मिज़ोरम में शांति के पच्चीस वर्ष

मिज़ोरम का पारम्परिक नृत्य चीरौ
Image caption पूर्वोत्तर राज्य शेष भारत में सौतेला सा ही व्यवहार झेलते हैं

भारत में मिज़ोरम की हैसियत चवन्नी के बराबर भी नहीं है. अगर आप तीस जून को आइज़ॉल में बैठ कर देश के मानसपटल को पढ़ने की कोशिश करते तो आप इसी निष्कर्ष पर पहुंचते.

इस साल तीस जून को मिज़ोरम के ऐतिहासिक शांति समझौते की पच्चीसवीं वर्षगाँठ थी. लेकिन राष्ट्रीय कहलाने वाले अखबारों या चैनलों ने मिज़ोरम की सुध न ली.

सुबह दूरदर्शन ने ख़बर चलाई कि आज से चवन्नी के सिक्के का चलन बंद हो जायेगा. मिज़ोरम की ख़बर चवन्नी की विदाई के आगे-पीछे कहीं ज़िक्र के लायक भी नहीं समझी गई.

भारत सरकार और मिज़ो विद्रोहियों के बीच तीस जून 1986 को हुआ समझौता कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी. समझौते से पहले बीस साल तक मिज़ो विद्रोह मिजोरमवासियों के लिये त्रासदी, शासकों के लिये सरदर्द और भारत के दामन पर दाग़ बना रहा था.

अपनी पराकाष्ठा पर इस विद्रोह ने भारतीय सत्ता को वो चुनौती दी थी जो नागालैंड, कश्मीर या पंजाब में भी कभी नहीं मिली. सन 1966 में मिज़ो विद्रोहियों ने आइज़ॉल शहर को छोड़कर ज़्यादातर इलाकों से भारतीय राजसत्ता को उखाड़ फेंका था.

स्वतंत्र भारत में भारत सरकार ने अपने ही नागरिकों के ख़िलाफ़ वायु सेना से हमला किया था. उसके बाद सुरक्षा बलों का दमनचक्र चला. विद्रोह को कुचलने के लिये सुरक्षा बलों ने तमाल जायज़-नाजायज़ तरीक़ों का इस्तेमाल किया. दमन के वो किस्से आज भी बुज़ुर्गों को याद हैं.

विद्रोहियों ने जंगल की पनाह ली, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से मदद ली और छापामार युद्ध शुरू किया. भारत सरकार की सत्ता कायम हुई लेकिन जंगल और जनमानस पर विद्रोहियों का कब्ज़ा रहा. कई वर्ष के गतिरोध के बाद राजीव गाँधी के प्रधानमन्त्री बनते ही शांतिवार्ता ने गति पकड़ी और समझौता हुआ.

मिज़ो शांति समझौते की गिनती दुनिया भर में सशस्त्र विद्रोह को कागज़-कलम से ख़त्म करने की सबसे सफल कोशिशों में होती है. उससे एक साल पहले पंजाब और असम में भी शांति समझौते हुए थे, लेकिन इन सबकी तुलना में मिज़ोरम का समझौता एक अद्भुत सफलता साबित हुआ.

शांति समझौते पर दस्तख़त होते ही विद्रोहियों ने हथियार डाल दिये, मिज़ोरम राज्य बन गया, चुनाव हुए, कल के विद्रोही सत्ता पर काबिज़ हुए और हिंसा-प्रतिहिंसा का सिलसिला बंद हो गया. आज मिज़ोरम पूर्वोत्तर का सबसे शांत राज्य है.

पूर्वोत्तर में सबसे शांत

पच्चीस साल की शांति के चलते आज मिजो़रम की स्थिति पूर्वोत्तर के किसी भी अन्य राज्य से बेहतर है. साक्षरता के लिहाज़ से मिज़ोरम देश के तमाम राज्यों में तीसरे नंबर पर है. प्रति व्यक्ति आय पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों से बेहतर है, ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वालों की तादात सबसे कम.

देश भर में अनुसूचित जनजाति कोटा के अफ़सरों में मिजो़रमवासियों की संख्या इस छोटे से राज्य के हिसाब से बहुत ज़्यादा है. विकास के लिहाज़ से बहुत कुछ होना बाक़ी है, लेकिन अगर यह समझौता न होता तो हालात वहां न पहुंचते जहाँ आज पंहुचे हैं.

ऐसे ऐतिहासिक समझौते की इतनी बेक़द्री क्यों?

इसका एक कारण तो पूर्वोत्तर के प्रति बाक़ी देश की बेरुख़ी है. एक पढ़ा-लिखा महानगरीय हिन्दुस्तानी मैनहेटन या मिशिगन के बारे में बात करते हुए फैल जायेगा. लेकिन अगर उसे मणिपुर और मिज़ोरम के बारे में दो लाईने बोलने को कहेंगे तो बगलें झांकने लगेगा.

मिजोरम के मुख्यमंत्री बताते हैं कि भारत के एक राष्ट्रपति को ये तक पता नहीं था कि मिज़ोरम है कहाँ. गंगा के मैदान में रहने वाला एक औसत भारतवासी अपने आप को इस देश का मालिक समझता है और बाक़ी सब को किरायेदार.

जब पूर्वोत्तर के युवजन दिल्ली या उत्तर भारत में कहीं और शिक्षा या रोज़गार के लिये आते हैं तो वे नस्लभेद का शिकार होते हैं, उनसे विदेशियों जैसा बर्ताव होता है.

इसलिए ले-देकर पूर्वोत्तर की चिंता कोई करते हैं तो या तो आतंरिक सुरक्षा के ठेकेदार या फिर मानवाधिकार के पैरोकार. फौज और गुप्तचर एजेंसी वालों को शांति में कोई दिलचस्पी नहीं. मानवाधिकार वालों को भी अच्छी ख़बर से ज्यादा दिलचस्पी बुरी ख़बर में रहती है.

इसके चलते मिज़ोरम में पच्चीस साल कि शांति के सबक़ सीखने में किसी को दिलचस्पी नहीं हैं. अगर हम गंभीर होते तो पूछते कि नक्सली समस्या, कश्मीर के जनाक्रोश और पूर्वोत्तर के अन्य विद्रोहियों के बारे में नीति बनते वक्त हम मिज़ोरम की सफलता से क्या सीख सकते हैं.

मिज़ोरम से मिले सबक़

मिज़ोरम का अनुभव हमें तीन सबक़ सिखाता है. पहला तो यह, कि छोटी फुन्सी ही बाद में नासूर बनती है. इलाक़ा चाहे जितना भी छोटा हो, जनता की समस्याओं को नज़रंदाज़ करना ख़तरे से खाली नहीं है. अगर दुःख सच्चा है तो उसे जल्द से जल्द शीर्ष स्तर पर निपटाना बेहतर है.

मिज़ोरम के विद्रोह के बीज तब पड़े जब राज्य के भीषण अकाल के समय बाक़ी देश सोया रहा. मोरारजी देसाई के अहंकार ने मिज़ो समझौते में दस साल की देर करा दी. राजीव गाँधी की आत्मीयता ने दोबारा दरवाज़े खोले. यह सबक़ आज उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज को उजाड़ने वाली योजनाओं पर लागू होता है.

दूसरा सबक अनेकता में एकता वाला है. बाक़ी देश से भिन्न इलाकों से एकता के सूत्र जोड़ने के लिये उनकी विविधता का सम्मान करना अनिवार्य है. मिज़ो समझौता तभी हो पाया जब एक ज़िले से भी कब आबादी वाले इलाक़े को राज्य का दर्जा मिला.

यही नहीं, संविधान में एक विशेष धारा 371 जी जोड़ी गयी जिसके तहत भारत की संसद द्वारा बनाये गए अनेक क़ानून मिज़ोरम पर लागू नहीं होते हैं, अगर वे मिज़ो समाज की परम्पराओं के अनुरूप नहीं हैं. यह सबक़ आज कश्मीर और मणिपुर जैसे इलाको पर लागू होता है.

तीसरा सबक़ यह कि जनसमर्थन से चल रहे विद्रोह को कुचलने या तिकड़म से हराने की बजाय उसे सत्ता में हिस्सा देना सबसे समझदारी का काम है.

तीस जून को औपचारिक मिज़ो समझौता होने से एक हफ़्ता पहले केंद्र और मिज़ोरम में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और विद्रोही मिज़ो नेशनल फ्रंट के बीच एक राजनीतिक समझौता हुआ था.

यह तय हुआ था कि जैसे ही विद्रोही हथियार डाल देंगे, वैसे ही कोँग्रेस के मुख्यमंत्री लालथान्हावला अपनी कुर्सी ख़ाली कर देंगे और विद्रोही नेता लालदेंगा को मुख्य मंत्री बनाया जायेगा. यही हुआ, और चुनाव जीतने से पहले ही लालदेंगा नए प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बन गए.

इस अनोखे और उदार फैसले ने दीर्घकालीन शांति का रास्ता साफ़ किया. यह सबक़ त्रिपुरा, नागालैंड और असम सहित देश के कई इलाकों पर लागू होता है जहाँ केंद्र सरकार पहले विद्रोहियों में फूट डालती है और फिर जब समझौता करने का वक्त आता है तो यही तिकड़म उसके गले की फांस बन जाती है. सभी समूहों के साथ समझौता कैसे किया जाये, यह किसी को समझ नहीं आता.

यह सबक़ हम तभी सीख सकते हैं अगर हम पूर्वोत्तर में रहने वालों को इस देश का किरायेदार नहीं मालिक मानना शुरू करें.

(लेखक सामायिक वार्ता के सम्पादक हैं.)

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