कचरे की गाड़ी में शव ढोने पर विवाद

Image caption छत्तीसगढ़ में माओवादियों और पुलिस के बीच अक्सर झड़पें होती रहती हैं.

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में रविवार की रात हुए बारूदी सुरंग के विस्फोट में मारे गए पुलिस के जवानों के शवों को कचरे की गाड़ी में ढोए जाने के मामले नें तूल पकड़ना शुरू कर दिया है.

यह हमला दंतेवाड़ा के किरंदुल इलाके में हुआ था जिसमें किरंदुल थाना के प्रभारी सहित कुल चार पुलिसकर्मी मारे गए थे. स्थानीय टीवी चैनेलों पर जब यह तस्वीरें प्रसारित हुईं तो उससे पुलिस महकमे के लोगों में काफी रोष था.

हालाकि इस बाबत राज्य के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन ने एक समाचार एजेंसी को बताया चूँकि एम्बुलैंस उपलब्ध नहीं थी इसलिए किरंदुल नगरपालिका के वाहन से तीन जवानों के शवों को दंतेवाड़ा लाया गया था.

उनका कहना है कि उस वक़्त किरंदुल में सिर्फ नगरपालिका का वाहन ही उपलब्ध था. मगर उनका कहना था कि वाहन को अच्छी तरह धोया और पोंछा गया था.

अधिकारी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि किरंदुल नगर पालिका का यह वाहन कचरा ढोने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है मगर स्थानीय टी वी चैनेलों पर जब यह तसवीरें प्रसारित की गयीं तो इस पर सरकार को काफी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.

मामला इसलिए भी गंभीर हो गया है क्योंकि बारूदी सुरंग के धमाके में गंभीर रूप से घायल किरंदुल थाना के प्रभारी डीएल नागवंशी की अस्पताल जाने के क्रम में मौत हुई.

तीन अन्य जवानों - भूषण मंडावी, असलान एक्का और लक्ष्मण भगत के शवों को दंतेवाड़ा नगपालिका की गाड़ी में ही लाया गया. इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस वाहन से इन शवों को दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय में उस जगह तक ले जाया गया जहाँ पर पुलिस के बड़े अधिकारी और जवान कतारबद्ध होकर अपने इन मरे साथियों को श्रद्धांजलि दे रहे थे.

पुलिस का कहना है कि किरंदुल में कोई वाहन उपलब्ध नहीं था. मगर जिस जगह बारूदी सुरंग का धमाका हुआ वह जगह निजी खनन कंपनी एस्सार के मुख्य द्वार के ठीक सामने है. इसके अलावा घटना स्थल के पास बचेली में सरकारी उपक्रम नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कारपोरेशन (एनएम्डीसी) की भी खदानें हैं और वहां पर कंपनी की अपनी एम्बुलेंसें उपलब्ध हैं.

दूसरी तरफ यह सबकुछ तब हुआ जब केंद्र और राज्य सरकार नक्सल विरोधी अभियान के तहत करोड़ों रूपए खर्च कर रहीं हैं.

मारे गए जवानों के शवों के साथ सिर्फ इतना ही नहीं हुआ, जिस एम्बुलेंस से इन शवों को उनके पैतृक आवास भेजा जा रहा था वह भी बीच रास्ते में खराब हो गया. मारे गए जवानों में से असलान एक्का और लक्ष्मण भगत के शवों को रायगढ़ में उनके पैतृक गाँव ले जाया जा रहा था.

जवानों के परिजनों का आरोप है कि वाहन ख़राब होने के बाद वह अल पुलिस अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश करते रहे मगर किसी ने उनकी एक ना सुनी. लगभग 6 घंटों तक उन्हें शवों के साथ बीच सड़क पर ख़राब वाहन में ही बैठे रहना पड़ा.

इस पूरे प्रकरण पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए छत्तीसगढ़ की विधान सभा में विपक्ष के नेता रविन्द्र चौबे ने आरोप लगाया है कि पुलिस आधुनीकीकरण और नक्सल विरोधी अभियान के तहत केंद्र से मिलने वाले धन का उपयोग सरकार साज सज्जा में और अपने अधिकारियों के ठाट बाट पर कर रही है.

बीबीसी से बात करते हुए चौबे नें कहा , ‘‘यह विडम्बना नहीं तो क्या है कि जीते जी जवानों को तो वाहन नसीब नहीं होते हैं. मरने के बाद भी उनके शवों को कूड़े के ट्रक में लाया जाता है. इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है.”

चौबे ने आरोप लगाया कि पुलिस मुख्यालय में बैठे बड़े अधिकारी और जिले में तैनात अधिकारियों में ताल मेल का अभाव है.

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