मॉनसून सत्र में पेश होगा बिल

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

केंद्र सरकार ने कहा है कि मॉनसून सत्र में लोकपाल बिल संसद में पेश किया जाएगा इसे जल्द से जल्द पारित कराने की कोशिश की जाएगी.

नई दिल्ली में कपिल सिब्बल और पवन कुमार बंसल के साथ पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए गृहमंत्री पी चिदबंरम ने कहा, “संसद के सामने जो बिल रखा जाएगा वो ज़्यादातर लोगों को संतुष्ट कर पाएगा और उम्मीद करनी चाहिए कि अन्ना को दोबारा अनशन पर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.”

हालांकि मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने ये बात भी जोड़ दी कि सरकार ने केवल इतना भर कहा है कि बिल संसद में पेश किया जाएगा. उनका कहना था, “हमने ये नहीं कहा कि हम बिल पारित भी करवा लेंगे.”

चिदबंरम ने कहा कि बिल पारित होता है या नहीं ये सासंदों और सारी प्रक्रियाएँ मानने की उनकी इच्छा पर निर्भर करेगा.

प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का सवाल भी पत्रकार वार्ता में उठा. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कह चुके हैं कि निजी तौर पर उन्हें इसमें कोई आपत्ति नहीं है.

इस पर सफ़ाई देते हुए कपिल सिब्बल ने कहा, “ये प्रधानमंत्री की निजी राय है. हमें संवैधानिक संस्थानों का बचाव करना है, हो सकता है कि आगे जाकर केंद्र में कांग्रेस का प्रधानमंत्री न हो, पर हम सबका बचाव करना चाहते हैं.”

'संविधान के दायरे में हो सब कुछ'

लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर रविवार को सभी राजनीतिक दलों की बैठक हुई थी जिसमें संसदीय कार्यप्रणाली के ज़रिए प्रभावी और मज़बूत लोकपाल विधेयक बनाने पर सहमति बनी थी.

भाजपा ने कहा था कि सरकार पहले इस विधेयक का आधिकारिक मसौदा मानसून सत्र में संसद के सामने रखे , उसे स्थायी समिति को भेजे जहाँ सभी दल इस पर अपनी राय दे सकते हैं.विपक्ष से जुड़े कई सवालों पर मंत्रियों के तेवर इस बार कुछ नरम दिखे.

लोकपाल पर भाजपा द्वारा राय स्पष्ट न करने पर जब पत्रकारों ने सवाल पूछा तो कपिल सिब्बल ये कहकर टाल गए कि शायद भाजपा को अभी राय बनाने के लिए और वक़्त चाहिए.

वहीं संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा कि अगर कोई भी सदस्य या पार्टी अपना रुख़ रखना चाहती है तो सरकार ख़ुले दिल से उसका स्वागत करेगी.

पत्रकार वार्ता में गृह मंत्री ने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि रविवार को सर्वदलीय बैठक में सभी पार्टियाँ इस बात पर सहमत थी कि लोकपाल पर जो भी क़ानून बने वो संविधान के दायरे में होने चाहिए.

मंत्रियों ने ये भी बताया कि कई पार्टियों ने नागरिक समाज के सदस्यों को दी गई अहमियत पर भी नाराज़गी जताई.

कपिल सिब्बल ने कहा कि उस समय परिस्थिति ऐसी थी कि जनता की आवाज़ को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अन्ना और उनके सहयोगियों को लोकपाल ड्राफ़्टिंग समिति में शामिल करने का फ़ैसला किया.

संबंधित समाचार