'बैठक का छवि पर कोई असर नहीं'

मनमोहन

गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि कम बात करना प्रधानमंत्री के स्वभाव में है

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की संपादकों के साथ हुई बैठक के बाद सवाल ये कि इसका कितना असर हुआ और क्या इससे कोई मक़सद हासिल होगा?

क्या मीडिया की ये शिकायत दूर होगी कि प्रधानमंत्री बहुत कम बात करते हैं? दिव्य मराठी के संपादक कुमार केतकर प्रधानमंत्री से मिलकर बेहद प्रभावित थे.

वो कहते हैं, "हमारी ये धारणा थी कि प्रधानमंत्री अलग-थलग पड़ गए हैं, वो थके हुए हैं. अपने ऊपर हो रहे हमलों की वजह से शायद वो इस्तीफ़े की सोच रहे हैं, वो शंकालु हो गए हैं, लेकिन ऐसा नहीं था. वो साढ़े दस बजे मिलने आए तो वो मज़ाकिया मूड में थे. उनका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था."

कुमार केतकर कहते हैं कि वो प्रधानमंत्री से मिलकर ये देखना चाहते थे कि ‘79 साल के प्रधानमंत्री जिन पर लगातार हमले हो रहे हैं, इन हमलों से कैसे निपटते हैं?’

केतकर कहते हैं कि उन्हें लगा कि प्रधानमंत्री सवालों का जवाब नहीं देंगे, ‘लेकिन मेरी ग़लतफ़हमी दूर हो गई. उन्होंने किसी सवाल को टाला नहीं.’

हालांकि केतकर ये भी कहते हैं कि इस बैठक के बावजूद प्रधानमंत्री के मीडिया मैनेजमेंट पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.

उन्होंने कहा, "मुझे पता नहीं कि कुछ संपादकों से बात करने के बाद उनकी छवि पर कोई असर पड़ेगा, लेकिन कोशिश अच्छी थी. उन्होंने कोई सवाल टाला नहीं. मुश्किल सवालों का भी उन्होंने हँसकर जवाब दिया."

शुरुआत

मुझे पता नहीं कि कुछ संपादकों से बात करने के बाद उनकी छवि पर कोई असर पड़ेगा, लेकिन कोशिश अच्छी थी

कुमार केतकर, संपादक, दिव्य मराठी

उधर दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के संपादक शशि शेखर कहते हैं कि राजीव गांधी की हत्या के बाद एसपीजी कमांडो और सुरक्षा बंदोबस्त ने नेताओं को जनता से दूर किया है और ये संवाद उस युग की वापसी की शुरुआत है.

उन्होंने कहा, "लोकतंत्र में आपके पास ज़रिया भी क्या है? आप चर्चा करें, ये प्रधानमंत्री का अच्छा क़दम है. उन्हें समाज के दूसरे तबकों से भी मिलना चाहिए."

शशि शेखर के मुताबिक़ प्रधानमंत्री ने इस बातचीत के माध्यम से राजनीतिक स्थिरता का संदेश दिया है.

शशि शेखर कहते हैं, "उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि उन्हें पद पर बने रहने की अभिलाषा नहीं है. अगर पार्टी चाहे तो युवा नेतृत्व को आगे आने का मौक़ा दे सकती है. वो ये भी बताने की कोशिश कर रहे हैं कि हालात उनके नियंत्रण में हैं."

देश में उठ रहे कई आंदोलनों पर शशि शेखर कहते हैं कि आज की जटिल स्थिति में मांग रखते समय लोगों को ज़रूर सोचना चाहिए कि जनआकांक्षाओं के जिन्न को बाहर निकाला जा सकता है, लेकिन उसे एक दो दिन में पूरा नहीं किया जा सकता है.

केतकर के मुताबिक़ ऐसा कहीं नहीं लगा कि प्रधानमंत्री की बातों में कोई नाटक था क्योंकि ‘100 मिनट नाटक करना मुश्किल है. मीडिया में जिस तरह का माहौल है, उसे बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है. प्रधानमंत्री नियंत्रण में हैं.’

वो कहते हैं कि मीडिया की ये शिकायत कि प्रधानमंत्री उनसे नहीं मिलते हैं, वो दूर होगी. ये कहना सही होगा कि प्रधानमंत्री बहुत बहिर्मुखी नहीं हैं. वो शांत व्यक्ति हैं. उन्हें अकेला रहना पसंद है.

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