'कांग्रेस जल्द फ़ैसले के मूड में नही'

तेलंगाना आंदोलन(फ़ाईल फ़ोटो)
Image caption अलग तेलंगाना राज्य की मांग बहुत पुरानी है.

आंध्र प्रदेश में तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी एक बड़े संकट के कगार पर पहुंच गई है.

ऐसा लगता है की पार्टी के तेलंगाना क्षेत्र से आने वाले नेता जिनमें मंत्री, सांसद और विधायक सभी शामिल हैं,पार्टी आला कमान के साथ टकराव की ओर बढ़ रहे हैं.

इन नेताओं ने सोमवार को त्याग पत्र दे देने की घोषणा की है.

पार्टी के केंद्रिय नेतृत्व ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि पार्टी तेलंगाना नेताओं के फ़ैसले से ख़ुश नहीं है.

हैदराबाद पहुंचे कांग्रेस पार्टी के प्रभारी ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कहा की त्याग पत्र से कोई समस्या हल नहीं होती.

साथ ही उन्होंने ऐसी कई टिप्पणियां भी कीं जिससे लगता है कि कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी तेलंगाना के विषय पर जल्द कोई फ़ैसला करने के मूड में नहीं हैं.

'जटिल समस्या'

आज़ाद ने कहा की तेलंगाना एक जटिल समस्या है जिसे एक दो दिन में हल नहीं किया जा सकता.

उन्होंने तेलंगाना के नेताओं को याद दिलाया की केंद्र में एक गठबंधन सरकार है और कांग्रेस को गठबंधन की मर्यादाओं का ख़्याल रखना होगा.

उन्होंने कहा की तेलंगाना केवल आंध्र प्रदेश का नहीं बल्कि पूरे देश की समस्या है क्योंकि इस फ़ैसले का प्रभाव कई दूसरे राज्यों पर भी पड़ सकता है.आज़ाद ने कहा की इस विषय पर एक सर्वसम्मति लाने की कोशिश जारी है और इसमें समय लगेगा.

आज़ाद का यह भी कहना था की कांग्रेस पार्टी न केवल तेलंगाना बल्कि आंध्र और रायलसीमा क्षेत्रों के लोगों की भावनाओं का भी सम्मान करती है.

लगभग यही बात कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनुसिंघवी और एक दूसरे प्रभारी ऑस्कर फ़र्नानडीज़ ने भी कही है और इन सबका निष्कर्ष यही है कि कांग्रेस आला कमान और केंद्र सरकार तेलंगाना का जल्द कोई फ़ैसला नहीं करेंगे.

शायद केंद्रीय नेताओं को अभी भी आशा है की हमेशा की तरह तेलंगाना के सांसद और विधायक आख़िरी क्षण में अपने क़दम पीछे ले लेंगे और इस्तीफ़ा नहीं देंगे.

लेकिन उनकी ये उम्मीद अब की बार पूरी होती दिखाई नहीं दे रही क्योंकि ज़मीनी स्तर पर तेलंगाना में हालात इतने ख़राब हो गए हैं कि इस्तीफ़ा दिए बिना ये नेता अपने चुनाव क्षेत्रों का भी दौरा नहीं कर सकते.

Image caption तेलंगाना की मांग को लेकर कई दफ़ा हिंसक आंदोलन हुए हैं.

आला कमान को एक और उम्मीद इस बात से बंधी है की पार्टी के तमाम तेलंगाना नेता त्याग पत्र के विषय पर सहमत नहीं हैं.

तेलंगाना के 15 मंत्रियों में से पांच उस बैठक में नहीं थे जिसमें त्याग पत्र का फ़ैसला लिया गया था.

इनमें से दो हैदराबाद से हैं और वे तेलंगाना का विरोध कर रहे हैं.

इस तरह कांग्रेस के 50 तेलंगाना विधायकों में से आधे ही इस बैठक में मौजूद थे और अभी यह देखना है कि बाक़ी विधायक क्या करते हैं.

सांसदों में भी कुल 11 में से केवल आठ ने बैठक में हिस्सा लिया था.

लेकिन दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल तेलुगु देसम के तेलंगाना विधायकों ने भी चार जुलाई को ही त्यागपत्र देने का फ़ैसला करके कांग्रेसी नेताओं पर दबाव बढ़ा दिया है और अब कांग्रेसियों के लिए क़दम पीछे लेना सम्भव नहीं होगा.

आला कमान को इस बात से भी धक्का लगा है कि सांसदों और विधायकों ने पार्टी अध्यक्ष को नहीं बल्कि सीधे लोकसभा और विधासभा स्पीकरों को ही त्याग पत्र पेश करने का फ़ैसला किया है.

पार्टी नेतृत्व इस बात से भी ख़ुश नहीं है कि तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव से कांग्रेस के वरिष्ट मंत्री के जाना रेड्डी से मुलाक़ात के बाद इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला किया गया.

समझा जाता है कि चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना के कांग्रेसी नेताओं को आश्वासन दिया है की अगर उनके त्यागपत्र स्वीकार कर लिए जाते हैं तो तमाम तेलंगाना वादी मिलकर भारी बहुमत से उन्हें दुबारा चुन लेंगें जैसा की टीआरएस के साथ हुआ.

अस्थिरता का डर

अगर तेलंगाना से कांग्रेस के 50 में से 25 और तेलुगु देसम के 36 विधायक त्याग पत्र देते हैं तो राज्य में एक संवैधानिक संकट और राजनैतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है.

दूसरी ओर आंध्र और रायलसीमा से संबंध रखने वाले सांसद और विधायक भी त्यागपत्र की धमकी दे सकते हैं ताकि आला कमान के हाथ बांध दिए जाएँ.

यह तो स्पष्ट है कि अब तेलंगाना का मुद्दा एक बहुत ही नाज़ुक और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है जहाँ कांग्रेस आला कमान के लिए कोई न कोई फ़ैसला करना लाज़िमी हो जाएगा.

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