ज़मीन गई, मुआवज़े की रक़म भी ख़त्म

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गर्मियों की चिलचिलाती दोपहर में घरबरा गाँव की गलियाँ लगभग सूनी पड़ी हैं. एक पक्के मकान के साए में गर्मी से परेशान कुछ नौजवान गोटियाँ खेलते हुए वक़्त काट रहे हैं.

ग्रेटर नोएडा से लगे गौतमबुद्ध नगर ज़िले में यमुना एक्सप्रेस वे के किनारे का ये गाँव दूर से संपन्न सा दिखता है. गाँव के लगभग सभी घर पक्के हैं और घरों के आगे कारें खड़ी नज़र आती हैं. दुकानों पर मोबाइल फ़ोन कंपनियों के दो-एक बोर्ड भी दिखते हैं.

लेकिन ये सिर्फ़ ऊपरी और अधूरी तस्वीर है.

ये उन किसानों का गाँव है जो जिन्हें आठ साल पहले ज़मीन का मुआवज़ा मिला था. उन्होंने पक्के मकान बनाए, कुछ क़र्ज़ निपटाए, शादी-ब्याह पर ख़र्च किया और मुआवज़े की रक़म स्वाहा हो गई.

अब ज़्यादातर लोग कहते हैं कि उनके पास न तो ज़मीन बची न पैसा. आठ साल पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने 1894 के क़ानून का इस्तेमाल करके घरबरा के और आसपास के गाँवों के किसानों की ज़मीन ले ली थी.

न ज़मीन न रोज़गार

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घरबरा के जयकिशन कहते हैं कि न ज़मीन है और न ही नौजवानों के पास कोई रोज़गार. इसलिए वो गर्मियों की दोपहर में नुक्कड़ों पर बैठकर गोटियों का खेल खेलकर वक़्त काटते हैं.

जयकिशन की लगभग सत्तर बीघा ज़मीन चली गई. वो कहते हैं, “अब ज़मीन न के बराबर है. मुआवज़े का पैसा बेरोज़गारी में खा गए. पहले कच्चे मकान थे, अब पक्के बना लिए. कुछ पैसा बीमारी में ख़र्च हो गया. किसान पैसा कहाँ बचा पाता है?”

घरबरा और आसपास के कई गाँवों के लोगों को क़रीब दस साल पहले पता चला कि एक विश्वविद्यालय और सड़क के लिए उनकी ज़मीनों का अधिग्रहण किया जाना है. किसान बताते हैं कि सरकार ने दो लाख 23 हज़ार रुपए प्रति बीघे की दर से मुआवज़ा देकर उनकी ज़मीनें ले लीं.

पचहत्तर वर्ष के रामकिशन शर्मा कहते हैं कि तीन भाइयों की 75 बीघे ज़मीन सरकार ने ले ली और हर भाई को पचास लाख से कुछ ज़्यादा रक़म मुआवज़े में मिली. लेकिन ये राशि मकान बनाने, शादी ब्याह, हारी-बीमारी में ख़र्च हो गया.

उनके घर के आगे खड़ी कार देखकर मैं ख़ुद को रोक नहीं सका और पूछा कि ये कार भी क्या मुआवज़े की रक़म से ख़रीदी? रामकिशन शर्मा ने कहा, “ये कार मेरे बेटे ने ख़रीदी. इसे वो किराए पर चलाता है ताकि रोटी चलती रहे.”

खाएं क्या

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उन्होंने कहा कि किसानों ने ज़मीन के बदले मिले पैसे से मकान तो बना लिए लेकिन अब वो खाएँ क्या? नौजवानों के पास रोज़गार नहीं है.

सुंदर पंडित ने दनकौर डिग्री कॉलेज से 2003 में बी. कॉम पास किया है लेकिन वो आज भी बेरोज़गार हैं. “मैं कुछ नहीं करता हूँ. घास खोदने की नौकरी पर भी नहीं रखा यार किसी ने. ये मज़ाक नहीं है मैं सच कह रहा हूँ.”, सुंदर पंडित ने कहा.

उन्होंने बताया कि उनकी तेरह बीघे ज़मीन थी जिसके बदले उन्हें 26 लाख रुपए मिले. और ये रक़म चार भाइयों में बँट गए. “अब हमारे पास एक खोटी पाई भी नहीं है. बस यूँ ही घूमते रहते हैं.” सुंदर पंडित ने बताया.

घरबरा और आसपास ही नहीं बल्कि यमुना नदी के पूर्वी किनारे पर नोएडा से आगरा के बीच बसे तक़रीबन सभी गाँवों की यही कहानी है. कुछ लोग मुआवज़ा ले चुके हैं और कुछ अपनी ज़मीनें बचाने या ज़मीन न बचे तो बेहतर मुआवज़े के लिए आंदोलन कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने भट्टा-पारसौल कांड के बाद भूमि अधिग्रहण में राज्य सरकार की भूमिका को कम करने का ऐलान किया है. नई व्यवस्था के मुताबिक़ प्राइवेट कंपनियाँ अब सीधे किसानों से ज़मीन ख़रीदने के लिेए संपर्क कर सकती हैं. सरकार का कहना है कि इससे ज़मीनों की क़ीमतें तय करने में किसानों की भूमिका बढ़ेगी.

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