राष्ट्रपति की अपील, माओवादियों का जवाब

नक्सली हमला

भारतीय राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की माओवादियों से की गई शांति अपील के जवाब में कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने कहा है कि अगर सरकार ऑपरेशन 'ग्रीन-हंट' को बंद करे तो जवाबी हिंसा थम जाएगी.

माओवादियों ने अपने प्रभाव वाले इला़क़ो से सेना और अर्धसैनिक बलों को वापस बुलाने की भी मांग की है.

लेकिन संगठन की ओर से जारी बयान में ये भी साफ़ किया गया है कि ऐसी ही एक पेशकश पर संगठन की तरफ़ से बातचीत में शामिल पोलितब्यूरो सदस्य आज़ाद को पुलिस ने एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मार दिया था.

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने छत्तीसगढ़ की दो-दिवसीय यात्रा के दौरान माओवादियों से अपील जारी करते हुए उन्हें हिंसा छिड़ने की सलाह दी थी और कहा था कि हिंसा का रास्ता अख़्तियार किए हुए सभी गुटों को बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए.

प्रतिभा पाटिल ने रायुपर में कहा था, "किसी भी सभ्य समाज में हिंसा की कोई जगह नहीं होती है. माओवादी हिंसा छोड़कर बातचीत के लिए आगे आएं और मुख्यधारा से जुड़े़."

उन्होंने छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ दिनों के दौरान हुई हिंसक वारदातों पर चिंता भी जताई थी जिनमें सुरक्षा बलों के कई जवान मारे गए थे.

'गुमराह करने की कोशिश'

शनिवार देर शाम संगठन की केंद्रीय कमिटी के प्रवक्ता अभय की ओर से जारी बयान में प्रतिभा पाटिल के शांति प्रस्ताव को जनता को गुमराह करने की कोशिश बताया गया है.

बीबीसी को भेजे गए बयान में अभय ने दावा किया है कि ये बातचीत का प्रस्ताव ऐसे समय आया है जबकि भारतीय सेना के करीब एक हज़ार जवान बस्तर के तीन जिलों में अपना पड़ाव डाल चुके हैं.

संगठन का कहना है कि एक तरफ़ तो सरकार बातचीत की पेशकश कर रही है जबकि दूसरी तरफ़ खनिज संपदा से भरपूर देश के कई इलाकों से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए हुकुमत और कार्पोरेट कंपनियों के बीच वार्ता के दौर जारी हैं और लाखों करोड़ रुपए के समझौतों पर दस्तखत किए जा चुके हैं.

बयान में आगे कहा गया है, "वे ऐसे समय हमें हिंसा त्यागने की बात कह रही हैं जबकि न सिर्फ बस्तर के गांवों बल्कि दण्डकारण्य, बिहार-झारखण्ड, ओड़िशा, महाराष्ट्र आदि कई प्रदेशों में, ख़ासकर "माओवादी संघर्ष वाले इलाकों या आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी हिंसा रोज़मर्रा की सच्चाई है."

संगठन ने याद दिलाया है कि बातचीत की एक कोशिश के दौरान माओवादियों की ओर से वार्ता में शामिल पोलिटब्यूरो के सदस्य आजाद को एक फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया था.

Image caption माओवादी बस्तर में चले सलवा जुडूम का भी विरोध करते रहे हैं. सरकार इसे जनता का आंदोलन बताई आई है.

बयान में कहा गया है, "आजाद ने वार्ता पर हमारी पार्टी के दृष्टिकोण को साफ तौर पर देश-दुनिया के सामने रखा था और उसका जवाब उनकी हत्या करके दिया गया और उसके बाद भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पकड़कर जेलों में क़ैद करने का सिलसिला लगातार जारी है."

काला धन

माओवादियों ने जनता से अपील की है कि वो राष्ट्रपति से मांग करें कि शांति वार्ता की पेशकश करने से पहले सरकार जनता पर जारी ऑपरेशन ग्रीन-हंट बंद करे. साथ ही बस्तर में सेना के ‘प्रशिक्षण’ को भी बंद करे.

पिछले दिनों ख़बरें आती रही हैं कि सरकार ने माओवादियों के विरूद्ध सघन अभियान छेड़ रखा है जिसका नाम ऑपरेशन ग्रीन-हंट है. हालांकि सरकार ने ऐसे किसी नाम से इंकार किया है.

इसके अलावा माओवादियों ने मांग की है कि "माओवाद-प्रभावित" इलाकों से सेना व अर्धसैनिक बलों को वापस बुलाया जाए.

कहा गया है कि "अगर सरकार इसके लिए तैयार होती है तो दूसरे ही दिन से जनता की ओर से आत्मरक्षा में की जा रही जवाबी हिंसा थम जाएगी".

बयान में घोटालेबाजों और भ्रष्टाचारियों की गिरफ़्तारी, विदेशी बैंकों में मौजूद काले धन को देश वापस लाने की बात भी कही गई है.

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