'सिर्फ़ पैसा ख़र्च करने से गंगा साफ़ नहीं होगी'

गंगा की सफ़ाई से जुड़ी तमाम कोशिशों के बावजूद नदी में गंदगी बरकरार है. मेरा मानना है कि ये समझने की कोशिश ही नहीं होती है कि आख़िर समस्या क्या है.

बिना समस्या को समझे हुए गंगा सफ़ाई के कार्यक्रम शुरु कर दिए जाते हैं ताकि किसी तरह पैसा ख़र्च हो जाए.

लेकिन केवल पैसा ख़र्च करने से गंगा साफ़ नहीं होगी. जब तक समस्या की ठीक से समझ नहीं होगी तब तक कोई भी कार्यक्रम कामयाब नहीं हो सकता.

राजीव गांधी सरकार के समय गंगा को लेकर राजीव गांधी गंगा एक्शन प्लैन शुरु हुआ था. इस अभियान के तहत शायद 1500 से 2000 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं. अब यूपीए-2 सरकार नई योजना बना रही है जिसमें 2500 करोड़ रुपए तक की योजनाओं को मंज़ूरी मिल चुकी है.

दिक्कत

इन अभियानों में एक दिक्कत ये रही है कि प्रशासन की कोशिश यही होती है कि कैसे गंगा सफ़ाई अभियान को बड़ा प्रोजेक्ट बनाया जाए, अरबों रुपए ख़र्च किए जाएँ जिससे सबकी जेबें भरी जाती हैं. और असली काम होता ही नहीं है.

उदाहरण के तौर पर बनारस में 350 मिलियन लीटर बेकार पानी नदी में जाता है. लेकिन गंगा एक्शन योजना के तहत जो प्लांट बने हैं वो करीब 100 मिलियन लीटर गंदे पानी का ही ट्रीटमेंट कर सकते हैं. यानी सिर्फ़ एक तिहाई तैयारी हुई.जो प्लांट चालू हैं वो भी रोज़ाना काम नहीं करते.

मतलब ये कि इस बात की पहले से तैयारी ही नहीं की गई कि कितना गंदा पानी आएगा और उसे साफ़ करने के लिए कितने प्लांट लगाने पड़ेंगे.

गंगा सफ़ाई अभियान में दूसरी समस्या ये कि नदी में पानी का बहाव ही नहीं है. इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया है कि नदी में कितना पानी हमेशा बहते रहना चाहिए.

अगर नदी में पानी ही नहीं होगा और उसपर से गंदा पानी उसमें बहा दिया जाएगा, ऐसे में नदी तो गंदी होगी ही. जैसे दिल्ली में यमुना गंदी हो चुकी है...वज़ीरपुर में सारा पानी निकाल लिया गया और बाकी केवल गंदे नाले हैं.कानपुर, इलाहाबाद, बनरास सब जगह गंगा की यही हालत है.

क्या क़दम उठाएँ

अगर गंगा को बचाना है तो कई तरह के क़दम उठाने होंगे. ज़रूरत इस बात की है कि कम से कम प्रदूषित जल गंगा में डाला जाए. उसके लिए ट्रीटमेंट प्लांट चाहिए होंगे.प्रदूषित पानी को ट्रीट करने के बाद नदी में बहाने के बजाय कृषि कार्यों के लिए दे देना चाहिए.

किसानों को भी समझाना होगा कि वे केवल ऐसी फसलें ही न उगाएँ जिन्हें ज़्यादा पानी चाहिए होता है.

हालांकि ये भी सच है कि जिन फ़सलों में कम पानी चाहिए होता है बाज़ार में उनकी कीमत ज़्यादा नहीं है. इसमें सरकार को क़ीमतें नियंत्रित करनी होंगी कि ऐसी फ़सलों के लिए किसान को उचित दाम मिले.

लोगों को भी अपने तौर-तरीके बदलने होंगे. नदी में कम से कम मल डालना चाहिए. जब तक जनता को साथ लेकर सरकार योजनाएँ नहीं बनाएगी, तब तक केवल इंजीनियरिंग के बल पर गंगा साफ़ नहीं हो सकती.

(रवि चोपड़ा पर्यावरणविद् हैं और नदी बचाओ आंदोलन से भी जुड़े हुए हैं)

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