवार के खाद्य सुरक्षा के बारे में चिंता रहती थी, लेकिन डीएफ़आईडी की मदद से उन्होंने पास ही के बाज़ार में दाल बेचने का काम शुरू किया जिससे पूरे गाँव को फ़ायदा हुआ.

ममता ने कहा, "हम कमाए गए धन से उन लोगों की मदद करते हैं जिन्हें बच्चों को स्कूल भेजने के लिए धन चाहिए या फिर वो बीमार हैं और पैसे की ज़रूरत है, या फिर जिनके यहाँ शादी है और धन की कमी है."

लेकिन डीएफ़आईडी के हिस्से जहाँ तारीफ़ें आईं हैं, कई बातों के लिए संस्था को आड़े हाथों भी लिया गया है.

‘डीएफ़ाआईडी ज़िम्मेदार’

शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता अनिल सदगोपाल शिक्षा के बाज़ारीकरण के लिए डीएफ़आईडी जैसी एजेंसियों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. वो डीएफ़आईडी और वर्ल्ड बैंक के आर्थिक समर्थन से चल रही सर्वशिक्षा अभियान से बेहद ख़फ़ा हैं जो बच्चों को मात्र प्राथमिक शिक्षा देने की बात करता है.

वो कहते हैं, "पाँचवी और आठवीं कक्षा की शिक्षा का भारत में कोई मतलब नहीं है. बिना 12वीं कक्षा की शिक्षा के बिना करियर का कोई भी रास्ता नहीं खुलता. क्या भारत के प्रधानमंत्री अपने नाती-पोतों के लिए ये बात करेंगे? क्या भारत का कोई सांसद अपने बच्चों के लिए ये कहेगा कि सब कुछ मिलने से बेहतर है थोड़ा बहुत ही मिल जाना?"

अनिल सदगोपाल के मुताबिक देश में पैसे की कमी नहीं है और डीएफ़आईडी जैसी संस्थाओं के आने से समाज के ताक़तवर लोगों को ही फ़ायदा होगा.

जागृति आदिवासी दलित संगठन की माधुरी कृष्णास्वामी भी डीएफ़आईडी जैसी संस्थाओं के भारत आने के सख्त खिलाफ़ हैं क्योंकि 'उनकी नीतियाँ आम व्यक्ति के विरोध में हैं और अमीरों के पक्ष में'.

‘डीएफ़आईडी, विश्व बैंक और एशियन विकास बैंक जैसी संस्थाएँ बाज़ार के लाभ को ध्यान में रखते हुए फ़ैसले लेती हैं.’

उधर गैरसरकारी संस्था सेंटर फ़ॉर सोशल मार्केट्स की मालिनी मेहता के मुताबिक जिस तरीके से डीएफ़आईडी का पैसा खर्च होता है, उसमें पारदर्शिता की कमी होती है.

मालिनी कहती हैं कि उन्होंने इस बारे में कुछ सुबूत डीएफ़ॉआईडी को दिए हैं और डीएफ़ाईडी ने पारदर्शिता को और बढ़ाने की बात कही है.

एचआईवी कार्यक्रमों से हाथ खींचा

उधर एचआईवी और एड्स के बारे में लोगों को जानकारी देने के कार्यक्रमों को लेकर डीएफ़आईडी की फंडिंग की सराहना हुई है लेकिन डीएफ़आईडी और दूसरी एजेंसियों के अपना हाथ खींचने को कार्यकर्ताओं ने ग़लत बताया है.

इसी विषय में काम कर रही संस्था नाज़ फ़ाउंडेशन की अंजली गोपालन कहती हैं, "काफ़ी दिनों से डीएफ़ाआईडी का कोई पैसा नहीं आ रहा है. सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को ऐसा लगता है कि भारत में एचआईवी पर सहायता देने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि स्थिति बदल चुकी है, पर सच ये है कि अभी तक कई लोगों तक सही जानकारी नहीं पहुँच पाई है."

अंजली के मुताबिक इससे सुधर रही स्थिति भविष्य में फिर खराब हो सकती है.

यानी डीएफ़आईडी पर भारत में मत भिन्नता है. डीएफ़आईडी के सामने आगे आने वाले दिनों में इसके बीच काम करने की चुनौती होगी.

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