राजनीति के विकल्प या वैकल्पिक राजनीति?

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption "ज़ाहिर है कि बाबा के पास न तो धर्म की नैतिक शक्ति थी, न गुरु की मर्यादा और न ही योगी की स्थितप्रज्ञता. एक राजनेता जितना संकल्प भी बाबा रामदेव नहीं दिखा पाए."

हमें राजनीति में विकल्प चाहिए या फिर वैकल्पिक राजनीति चाहिए?

अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव प्रकरण ने यह सवाल देश के सामने खड़ा कर दिया है. इसका उत्तर न तो रामदेव के पास था, न अन्ना हज़ारे के पास लगता है. इस गहरे सवाल का जवाब खुद अपने भीतर खंगालने से ही मिलेगा.

यह सवाल उठता ही नहीं अगर भ्रष्टाचार के सवाल पर सरकार की साख बची होती. ईमानदार प्रधानमंत्री की सरकार बेईमानी की छवि में आकंठ डूबी है. यह ज़रूरी नहीं कि यह सरकार पिछली सरकारों से ज़्यादा भ्रष्ट हो. संभव है कि सब सरकारें भ्रष्ट रही हों, इस बार भ्रष्टाचार की चर्चा और भंडाफोड़ ज़्यादा हो रहा हो.

यह भी संभव है कि एक दिशाहीन और थकी सरकार को उखाड़ने के लिए ले-देकर भ्रष्टाचार का मुद्दा ही हाथ लगता है. जो भी हो, यह तय है कि अब प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि सरकार की साख को बचा नहीं सकती है. खुद पैसा न खाने वाले लेकिन पैसा खाने वालों से घिरे और बेबस नेता को अब ईमानदार कहना मुश्किल होता जा रहा है.

कौन है ईमानदार?

यह सवाल इतना गहरा और तीखा न होता अगर मामला सिर्फ़ दिल्ली की सरकार का होता. मनमोहन सिंह की सरकार दिल्ली में कुछ कर रही है या नहीं इससे आम व्यक्ति को बहुत लेना-देना नहीं होता.

सरकार का भ्रष्टाचार उसके लिए पटवारी, बाबू और थाने का भ्रष्टाचार है. अगर उसके लिए कलमाड़ी और राजा मुद्दे बनते हैं तो इसलिए चूंकि वह हर दफ्तर में किसी कलमाड़ी को देखता है, हर सरकारी ठेके में उसे किसी राजा का हाथ नज़र आता है. दिल्ली की सरकार के भ्रटाचार के प्रति जनाक्रोश पूरी व्यवस्था के प्रति अविश्वास का प्रतीक है.

यह सवाल उतना असंभव न लगता अगर स्थापित राजनीति में भ्रष्टाचार के विकल्प दिखते. बोफोर्स का सवाल जनता के दरबार में एक राजनेता ने उठाया था, किसी गैर राजनीतिक जनांदोलन ने नहीं.

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption "अनशन समाप्त होने के बाद से अन्ना की टीम का आचरण अटपटा नज़र अता है. उनकी मांगो में सत्य के आग्रह से ज़्यादा हठ, उनके बयानों में संयम की कमी और रणनीति में राजनीतिक सूझ-बूझ की कमी दिखाई देती है."

लेकिन आज किसी पार्टी की ऐसी साख नहीं कि वह भ्रष्टाचार के सवाल पर देश को आंदोलित कर सके. भाजपा अगर इस सवाल पर बयानबाज़ी और रस्मी विरोध से आगे बढ़ेगी तो उसे कर्नाटक में अपनी सरकार की करतूतों का जवाब देना पड़ेगा.

प्रधानमंत्री पर उंगली उठाने पर लोकसभा में विपक्ष की नेता को बेल्लारी के खदान माफिया से अपने संबंधों के बारे में सफाई देनी पड़ेगी. नीतिश कुमार और शिवराज सिंह चौहान व्यक्तिगत रूप से भले ही ईमानदार हों, लेकिन उनका प्रशासन ईमानदार है ऐसा दावा तो वे खुद भी नहीं कर पाएंगे.

नवीन पटनायक ऐसा दावा करते रहते हैं, लेकिन इसीलिए चूंकि मीडिया ओड़िशा सरकार द्वारा बड़ी कंपनियों की दलाली की पड़ताल नहीं करता. पहले लगता था कि भ्रष्टाचार के सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टियाँ एक अपवाद हैं. दूसरों की तुलना में माकपा के नेता आज भी बेहतर हैं.

लेकिन केरल और बंगाल में वाममोर्चे की सरकारों में भी शीर्ष के नेता साफ़ थे, राज-काज भ्रष्टाचार में डूबा था. बसपा, सपा, राजद, अकाली या फिर द्रमुक-अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियों की तो इस संदर्भ में चर्चा ही फिज़ूल है.

मुसीबत की जड़?

स्थापित राजनीति के स्थापित विकल्पों से निराश आम नागरिक राजनीति को मुसीबत की जड़ मानता है. अखबार और टीवी इस राजनीति द्वेष को हवा देते हैं. ऐसी तस्वीर पेश करते हैं मानो इस देश के अफसर, व्यापारी, डॉक्टर और अध्यापक सदाचारी हैं और सिर्फ नेता बेईमान हैं, या फिर बाकी सब की बेईमानी के लिए राजनेता जिम्मेवार हैं.

इसलिए जब कोई गैर-राजनीतिक व्यक्ति या संगठन भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाता है तो जनता की सहानुभूति उनसे जुड़ती है. जनमत के सहारे ये छोटे व्यक्ति और संगठन रातों-रात राष्ट्रीय पटल पर छा जाते हैं.

सरकार का तख्ता हिलता दिखाई देता है. लेकिन तभी राजनीति विरोध की इस राजनीति की सीमाएँ दिखाई देने लगती हैं.पिछले कुछ हफ्तों में हमने देखा है कि राजनीति के इन विकल्पों के सहारे भ्रष्टाचार का मुकाबला नहीं हो सकता.

बाबा रामदेव का आंदोलन राजनीति विरोध की राजनीति की सीमाओं की एक मिसाल है. योग, धर्म और आस्था के संगम का प्रतीक बने बाबा के अनशन ने लाखों या शायद करोड़ों भारतीयों के मन में राजनीति के शुद्दीकरण की आस जगाई थी.

अब ज़ाहिर है कि बाबा के पास न तो धर्म की नैतिक शक्ति थी, न गुरु की मर्यादा और न ही योगी की स्थितप्रज्ञता. एक राजनेता जितना संकल्प भी बाबा रामदेव नहीं दिखा पाए. और अब जब बाबा के ट्रस्टों की संपत्ति की बात निकली है तो लगता है दूर तलक जायेगी.

अगर यह अनशन किसी ईमानदार राजनीतिक कार्यकर्ता ने किया होता तो देश भर में लाखों लोग इतना ठगा हुआ महसूस नहीं कर रहे होते.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption "खुद पैसा न खाने वाले लेकिन पैसा खाने वालों से घिरे और बेबस नेता को अब ईमानदार कहना मुश्किल होता जा रहा है."

अन्ना हजा़रे और उनकी टीम का अनुभव इतना बुरा नहीं है. उनके आंदोलन में नैतिक बल और मर्यादा का पुट ज़्यादा था. लेकिन गाँधीवादी अनशन करना एक बात है और उसके सहारे आंदोलन को परिणति तक पंहुचाना दूसरी बात है.

सत्याग्रह या हठ?

अनशन समाप्त होने के बाद से अन्ना की टीम का आचरण अटपटा नज़र अता है. उनकी मांगो में सत्य के आग्रह से ज़्यादा हठ, उनके बयानों में संयम की कमी और रणनीति में राजनीतिक सूझ-बूझ की कमी दिखाई देती है.

बेशक, सरकार और उसके गुर्गो ने अन्ना के सहयोगियों को बदनाम करने और उनमे फूट के बीज बोने में कसर नहीं छोडी. लेकिन एक आंदोलनकारी को इसकी शिकायत करने का हक़ नहीं है.

अगर सरकार ने बाबा की तरह अन्ना को भी पटकनी दे दी, तो बहुत समय तक कोई भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठा नहीं पाएगा. राज्य सत्ता मर्यादित होने की बजाय पहले से भी ज़्यादा निरंकुश हो जायेगी. इस संभावना से बचने के लिए अन्ना के आंदोलन को व्यापक राजनीति से जुड़ना होगा.

तलाश वैकल्पिक राजनीति की

अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव के आंदोलन एक ओर तो स्थापित राजनीति के खोखलेपन और एक विकल्प की अनिवार्यता को ज़ाहिर करते हैं. दूसरी ओर ये दोनों आंदोलन गैर राजनीतिक और राजनीति विरोधी विकल्पों की सीमाएँ भी दर्शाते हैं. देश को जिस विकल्प की तलाश है वो न तो सत्ताधारी दल के बाहर स्थापित दलों में मिलेगा, न ही राजनीति के दायरे से बाहर मिलेगा. देश को राजनीतिक विकल्पों की नहीं एक वैकल्पिक राजनीति की तलाश है.

उस वैकल्पिक राजनीति की तलाश करने के लिए हमें अँधेरे में लालटेन लेकर निकलने की ज़रूरत नहीं है. देश भर में सदाचारी राजनीति के लिए व्याकुल नयना जिसे तलाश रहे हैं, वो हमारे भीतर ही कहीं छुपा है.

इस वैकल्पिक राजनीति के लिए ज़रूरी विचार और उर्जा देश के भीतर मौजूद है. मुख्यधारा की राजनीति के बाहर इस देश में अनेकानेक जनसंगठन, जनांदोलन और राजनीतिक संगठन मौजूद हैं.

इनमें से अधिकांश संगठन देश के एक छोटे इलाके में सघन काम कर रहे हैं, लेकिन किसी न किसी बड़े समन्वय से जुड़े हैं. ये संगठन अक्सर किसी एक मुद्दे पर आंदोलन चला रहे हैं, लेकिन इनकी दृष्टि व्यापक है. मीडिया की आँखों से ये कार्यकर्ता भले ही ओझल हों, मगर इनका कद वाकई बहुत बड़ा है. देश में वैकल्पिक राजनीति खड़ा करने के लिए ज़रूरत है इन सब कार्यकर्ताओं, आंदोलनों और संगठनों को एक सूत्र में पिरोने की.

विडम्बना यह है कि जिस वैकल्पिक राजनीति की तलाश देश को है वो खुद जनता की तलाश में है. हमारे सामने होते हुए भी टीवी के पर्दों से ओझल है, अख़बार के पन्नों से गायब हैं, जनमानस पर दर्ज नहीं होता.

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों की उर्जा का एक छोटा सा भी अंश जनता को इस वैकल्पिक राजनीति से जोड़ने में लग जाए तो देश नैराश्यबोध से बच सकता है.

(लेखक सामयिक वार्ता के संपादक हैं)

संबंधित समाचार