इस्तीफ़ा देंगे तेलंगाना के सांसद-विधायक

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Image caption कांग्रेसी राजनेताओं ने हैदराबाद में बैठक के बाद पत्रकारों को अपने फ़ैसले की जानकारी दी

आंध्र प्रदेश की राजनीति ने एकाएक विस्फोटक मोड़ ले लिया है जबकि तेलंगाना क्षेत्र से संबंध रखनेवाले तमाम कांग्रेसी सांसदों, मंत्रियों और विधायकों ने सोमवार चार जुलाई को त्यागपत्र देने का फ़ैसला कर लिया है.

यह लोग इस बात पर केंद्र सरकार और कांग्रेस आलाकमान से नाराज़ हैं कि उनकी बार-बार मिन्नतों के बावजूद तेलंगाना राज्य की माँग पर कोई फ़ैसला नहीं किया गया.

त्यागपत्र देने के बारे में हुई बैठक के बाद अपने फ़ैसले की घोषणा करते हुए राज्यसभा सदस्य केशव राव ने कहा कि अगर केंद्र सरकार तेलंगाना राज्य नहीं देती है तो फिर उन्हें संसद में रहने की कोई ज़रुरत नहीं है.

उन्होंने कहा कि यह निर्णय बड़े ही दुःख और पीड़ा के साथ लिया गया है.

लोकसभा सदस्य पूनम प्रभाकर ने कहा कि 4 जुलाई को दिल्ली में लोकसभा सांसद स्पीकर को और राज्य सभा सदस्य उपसभापति को अपने त्याग पत्र देंगे जबकि हैदराबाद में उसी समय तमाम मंत्री और विधायक स्पीकर को अपने त्याग पत्र सौंपेंगे.

उन्होंने कहा,"हम कांग्रेस में रहते हुए ही अलग तेलंगाना राज्य के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेंगे."

कारण

तेलंगाना कांग्रेस के नेताओं ने तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर फ़ैसले के लिए केंद्र सरकार को जो ताज़ा समय सीमा दी थी वो गुरूवार 30 जून को ही समाप्त हो गई थी.

तेलंगाना कांग्रेस के वरिष्ट नेता और मंत्री के जाना रेड्डी ने कहा कि त्याग पत्र देने का फ़ैसला तेलंगाना की जनता की महत्वाकांक्षा के अनुकूल लिया गया है ताकि यह संदेश स्पष्ट हो कि उन्हें पद और सत्ता का मोह नहीं है और वे तेलंगाना राज्य चाहते हैं.

इस फ़ैसले ने आंध्र प्रदेश की राजनीति में खलबली मचा दी है क्योंकि इसका सीधा प्रभाव राजनीतिक स्थिरता पर पड़ सकता है और केंद्र सरकार भी इससे दहल सकती है.

तेलंगाना से कांग्रेस के 11 लोकसभा सदस्य हैं और अगर उनका इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया जाता है तो खुद केंद्र सरकार के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग सकता है.

इसी तरह तेलंगाना में कांग्रेस के कोई 50 विधायक हैं और अगर इनमें से आधे भी त्याग पत्र दे दें तो सरकार ख़तरे में पड़ सकती है.

तेलंगाना के कांग्रेसी नेताओं ने यह फ़ैसला एक ऐसे समय पर किया है जब कांग्रेस के प्रभारी गुलाम नबी आज़ाद हैदराबाद में हैं और कांग्रेस के प्रमुख नेताओं से मिल रहे हैं.

पहली बार

Image caption कांग्रेसी सांसद गृहमंत्री चिदंबरम की 2009 में की गई घोषणा की याद दिला रहे हैं

हालाँकि कांग्रेस के ये नेता तेलंगाना के लिए काफ़ी समय से अपनी आवाज़ उठा रहे हैं लेकिन यह राज्य के इतिहास में पहली बार है कि उन्होंने त्यागपत्र देने जैसा बड़ा कदम उठाया है.

इसे आला कमान को चुनौती देने के बराबर देखा जा रहा है.

कांग्रेस के नेता माँग कर रहे हैं कि केंद्र सरकार गृह मंत्री पी चिदंबरम की नौ दिसंबर 2009 उस घोषणा पर टिकी रहे जिसमें उन्होंने कहा था कि तेलंगाना राज्य की स्थापना की प्रक्रिया शुरू हो गई है.

कांग्रेसी नेताओं के लिए इस तरह का क़दम उठाना ज़रूरी हो गया था क्योंकि तेलंगाना के समर्थक उन्हें निशाना बनाने लगे थे.

तेलंगाना संयुक्त संघर्ष समिति ने उन्हें त्याग पत्र देने के लिए जो समय दिया था वो 25 जून को ख़त्म हो गया और उसके बाद से तेलंगाना में जगह जगह मंत्रियों के घेरों और उनके घरों पर हमले की घटनाएँ बढ़ गई थीं और वो आज़ादी के साथ कहीं आ-जा नहीं पा रहे थे.

तेलुगू देसम

इधर कांग्रेसी नेताओं के इस फैसले का असर मुख्य विपक्षी दल तेलुगू देसम पर भी बड़ा है.

उसके तेलंगाना विधायकों ने पीछे न रहते हुए चार जुलाई को ही विधान सभा अध्यक्ष को अपना त्याग पत्र देने का फ़ैसला कर लिया है.

अब तक तेलुगू देसम के तेलंगाना विधायकों को भी इस आलोचना का सामना करना पड़ रहा था कि वे तेलंगाना राज्य के विरोधी हैं.

इन सब घटनाओं के बावजूद कांग्रेस आलाकमान के लिए तेलंगाना राज्य की स्थापना का कोई फ़ैसला आसान नहीं होगा क्योंकि अगर वो ऐसा करती है तो आंध्र और रायलसीमा क्षेत्र से उसके सांसद और विधायक भी इस्तीफे़ की धमकी दे सकते हैं और एक नया संकट खड़ा कर सकते हैं.

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