प्रशासन में सुधार या आंकड़ों का खेल?

उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करने से पहले मायावती ने उत्तर प्रदेश की जनता को क़ानून व्यवस्था में सुधार लाने का आश्वासन दिया था, लेकिन हाल ही में राज्य से बलात्कार और हत्या की ख़बरों ने मायवती सरकार को कठघरे में ला कर खड़ा कर दिया है.

एक ओर जहां विपक्षी दलों ने मायावती प्रशासन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है, वहीं मीडिया में भी लगातार उत्तर प्रदेश की नकारात्मक छवि देखने को मिल रही है.

जहां विपक्षी दलों का कहना है कि यूपी में महिलाओं के लिए क़ानून व्यवस्था सबसे ज़्यादा ख़राब है, वहीं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के आंकड़े कुछ और ही बयान करते हैं.

दिसंबर 2010 में जारी किए गए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़ दूसरे राज्यों के मुक़ाबले उत्तर प्रदेश में महिलाओं के लिए क़ानून व्यवस्था कहीं ज़्यादा बेहतर है.

महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए अपराध, ख़ास तौर पर बलात्कार के मामलों की जहां तक बात है, तो उत्तर प्रदेश देश पाँच अच्छे राज्यों की सूची में चौथे स्थान पर है.

इस श्रेणी में सबसे ज़्यादा ख़राब राज्य असम को बताया गया है. जबकि महिलाओं की सुरक्षा के लिए सबसे अच्छा राज्य गुजरात को माना गया है.

लेकिन दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर और झारखंड के राज्यपाल रह चुके वेद मारवाह कहते हैं कि इन आंकड़ों पर विश्वास नहीं किया जा सकता.

बीबीसी से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा, "भारत में पुलिस सही आंकड़े कभी नहीं बताती और ये पुराना चलन रहा है. बढ़ते हुए अपराध को देख कर पुलिस और प्रशासन, दोनों की परेशानी बढ़ जाती है. एक ओर जहां पुलिस अपराध के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से बचना चाहती है, तो दूसरी ओर नेता जवाबदेही से बचना चाहते हैं. ऐसे में पुलिस और नेताओं के बीच एक सोची-समझी मिलीभगत हो जाती है, जिसके कारण वे अपराध को दर्ज ही नहीं करते."

वेद मारवाह कहते हैं कि नेताओं और पुलिस के बीच सांठगांठ की वजह से नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के आधार पर यूपी और बिहार जैसे राज्यों की छवि को सकारात्मक ऐनक से नहीं देखा जा सकता.

वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह भी वेद मारवाह की बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "चुनाव से पहले सारा खेल छवि का होता है. हाल ही में जो घटनाएं यूपी में हुई हैं, उससे कहीं न कहीं ये संदेश जा रहा है कि मायावती सरकार का अपराध पर नियंत्रण नहीं है. यूपी में सबसे बड़ी समस्या ये है कि मायावती और आम जनता के बीच संवाद की गहरी कमी है, जिसके कारण सरकार की छवि पर नकारात्मक असर पड़ रहा है."

राजनीतिक बवाल

Image caption मायावती सरकार का कहना है कि उसके प्रशासन में अपराध में कमी आई है.

उधर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी इन आंकड़ों को ख़ारिज करते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश में ज़्यादातर अपराध के मामले पुलिस की ओर से दर्ज नहीं किए जाते हैं, जिसके कारण आंकड़े इस तरह भ्रामक हैं.

दिग्विजय सिंह ने सोमवार को प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की और उन्हें यूपी में कथित तौर पर बढ़ रहे अपराध दर के बारे में अवगत करवाया.

बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा, "इन आंकड़ों के माध्यम से मीडिया को बेवकूफ़ बनाया जा रहा है. जिस तरह यूपी में लोगों को ठगा जा रहा है, वो अब सामने आ रहा है. लखनऊ के एक सीएमओ के दफ़्तर में तीन हत्याएं होने के बाद मायावती दो मंत्रियों को ये कह कर बर्ख़ास्त कर चुकी हैं कि उन्होंने गड़बड़ी की है. लेकिन आज तक ये नहीं स्पष्ट किया गया कि इन मंत्रियों ने कौन सी गड़बड़ी की है."

उत्तर प्रदेश सरकार का अपनी सफाई में कहना है कि उन्होंने अपराध में लिप्त पाए जाने वाले 12 विधायकों, एक मंत्री और एक सांसद को जेल भिजवाया है और ऐसा इससे पहले किसी मुख्यमंत्री ने नहीं किया है.

तो ऐसे में सवाल ये उठता है कि अपराध के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का दावा करने वाली सरकार पर आख़िर इतने सवाल क्यों उठ रहे हैं? विश्लेषकों की मानें तो इस बात का सीधा संबंध क़ानून व्यवस्था से न हो कर आने वाले विधानसभा चुनावों से ज़्यादा है.

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