बिहार:बच्चों पर क़हर,15 दिन में 35 मौतें

मुज़फ़्फ़रपुर अस्पताल(फाईल फ़ोटो)
Image caption अस्पताल में मौत से जूझ रहा एक बच्चा

बिहार के मुज़फ्फ़रपुर ज़िले में बहुत-सी मलिन बस्तियों के बच्चों के लिए जून का महीना पिछले 15 वर्षों से जानलेवा बना हुआ है.

इसी महीने एक ऐसा घातक रोग वहाँ फैलता है, जो ख़ासकर डेढ़ साल से आठ साल तक की उम्र वाले बच्चों पर हमला करता है.

चिकित्सा विशेषज्ञ इसे मस्तिष्क-ज्वर ( एन्सेफेलायटिस ) जैसा रोग बताते हैं पर निश्चित पहचान अभी भी नहीं हो पाने की बात स्वीकार करते हैं.

इस वर्ष 11 जून से 25 जून के बीच 15 दिनों में इस बीमारी से ग्रस्त 108 बच्चों को अस्पताल में दाख़िल कराया गया. इनमें से 35 बच्चों की मौत हो चुकी है.

वर्ष 1995 के जून महीने में पहली बार मुज़फ्फ़रपुर के आसपास ग्रामीण इलाक़ों में महामारी जैसा इसका भयावह रूप दिखा था.

उस समय लगभग एक हज़ार बच्चे इसकी लपेट में आए थे और सौ से भी अधिक बच्चों की मौत हो गई थी.

पिछले वर्ष भी दो से 21 जून के बीच इस रोग से वहां 36 बच्चों की जानें गई थीं और 150 के क़रीब बीमार पड़े थे.

मुज़फ्फ़रपुर के मुसहरी, मीनापुर , कोठिया, कांटी और अहयापुर प्रखंडों से जुड़े गांव में इसका ज़्यादा प्रकोप है. अब सीतामढ़ी, पूर्वी चंपारण, समस्तीपुर और कुछ अन्य ज़िलों में भी इसका फैलाव दिख रहा है.

घोर ग़रीबी की मार झेल रहे निचले तबक़े के परिवारों में उन छोटे-छोटे बच्चों को इस रोग से अधिक ग्रस्त पाया गया है, जो गंदगी, मच्छरों, सूअरों और गाय-भैंस के बीच प्रायः नंगे बदन खेलते-सोते हैं.

कुपोषण के अलावा गर्मी या बरसात के दिनों में दूषित भोजन -पानी से पीड़ित बच्चों पर इस रोग के कीटाणु या विषाणु का तेज़ असर होता है.

Image caption अस्पताल पर लापरवाही के आरोप भी लगते रहें हैं.

इसे गांव-देहात के लोग 'चमकी' बुख़ार इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें बुख़ार और उल्टी के साथ-साथ शरीर का कोई अंग रह-रहकर चमकने-फड़कने लगता है.

मुज़फ्फ़रपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल में और वहीँ के एक ट्रस्ट संचालित 'केजरीवाल अस्पताल' में इस कथित एन्सेफ़ेलायटिस के मरीज़ों का इलाज़ चल रहा है.

'लापरवाही'

शुक्रवार 24 जून को जब मैंने इन दोनों अस्पतालों में मरीज़ों के परिजनों और चिकित्सकों से बातचीत की तो पता चला कि वहां भर्ती मरीज़-बच्चों में से तीन-चार की मौत प्रायः हर दिन हो रही है.

सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. सुनील साही ने बताया, ''इस अस्पताल में अबतक दाख़िल 34 मरीज़ों में से16 की मौत हुई है और बीमार पांच बच्चों की स्थिति गंभीर बनी हुई है.''

उधर केजरीवाल अस्पताल के प्रशासक वी.वी. गिरि ने कहा, ''यहां 11 जून से 24 जून के बीच आए कुल 74 मरीज़ों में से19 को नहीं बचाया जा सका लेकिन 25 बच्चे इलाज के बाद स्वस्थ होकर घर लौट गए हैं.''

शुरू में चिकित्सा को लेकर लापरवाही के आरोप श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रबंधन पर लगाये गए. वहां मरीज़ों को पहले कई दिनों तक शिशु रोग विभाग के जनरल वार्ड में जैसे-तैसे ज़मीन पर लिटाकर रखा गया था.

बाद में जब राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे वहां हालात का जायज़ा लेने गए, तब उन्होंने मरीज़ों को फ़ौरन 'आइसीयू' में रखने का आदेश दिया.

आरोप है कि लापरवाही के चलते वहां तब तक बीमार बच्चों में से दस की मौत हो चुकी थी. हालांकि अस्पताल प्रबंधन ने लापरवाही के आरोप को निराधार कहा है.

जनता दल(यू) से जुड़े तीन विक्षुब्ध सांसद - उपेन्द्र कुशवाहा, मंगनी लाल मंडल और अरुण कुमार वहां मरीज़ों को देखकर निकलते समय रोष में कह रहे थे कि नीतीश सरकार द्वारा स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार संबंधी खोखले दावे अब बेनक़ाब हो रहे हैं.

'मतभेद'

इस बीच इलाज को लेकर चिकित्सकों में मतभेद भी दिखने लगे हैं. सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के चिकित्सक कहते हैं, ''यह एनसेफ़ेलायटिस ही है, ऐसा अबतक प्रमाणित हुआ नहीं है, इसलिए 'एंटी वायरल ड्रग' चलाना ठीक नहीं.''

दूसरी तरफ़ केजरीवाल अस्पताल के चिकित्सक डॉ. राजीव का कहना है, ''लक्षणों के आधार पर और दिल्ली से आए चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह पर इस रोग का इलाज हम 'एंटी वायरल ड्रग' देकर कर रहे हैं .''

उनके मुताबिक़ पुणे के लैब में इस बाबत हो रही सैम्पल - जांच की रिपोर्ट एक सप्ताह में मिल जाने की सभावना है. ऐसे में अनुमान पर चल रहे इलाज को भगवान भरोसे छोड़ने जैसी ही विवशता मान लिया गया है.

मुज़फ्फ़रपुर के दोनों अस्पतालों में मैंने जिन 25 बच्चों को इस रोग से ग्रस्त देखा, उनमें से अधिकांश बेहोशी की हालत में जीवन और मौत के बीच फंसे दिख रहे थे.

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे ने कहा है कि इस रोग से ग्रस्त सभी बच्चों की ना सिर्फ़ मुफ़्त चिकित्सा हो रही है बल्कि रोग की सही पहचान और सटीक दवा संबंधी तमाम प्रयासों में राज्य सरकार सक्रिय योगदान कर रही है.

लेकिन मौक़े पर वास्तविक हालात देख रहे लोगों की राय या प्रतिक्रिया इस सरकारी दावे से बिलकुल भिन्न और खिन्न नज़र आती है.

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